जन प्रतिनिधि है या लोकतंत्र के दुश्मन
इस समय देश की सियासत बाहुबली, अपराधी और माफिया नेताओं के इर्द गिर्द घूम रही है।
आज सम्पूर्ण मीडिया अतीक अहमद, मुखतार और अफजाल अंसारी, आनन्द मोहन सिंह की
गाथाओं से भरे पड़े है। ये नेता कम माफिया विशेषकर टेलीविजन चैनलों की सुर्खिया बने है।
न्यूज़ चैनलों पर राजनीति के अपराधीकरण पर गर्मा गरम बहसें चल रही है। इनके अपराध
जगत के इतिहास खंगाले जा रहे है। इनमें अतीक अहमद पांच बार विधायक और एक बार
सांसद रहा है। अंसारी बंधु भी विधायक और सांसद रहे है। बिहार के एक डीएम की हत्या में
आजीवन कारावास से बाहर आने वाले आनंद मोहन सिंह भी सांसद रहे है। बिहार सरकार ने
जिला अधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या में सजा काट रहे एक बाहुबली नेता आनंद मोहन सिंह
को बाहर निकालने के लिए नियम ही बदल दिया।
भारतीय लोकतंत्र में अपराधी इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि कोई भी राजनीतिक दल उन्हें
नजरअंदाज नहीं कर पा रहा। पार्टियाँ उन्हें नहीं चुनती बल्कि वे चुनते हैं कि उन्हें किस पार्टी से
लड़ना है। उनके इसी बल को देखकर उन्हें बाहुबली का नाम मिला है। कभी राजनीति के धुरंधर
अपराधियों का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे अब दूसरे को लाभ पहुँचाने के बदले
उन्होंने खुद ही कमान संभाल ली है। न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया ने आग में घी डालने का
काम कर वातावरण को शांत करने के बजाय जहरीला बनाने में अधिक योगदान दिया है।
अक्सर यह देखा जाता है न्यूज़ चैनलों की बहस और चर्चा में भाषा की मर्यादा ताक पर रख दी
जाती है। कार्यक्रम संचालकों-प्रस्तोताओं को टीआरपी बटोरने के लिए नाना प्रकार से प्रेरित किया
जाता है। राजनीति के अपराधीकरण पर हो रही चर्चाओं में पक्ष और विपक्ष के अलग अलग गुट
बन जाते है जो इस नापाक गठजोड़ को तोड़ने के बजाय एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर
अपने हित साधने में लगे रहते है। इससे सार्थक चर्चा नहीं हो पाती और पूरा समय गंदे बोलों
के बीच समाप्त हो जाता है। लगता है इन चर्चाओं में भाग लेने के लिए ऐसे लोगों को बुलाया
जाता है जो अपने निम्न स्तरीय बयानों के लिए जाने जाते है।
आज लोकतंत्र की दुहाई देने वाले नेताओं और सियासी पार्टियों के नापाक गठजोड़ से जनता
जनार्दन को जागरूक होने की जरुरत है। अपराधियों को नेताओं का समर्थन हो या नेताओं की
अपराधियों को कानून के शिकंजे से बचाने की कोशिश, आखिर राजनैतिक दलों पर अपराधियों
का ये कैसा असर है। भारतीय लोकतंत्र में अपराधी इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि कोई भी
राजनीतिक दल उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पा रहा। हालात यहाँ तक पहुँच गए है कि पार्टियाँ
उन्हें नहीं चुनती बल्कि वे चुनते हैं कि उन्हें किस पार्टी से लड़ना है। उनके इसी बल को देखकर
उन्हें बाहुबली का नाम मिला है। कभी राजनीतिज्ञ अपराधियों का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल
करते थे अब अपराधियों ने दूसरे को लाभ पहुँचाने के बदले खुद ही कमान संभाल ली है। 2024
के लोकसभा चुनाव अभी दूर है मगर सियासी हल्ला गुल्ला अभी से मच गया है। चुनावों में
विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों को अपनी टिकट देकर
चुनाव मैदान में उतारने को लेकर देश में एक बार फिर सियासी बहस छिड़ गयी है।
राजनीति में शुचिता को लेकर ऊपरी तौर पर सभी सियासी दल सहमत है मगर व्यवहार में
उनकी कथनी और करनी में भारी अंतर है। लगभग सभी दल चुनाव जीतने के लिए ऐसे
उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारते है जो बाहुबली होने के साथ आपराधिक आचरण वाले
है। नेताओं के खिलाफ अदालती मुकदमें कोई नयी बात नहीं है। आजादी के बाद से ही नेताओं
को विभिन्न धाराओं में दर्ज मुकदमों का सामना करना पड़ रहा है। पिछले दो दशकों में ऐसे
मामलों में यकायक ही तेजी आयी। दर्ज मुकदमों में हत्या, हत्या के प्रयास, सरकारी धन का
दुरूपयोग, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे गंभीर प्रकृति के मुकदमें भी शामिल है। कई नामचीन नेता
आज भी जेलों में बंद होकर सजा भुगत रहे है और अनेक नेता जमानत पर बाहर आकर
मुकदमों का सामना कर रहे है। वर्षों से इन मुकदमों का फैसला नहीं होने से हमारी लोकतान्त्रिक
प्रणाली पर सवाल उठते रहे है। लम्बे मुकदमें चलने से सबूत मिलने में काफी परेशानी होती है
और अंततोगत्वा आरोपी बरी हो जाते है। सुप्रीम अदालत यदि ऐसे मुकदमों के शीघ्र निस्तारण
के लिए कोई सख्त कदम उठाये तो पीड़ितों को न्याय मिल पायेगा।
- बाल मुकुन्द ओझा