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आज़ादी के अपने अपने मायने

आज़ादी के अपने अपने मायने

देश आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। 200 साल ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी के पश्चात
15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ था। लाखों देशवासियों ने कुर्बानियां देकर आजादी
प्राप्त की थी तब जाकर यह हमें प्राप्त हुई है। आज़ादी के 76 वें जश्न पर हम स्वयं को ठगा
सा महसूस कर रहे हैं। आजादी का सही अर्थ वही समझ सकता है जिसने गुलामी के दिन झेले
और यंत्रणा सही हों। 76 वें स्वतंत्रता दिवस पर हम जोशोखरोश के साथ आजादी का जश्न
मनाने जा रहे हैं, लेकिन हमारे-आपके बीच बहुत से ऐसे लोग भी हैं, जिनके लिए आजादी का
मतलब मनमानी और स्वच्छंदता है। कानून कायदे और स्थापित नियम तोड़ना हमारा शगल बन
चुका है। आज हम इस बहुमूल्य आजादी का वास्तविक अर्थ भूलते जा रहे। है। गरीबी, शोषण,
बीमारी और भेदभाव से मुक्ति की बातें भाषणों और कागजों में दफ़न हो रही है। इन बुनियादी
समस्याओं को हल करने के स्थान पर हम आपसी मतभेदों में उलझ कर रह गए है। आज लोग
आज़ादी के मनमाने अर्थ निकाल रहे है। कुछ लोग कहते है हमें मोदी से आज़ादी चाहिए तो कुछ
कहते है भ्रष्टाचार ,तुष्टिकरण और वंशवाद से आज़ादी चाहिए। आजादी के 76 वर्षों के बाद वर्तमान
सत्तापक्ष कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार करने में जुटा है वहीँ विपक्ष मोदी मुक्त भारत की बात कर
रहा है। युवाओं के लिए रोजगार की बाते गौण हो गई है। गरीब के लिए रोटी ,कपड़ा और मकान की बात
दोयम हो गई है। महिलाओं की स्वतंत्रता कागजों में दफन हो रही है। सरकारी नौकर के लिए आजादी का
अर्थ जेब भरना है। देश और समाज का हर पक्ष अपनी अपनी बात पर ढृढ़ता से कायम है। अपने कुर्ते को
दूसरे के कुर्ते से अधिक उजला बताया जा रहा है। भ्रष्टाचार की विष बेल लगातार बढ़ती ही जा रही है।
सहिष्णुता को कुश्ती का अखाडा बना लिया गया है। परस्पर समन्वय, प्रेम, भातृत्व और सचाई को दर
किनार कर घृणा और असहिष्णुता हम पर हावी हो रही है। आजादी के दीवाने चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह,
तिलक, गाँधी, नेहरू, पटेल और लोहिया के सिद्धांतों और विचारों के अपने अपने हित में अर्थ निकाले जा
रहे है। आजादी के बाद कई दशकों तक सत्तासीन लोग सत्तासुख को अब तक नहीं भूल पाए है और राज करना
अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान रहे है। वहीँ नए सत्तासुख पाने वाले देश को असली आजादी और
लोकतंत्र का धर्म सिखा रहे है। साम्प्रदायिकता को लेकर देश दो फाड् हो रहा है। सेकुलर शब्द की नयी नयी
परिभाषाएँ गढ़ी जा रही है। दल बदलते ही कल के सेकुलर आज के सांप्रदायिक हो जाते है और सांप्रदायिक
रातों रात सेकुलर बन जाते है। बलिहारी है भारत के लोकतंत्र की, इन सब के बावजूद गाँधी की दुहाई के साथ
देश आगे बढ़ता जा रहा है।

लौहपरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा था अनुशासित होकर जीना ही आजादी के सही मायने हैं।
आजादी का मतलब स्वच्छंदता नहीं है। आजादी हमें अनुशासन का पाठ पढ़ाती है। आज हमारे जीवन मे
अनुशासन की सख्त आवश्यकता है। अनुशासन जीवन के विकास का अनिवार्य तत्व है। जो अनुशासित
नहीं होता, वह दूसरों का हित तो कर नहीं पाता, स्वयं का अहित भी टाल नहीं सकता। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र
में अनुशासन का महत्व है। अनुशासन स्वतंत्रता प्रदान करता है जो व्यक्ति अनुशासित रूप से जीते हैं उन्हें
स्वत ही विद्या, ज्ञान एवं सफलता प्राप्त होती है। आजादी के बाद हमने अनुशासन की भावना को
तिलांजलि दे दी जिसके फलस्वरूप देश पतन की गहरी खाई की और उन्मुख हो रहा है। हम बयानवीर हो
गए। हमारी कथनी विश्वसनीय नहीं रही है। जुबान काबू में नहीं है और स्वार्थ हम पर हावी हो गया है। हमें
अपनी आजादी बचानी है तो अनुशासन को अपनाना ही होगा। किसी भी राष्ट्र की प्रगति तभी संभव है जब
उसके नागरिक अनुशासित हों। यदि हम चाहते हैं कि हमारी आजादी अक्षुण्य रहे और समाज एंव राष्ट्र
प्रगति के पथ पर निरंतर अग्रसर रहें, तो हमें अनुशासित रहना ही पड़ेगा। जब हम स्वयं अनुशासित रहेंगे,
तब ही किसी दूसरे को अनुशासित रख सकेंगे। अनुशासन ही देश को महान बनाता है। प्रत्येक व्यक्ति का
देश के प्रति कुछ कर्तव्य होता है, जिसका पालन उसे अवश्य करना चाहिए, क्योंकि जिस देश के नागरिक
अनुशासित होते हैं, वही देश निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर रह सकता है । यही हमारे लिए आजादी की
सीख है।

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