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उभरता हुआ खतरनाक भूजल प्रदूषक है-प्लास्टिक

उभरता हुआ खतरनाक भूजल प्रदूषक है-प्लास्टिक

आज का युग प्लास्टिक का युग है। प्लास्टिक का युग इसलिए कि आज दुनिया के हरेक देश में प्लास्टिक का जमकर प्रयोग किया जा रहा है। जहाँ देखो, जिस चीज को देखो, सब प्लास्टिक का ही बना नजर आता है।
शोध बताते हैं कि एक औसतन भारतीय हर साल करीब 10 किलोग्राम प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है और भारत में हर साल करीब 35 लाख टन घरेलू कचरा पैदा होता है। माइक्रोप्लास्टिक अब माउंट एवरेस्ट से लेकर महासागरों, नदियों, झीलों, पानी के स्रोतों, मिट्टी, वायु, पहाड़ों, मैदानों तक पूरे ग्रह को लगातार दूषित कर रहा है।हाल ही में विज्ञान पत्रिका पीएलओएस वन में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार दुनिया के महासागरों में प्लास्टिक कणों की औसत संख्या वर्ष 2019 तक 170 ट्रिलियन से अधिक हो गई है। कारण है आज दुनिया में प्लास्टिक एवं इससे बने, जुड़े प्रोडक्ट्स(उत्पादों) का तेजी से बाजार में उपयोग होना। वैज्ञानिकों ने बताया है कि यदि अभी से हमने प्लास्टिक पर रोक नहीं लगाई तो माइक्रोप्लास्टिक की तादाद वर्ष 2016 की तुलना में वर्ष 2040 के आते आते 2.6 गुना तक बढ़ जाएगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2016 में 122 ट्रिलियन माइक्रोप्लास्टिक समुद्र की सतह पर था। दरअसल,माइक्रोप्लास्टिक हवा में मौजूद प्लास्टिक के कण हैं, जो धूल मिट्टी में भी पाए जाते हैं।ये आकार में 5(पांच) मिलीमीटर से कम है, लेकिन 1(एक) माइक्रोमीटर से बड़े होते हैं।100 nm से नीचे के कणों को नैनो प्लास्टिक कहा जाता है। माइक्रोप्लास्टिक्स और नैनो प्लास्टिक्स दोनों आमतौर पर प्लास्टिक के बड़े टुकड़ों के टूटने से बनते हैं। एक हालिया अध्ययन में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक लाल रक्त कोशिकाओं की बाहरी झिल्लियों से चिपक सकता है और ऑक्सीजन के परिवहन की क्षमता को सीमित कर सकता है। माइक्रोप्लास्टिक के कण गर्भवती महिलाओं में फेफड़ों से दिल, दिमाग और भ्रूण के अन्य अंगों को तेजी से नुकसान पहुंचा सकते हैं।बहरहाल, यह अत्यंत गंभीर व संवेदनशील है कि आज माइक्रोप्लास्टिक न केवल समुद्र के भीतर का पूरा इकोसिस्टम प्रभावित कर रहा है, बल्कि यह संपूर्ण धरती के इकोसिस्टम को बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है। हाल ही में जो अध्ययन आया है वह हमें बताता है कि वर्ष 2040 तक माइक्रोप्लास्टिक की तादाद 317 ट्रिलियन का आंकड़ा छू लेगी। बताया गया है कि अभी समुद्र में करीब 14 बिलियन टन माइक्रोप्लास्टिक पहले से ही मौजूद है। वास्तव में आज प्लास्टिक की रि-साईक्लिंग की जा रही है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि हम प्लास्टिक की रि-साईक्लिंग की बजाय इसके उपयोग को घटाने की दिशा में काम करें। वास्तव में आज विश्व में प्लास्टिक का उपयोग करने की समस्त जिम्मेदारी उपभोक्ता की ही है, जबकि यह जिम्मेदारी उत्पादक पर तय की जानी चाहिए। जब प्लास्टिक का उत्पादन ही नहीं होगा तो उपभोक्ता तो अपने आप प्लास्टिक का उपयोग करना बंद कर देगा। हालांकि उपभोक्ता की भी अपनी जिम्मेदारियां हैं ही। उसे प्लास्टिक के उपयोग के बारे में, इसके हानिकारक प्रभावों के बारे में जानकारी तो होनी ही चाहिए व प्लास्टिक के उपयोग के बारे में सजगता व जागरूकता की भी बहुत आवश्यकता है। इसमें कोई भी दौराय व शक नहीं है कि अपने उत्पादन से लेकर इस्तेमाल तक सभी अवस्थाओं में प्लास्टिक पारिस्थितिकी तन्त्र(इको सिस्टम) के लिए भी खतरनाक है। यह वर्षों वर्षों तक भी गलता नहीं है और न ही नष्ट होता है। यदि हम यूं कहें कि आज 'प्लास्टिक प्रदूषण' पूरे विश्व की सबसे बड़ी और गंभीर समस्या है। प्लास्टिक को आसानी से अपघटित नहीं किया जा सकता है। भूमि, नदी, नालों व तालाबों में इकट्ठे प्लास्टिक अपशिष्ट, प्लास्टिक प्रदूषण फैलाते हैं। यह बहुत ही खतरनाक है। वास्तव में, प्लास्टिक ऐसे यौगिकों से बना है जिसे पूर्णतया नष्ट होने में 500 वर्ष या इससे भी अधिक तक का समय लग जाता हैं। प्लास्टिक प्रदूषण हमारे धरती के पारिस्थितिकी तंत्र को बहुत तेजी से दूषित कर रहा है। यह भूमि को बंजर बनाता है।प्लास्टिक कचरे से रिसने वाले हानिकारक रसायन जल में घुलकर उसे दूषित कर देते हैं। विश्व में होने वाली तेज़ जनसंख्या वृद्धि ने भी प्लास्टिक प्रदूषण को बढ़ावा दिया है।प्रतिवर्ष समुद्र में फेका जा रहा लगभग 8 मिलियन मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा जलीय जीवनतंत्र पर गंभीर परिणाम डाल रहा है।प्लास्टिक प्रदूषण के कारण हर वर्ष लगभग 10 करोड़ जलीव जीव मर जाते हैं। हाल ही में लंदन स्थित नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के वैज्ञानिकों ने प्लास्टिक से पक्षियों में होने वाली नई बीमारी 'प्लास्टिकोसिस' खोजी गई है। उन्होंने बताया है कि प्लास्टिक के महीन कण समुद्री पक्षियों के पाचन तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने बताया है कि प्लास्टिक निगलने पर पक्षी संक्रमण और परजीवियों के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं और भोजन को पचाने, कुछ विटामिनों को अवशोषित करने की उनकी क्षमता प्रभावित होने लगती है। अधिक प्लास्टिक से अधिक कोलेजन का निर्माण होता है जो कि स्कार टिश्यू (बीमारी, चोट या सर्जरी से सामान्य ऊतक के नष्ट होने पर बना रेशेदार ऊतक) का कारण बनता है। इससे रक्त की आपूर्ति बाधित हो सकती है। ऊतकों को नुकसान होने के साथ-साथ अंग काम करना बंद कर सकते हैं। हाल ही में जो पक्षियों में बीमारी पाई गई है वह ऑस्ट्रेलियाई पक्षी में पाई गई है। गंभीर बात यह निकली कि इन पक्षियों ने अपने वजन का 12.5 प्रतिशत प्लास्टिक निगला हुआ था। पशु-पक्षियों व जीवों में ही नहीं प्लास्टिक प्लास्टिक की मौजूदगी इंसानी नसों तक में मिली है। यह अब सिर्फ खिलौनों, बर्तन या किसी प्रोडक्ट विशेष तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि हमारी नसों में घुलने लगा है। यह बहुत ही खतरनाक है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने इंसानों नसों में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी का पता लगाया है। इसमें हर ग्राम ऊतक में माइक्रोप्लास्टिक के लगभग 15 कण मिले हैं। माना जा रहा है कि इसी तरह से हर हफ्ते हम लगभग एक क्रेडिट कार्ड जितना प्लास्टिक खा जाते हैं। दरअसल, पब्लिक लाइब्रेरी ऑफ साइंस के जर्नल प्लॉस वन में छपी स्टडी में पहली बार नसों में प्लास्टिक का पता लगा। सामने आया है कि ये सभी पार्टिकल्स अल्केड राल और पॉलीविनाइल एसिटेट के थे। ये वो चीजें हैं, जो पेंट, कपड़ों और पैकेजिंग के सामान में काम आती हैं। वास्तव में मानव शरीर में माइक्रोप्लास्टिक कणों की मौजूदगी किसी टाइम बम से कम नहीं है। माइक्रोप्लास्टिक हमारे शरीर को बहुत नुकसान पहुंचाता है और कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी को भी जन्म देता है। मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया व इंडोनेशिया के अध्ययनकर्ताओं ने विभिन्न रिपोर्ट्स में यह दावा किया है कि प्रति सप्ताह औसतन 5 ग्राम प्लास्टिक मानव शरीर में पहुंच रहा है। एक क्रेडिट कार्ड का वजन भी इतना ही होता है। ताजा अध्ययन के अनुसार, प्लास्टिक में करीब 10 हजार प्रकार के केमिकल पूरी दुनिया में बिना रोकटोक मिलाए जा रहे हैं। चीन सबसे ज्यादा प्लास्टिक प्रदूषण फैला रहा है, इसके बाद इंडोनेशिया है।आज मानव शरीर में माइक्रो-प्लास्टिक पहुंचाने का प्रमुख माध्यम समुद्री मछलियां बन चुकी हैं। अनुमान है कि 2050 तक समुद्र में पहुंचे प्लास्टिक का वजन मछलियों के कुल वजन से ज्यादा होगा। आज स्थिति यहाँ तक बताई जा रही है कि आधे से अधिक मानव अंगों में माइक्रो प्लास्टिक पहुंच चुका है। माइक्रोप्लास्टिक से कैंसर से लेकर अंदरुनी अंग फेल होने तक की आशंकाएं जताईं गई हैं, जो कि अत्यंत ही घातक है। आज कोल्ड ड्रिंक्स की बोतलों में आमतौर पर पीईटी प्लास्टिक का उपयोग किया जाता है। भोजन और अन्य उत्पादों की पैकेजिंग में पॉलीस्टाइनिन का उपयोग किया जाता है। प्लास्टिक बैग्स में पॉलीइथाइलीन का उपयोग होता है, जो किसी न किसी रूप में मानव शरीर में प्रवेश कर जाते हैं।नीदरलैंड में व्रीजे यूनिवर्सिटिट एम्स्टर्डम के एक इकोटॉक्सिकोलॉजिस्ट प्रोफेसर डिक वेथाक के अनुसार, “पिछले अध्ययनों से पता चला है कि वयस्कों की तुलना में शिशुओं के मल में माइक्रोप्लास्टिक 10 गुना अधिक था और प्लास्टिक की बोतलों से दूध पीने वाले बच्चे एक दिन में लाखों माइक्रोप्लास्टिक कण निगल रहे हैं। माइक्रोप्लास्टिक पार्टिकल्स पानी, नमक, मछली, बीयर, चीनी और शहद के साथ ह्यूमन बॉडी में एंट्री कर जाते हैं। ग्लोबल लेवल पर हर साल 11,845 से 1,93,200 माइक्रोप्लास्टिक पार्टिकल्स हर व्यक्ति निगलता है। इन पार्टिकल्स का सबसे बड़ा सोर्स ड्रिंकिंग वॉटर है, जिनमें नल का पानी और बॉटल में बंद पानी शामिल हैं। खाने और पीने की चीज़ों के अलावा घरों में मौजूद धूल के जरिए भी माइक्रोप्लास्टिक पार्टिकल्स ह्यूमन बॉडी के अंदर चले जाते हैं, जिससे मनुष्य को ज्यादा खतरा होता है। इससे हर दिन एक्सट्रा 26 से 130 माइक्रोप्लास्टिक पार्टिकल्स लंग्स के कॉन्टैक्ट में आते हैं। बॉटल बंद पानी में माइक्रोप्लास्टिक की सबसे ज्यादा मात्रा होती है और इसके कारण पैकेजिंग और प्रोसेसिंग हो सकते हैं।वास्तव में, माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत लैंडफिल साइट, ओपन डंपिंग और विनिर्माण इकाइयां हैं। माइक्रोप्लास्टिक आमतौर पर भारी वर्षा के दौरान फ्रैक्चर के माध्यम से जल प्रवाह के साथ भूजल प्रणाली में चले जाते हैं। उदाहरण के लिए सेप्टिक अपशिष्ट जल में हजारों माइक्रो फाइबर पॉलीमर (पॉलिएस्टर और पॉलिथीन) होते हैं। आमतौर पर घरेलू अपशिष्ट जल में फाइबर/सिंथेटिक उनके कपड़े धोने से छोटे-छोटे कणों का प्रवाह शुरू हो जाता है। एक आंकड़ा बताता है कि दुनिया भर में बनने वाला करीब 10 फीसदी प्लास्टिक अंत में समुद्रों में मिल जाता है। यह न केवल समुद्रों को प्रदूषित कर रहा है साथ ही वहां बसने वाले जीवों को भी नुकसान पहुंचा रहा है। चूंकि तटों पर प्लास्टिक कचरा ज्यादा मात्रा में जमा होता है, इसलिए समुद्र तट पर रहने वाले जीवों पर भी इसका व्यापक असर पड़ रहा है। वास्तव में माइक्रोप्लास्टिक एक उभरता हुआ भूजल प्रदूषक है, जिसके खतरे बड़े हैं। भारत में सिक्किम प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने वाला पहला राज्य है। वास्तव में, प्लास्टिक के बैग, पोलिथिन, एवं बर्तनों का कम उपयोग करने से हम पर्यावरण को बचा सकते हैं। हमें चाहिए कि हम जूट के बने,कागज के बने व कपड़े के बने थैलों आदि का उपयोग करें। मिट्टी से बने बरतनों को बढ़ावा दें। प्लास्टिक के बैग्स को फेंके नहीं और न ही कभी जलाएं।लकड़ी और कागज की तरह हम इसका(प्लास्टिक का) दहन करके भी इसे समाप्त नही कर सकते। क्योंकि प्लास्टिक के दहन से इससे कई सारी हानिकारक गैसे उत्पन्न होती है, जोकि पृथ्वी के वातावरण और जनजीवन के लिये काफी हानिकारक हैं। इस वजह से प्लास्टिक वायु, जल तथा भूमि तीनों तरह के प्रदूषण फैलाता है। आज सिंगल यूज प्लास्टिक के बने ईयर बड, बैलून स्टिक, झंडे, लॉलीपॉप की स्टिक, आइसक्रीम की स्टिक, प्लेट, कप, गिलास, कांटे, चम्मच, चाकू, स्ट्रॉ, ट्रे सहित मिठाई के डिब्बे पर लगने वाली पन्नी, निमंत्रण पत्र, सिगरेट पैकेट, थर्मोकॉल का सजावटी सामान, पीवीसी बैनर व 75 माइक्रॉन तक के पॉलिथीन पर 1 जुलाई 2022 से प्रतिबंध लागू किया गया है।पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मुताबिक, 1 जुलाई से पूरे देश में सिंगल-यूज वाली प्लास्टिक की वस्तुओं के निर्माण, आयात, स्टॉकिंग, वितरण, बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध है लेकिन बावजूद इसके हम इसका अपनी सहूलियत मात्र के लिए अंधाधुंध उपयोग करते हैं। तो आइए हम प्लास्टिक के उपयोग पर आमजन में जनजागरूकता फैलाएं, स्वयं भी जागरूक हों, क्यों कि प्लास्टिक हमारे स्वास्थ्य, हमारे पर्यावरण, हमारी धरती की पारिस्थितिकी को लगातार नुकसान पहुंचा रहा है।

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