एक देश एक चुनाव : लाभ ज्यादा हानि कम
मोदी सरकार एक देश एक चुनाव के अपने अहम् कदम को आगे बढ़ाने की दिशा में तेजी से
जुट गई है। एक देश-एक चुनाव की वकालत खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर चुके हैं। इसके
समर्थन के पीछे सबसे बड़ा तर्क यही दिया जा रहा है कि इससे चुनाव में खर्च में होने वाले
करोड़ों रुपये बचाए जा सकते हैं। भारत सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द के नेतृत्व में
गठित एक उच्च-स्तरीय समिति को यह पड़ताल करने का काम सौंपा है कि लोकसभा,
विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनाव एक साथ कैसे आयोजित कराए जा सकते हैं। समिति ने
इसके लिए एक सार्वजनिक नोटिस जारी करते हुए कहा कि देश में एक साथ चुनाव कराने के
लिए मौजूदा कानूनी प्रशासनिक ढांचे में उचित बदलाव करने के लिए आम जनता से लिखित
रूप में सुझाव आमंत्रित किए जाते हैं। समिति ने आगे कहा कि 15 जनवरी, 2024 तक आम
लोगों से प्राप्त सुझाव को विचार के लिए समिति के समक्ष रखा जाएगा। इस सम्बन्ध में आम
जनता अपनी राय को समिति की वेबसाइट onoe.gov.in पर पोस्ट कर सकती हैं। समिति
द्वारा जारी नोटिस के मुताबिक, लोग अपनी राय को ईमेल sc-hlc@gov.in पर भी भेज सकते
हैं।
एक राष्ट्र, एक चुनाव के समर्थन में तर्क दिया जाता है कि इससे चुनाव पर होने वाले खर्च में
कमी आएगी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, 2019 के लोकसभा चुनावों में 60,000 करोड़ रुपये
खर्च किए गए थे। इस राशि में चुनाव लड़ने वाले राजनीतिक दलों द्वारा खर्च की गई राशि और
चुनाव आयोग ऑफ इंडिया द्वारा चुनाव कराने में खर्च की गई राशि शामिल है। वहीं, 1951-
1952 में हुए लोकसभा चुनाव में 11 करोड़ रुपये खर्च हुए थे।
एक देश एक चुनाव की बात कोई नई नहीं है, क्योंकि देश में वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा
और राज्य विधानसभा दोनों के चुनाव साथ-साथ हो चुके हैं। एक राष्ट्र एक चुनाव का अर्थ है कि भारत में
संघीय ढांचे के सभी तीन स्तरों के लिए चुनाव प्रक्रिया एक समकालिक तरीके से होगी। एक राष्ट्र एक चुनाव
का मतलब है कि एक मतदाता एक ही दिन सरकार के सभी स्तरों (केंद्रीय, राज्य और स्थानीय) के लिए
अपना वोट डालेगा। इसलिए एक साथ होने वाले चुनाव को एक देश एक चुनाव भी कहा जा सकता है। इससे
देश को बढ़ रहे चुनावी व्यय से छुटकारा मिलेगा। गौरतलब है पिछले दिनों संसदीय समिति ने संसद के
दोनों सदनों में पेश अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि अगर देश में एक ही बार में सभी प्रकार के चुनाव संपन्न
किए जाएंगे, तो न केवल इससे सरकारी खजाने पर बोझ कम पड़ेगा, बल्कि राजनीतिक दलों का खर्च कम
होने के साथ साथ मानव संसाधन का भी अधिकतम उपयोग किया जा सकेगा। साथ ही मतदान के प्रति
मतदाताओं की रूचि में वृद्धि होंगी।
एक देश-एक चुनाव के लिए अनुच्छेद- 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना होगा। लोकसभा और
राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराये जाने के मसले पर लंबे समय से बहस चल रही है।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी इस विचार का समर्थन कर इसे आगे बढ़ाया है। आपको बता दें कि इस मसले पर
चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग विचार कर चुके हैं। विधि आयोग
ने देश में एक साथ चुनाव कराये जाने के मुद्दे पर विभिन्न राजनीतिक दलों, क्षेत्रीय पार्टियों और
प्रशासनिक अधिकारियों की राय जानने के लिये तीन दिवसीय कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया था। इस
कॉन्फ्रेंस में कुछ राजनीतिक दलों ने इस विचार से सहमति जताई, जबकि ज्यादातर राजनीतिक दलों ने
इसका विरोध किया। उनका कहना है कि यह विचार लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। जाहिर है कि जब
तक इस विचार पर आम राय नहीं बनती तब तक इसे धरातल पर उतारना संभव नहीं होगा।
गौरतलब है मोदी सरकार के 2014 में सत्तारूढ़ होने के बाद ही एक देश और एक चुनाव को
लेकर बहस शुरू हो गई। दिसंबर 2015 में लॉ कमीशन ने वन नेशन-वन इलेक्शन पर एक
रिपोर्ट पेश की थी। इसमें बताया था कि अगर देश में एक साथ ही लोकसभा और विधानसभा के
चुनाव कराए जाते हैं, तो इससे करोड़ों रुपए बचाए जा सकते हैं। एक देश-एक चुनाव से बार-बार
चुनावों में खर्च होने वाली धनराशि बचेगी। इसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और जल संकट निवारण आदि
ऐसे कार्यों में हो पाएगा, जिससे लोगों के जीवन स्तर में बेहतरी आएगी। कई देशों ने विकास को गति देने के
लिए एक देश-एक चुनाव की व्यवस्था अपना रखी है।
- बाल मुकुन्द ओझा