लोकतंत्र के मंदिर में दागियों की सियासत
चुनाव आते हैं तो राजनीति और अपराध जगत का संबंध भी सुर्खियों में आ जाता है। अपराधियों को नेताओं
का समर्थन हो या नेताओं की अपराधियों को कानून के शिकंजे से बचाने की कोशिश, आखिर राजनैतिक
दलों पर अपराधियों का ये कैसा असर है। भारतीय लोकतंत्र में अपराधी इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं कि कोई
भी राजनीतिक दल उन्हें नजरअंदाज नहीं कर पा रहा। हालात यहाँ तक पहुँच गए है कि पार्टियाँ उन्हें नहीं
चुनती बल्कि वे चुनते हैं कि उन्हें किस पार्टी से लड़ना है। उनके इसी बल को देखकर उन्हें बाहुबली का नाम
मिला है। कभी राजनीतिज्ञ अपराधियों का अपने लाभ के लिए इस्तेमाल करते थे अब अपराधियों ने दूसरे
को लाभ पहुँचाने के बदले खुद ही कमान संभाल ली है।
हम बात कर रहे है राजस्थान, मध्य प्रदेश, छतीसगढ, तेलंगाना और मिजोरम विधानसभा चुनावों की।
पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में विभिन्न राजनैतिक दलों द्वारा आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों
को अपनी टिकट देकर चुनाव मैदान में उतारने को लेकर देश में एक बार फिर सियासी बहस छिड़ गयी है।
चुनाव परिणामों से पूर्व मंगलवार को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने एक रिपोर्ट जारी
की है। इस रिपोर्ट के अनुसार, पांचों राज्यों में चुनाव लड़ने वाले करीब 18 प्रतिशत उम्मीदवारों ने अपने
खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं। ADR ने मिजोरम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान और
तेलंगाना में चुनाव मैदान में 8,054 उम्मीदवारों में से 8,051 के हलफनामों (स्व-घोषित शपथ पत्र) की जांच
की। रिपोर्ट के मुताबिक, 1,452 उम्मीदवारों (18 प्रतिशत ) के खिलाफ आपराधिक मामले हैं, जबकि 959
(12 प्रतिशत) के खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। 22 उम्मीदवारों ने अपने खिलाफ हत्या से
संबंधित मामले घोषित किए हैं। 82 ने हत्या के प्रयास से संबंधित मामले घोषित किए हैं। 107 ने
महिलाओं के खिलाफ अपराध से संबंधित मामले घोषित किए हैं। इनमें राजस्थान में 326, मध्य प्रदेश में
472, छतीसगढ़ में 126 ,तेलंगाना में 529 और मिजोरम में 7 उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण
दर्ज है। दागियों पर सभी पार्टियों ने अपना विश्वास व्यक्त किया है। रिपोर्ट में कहा गया कि पांच राज्यों के
विधानसभा चुनावों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन नहीं किया गया है। राजनीतिक दलों ने फिर से दागी
को टिकट देने की अपनी पुरानी परंपरा का पालन किया है।
राजनीति में शुचिता को लेकर ऊपरी तौर पर सभी सियासी दल सहमत है मगर व्यवहार में उनकी कथनी
और करनी में भारी अंतर है। लगभग सभी दल चुनाव जीतने के लिए ऐसे उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में
उतारते है जो बाहुबली होने के साथ आपराधिक आचरण वाले है। नेताओं के खिलाफ अदालती मुकदमें कोई
नयी बात नहीं है। आजादी के बाद से ही नेताओं को विभिन्न धाराओं में दर्ज मुकदमों का सामना करना पड़
रहा है। पिछले दो दशकों में ऐसे मामलों में यकायक ही तेजी आयी। दर्ज मुकदमों में हत्या, हत्या के प्रयास,
सरकारी धन का दुरूपयोग, भ्रष्टाचार, बलात्कार जैसे गंभीर प्रकृति के मुकदमें भी शामिल है। कई नामचीन
नेता आज भी जेलों में बंद होकर सजा भुगत रहे है और अनेक नेता जमानत पर बाहर आकर मुकदमों का
सामना कर रहे है। वर्षों से इन मुकदमों का फैसला नहीं होने से हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली पर सवाल उठते
रहे है। लम्बे मुकदमें चलने से सबूत मिलने में काफी परेशानी होती है और अंततोगत्वा आरोपी बरी हो जाते
है। सुप्रीम अदालत यदि ऐसे मुकदमों के शीघ्र निस्तारण के लिए कोई सख्त कदम उठाये तो पीड़ितों को
न्याय मिल पायेगा।
पिछले सालों में देश में जिस तरह हमारी राजनीति का अपराधीकरण हुआ है और आपराधिक तत्वों की
ताकत बढ़ी है, वह जनतंत्र में हमारी आस्था को कमजोर बनाने वाली बात है। राजनीतिक दलों द्वारा
अपराधियों को शह देना, जनता द्वारा वोट देकर उन्हें स्वीकृति और सम्मान देना और फिर कानूनी प्रक्रिया
की कछुआ चाल, यह सब मिलकर हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था और जनतंत्र के प्रति हमारी निष्ठा, दोनों, को
सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं।
प्रधानमंत्रीजी आपने वादा किया था देश को दागी राजनीति से मुक्त कराने का। दो चार परिवारों पर
कार्यवाही से देश इस दंश से मुक्त नहीं होगा। आज हर दल में दागी शीर्ष पर बैठे है। वे देश के भाग्यविधाता
बन बैठे है। थोड़ी हिम्मत दिखाइए और इन काले नागों का फन कुचल दीजिये। पूरा देश आपको सदियों याद
रखेगा। दागी राजनीति को समाप्त करने में आपके अप्रतिम योगदान को इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा
जायेगा।