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भारत में तेजी से घट रही हैं गरीबी

भारत में तेजी से घट रही हैं गरीबी

भारत की गरीबी आज भी आंकड़ों के भ्रम जाल में उलझी हुई है। आजादी के 76 सालों के बाद भारत में गरीब
और गरीबी पर लगातार अध्ययन और खुलासा हो रहा है। मोदी सरकार संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट पर
खुश हो सकती है। इस रिपोर्ट में भारत में गरीबी के विरुद्ध लड़ाई में भारत सरकार के प्रयासों की सराहना
की गई है। रिपोर्ट की माने तो गरीबी कम करने के मामले में भारत को बड़ी कामयाबी मिली है। भारत में
गरीबी को लेकर संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट जारी हुई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत ने पिछले 15
सालों में गरीबों की संख्या में गिरावट आई है। इस रिपोर्ट में 110 देशों के छह अरब से ज्यादा लोगों का डेटा
लिया गया है। भारत में साल 2005-06 से साल 2019-2021 के दौरान सिर्फ 15 साल में 41.5 करोड़ लोग
गरीबी से बाहर निकले हैं। वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक के ताजा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया की
सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत ने गरीबी उन्मूलन के मोर्चे पर काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। 2005-
06 में भारत में लगभग 64.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी में थे। 2015-16 में यह संख्या घटकर लगभग
37 करोड़ पर और 2019-21 में 23 करोड़ पर आ गई। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 2005/06 से लेकर
2015/16 तक गरीबी से 275 मिलियन यानी कि 27.5 करोड़ लोग बाहर आए, जबकि 2015/16 से लेकर
2019/21 तक 140 मिलियन यानी कि 14 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए। रिपोर्ट के मुताबिक भारत की
प्रगति ये बताती है कि बड़े पैमाने पर भी गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य संभव है। भारत में गरीबी के आंकड़ों पर
बहस चलती रहती है। वर्ल्ड बैंक की एक स्टडी के मुताबिक 2011 में 22.5 फीसदी गरीबी थी जो 2019 में
घटकर 10.2 फीसदी रह गई। एक अन्य अनुमान के अनुसार भारत में छह साल में गरीबी में भारी गिरावट
आई है।
कुछ सर्वेक्षणों में मोदी राज में भारत में गरीबी घटने की बात कही गयी थी तो कुछ सर्वेक्षणों में गरीबी बढ़ती
बताई जा रही है। कुल मिलकर देखा जाये तो देश की गरीबी आंकड़ों के मायाजाल में फंसी दिखाई दे रही है।
विभिन्न स्तरों पर गरीबी खत्म किये जाने के दावे स्वतंत्र विश्लेषक सही नहीं मानते है। मगर यह अवश्य
कहा जा सकता है कि पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन के प्रयास जरूर सिरे चढ़े है। सरकारी स्तर पर
यदि ईमानदारी से प्रयास किये जाये और जनधन का दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से
मुक्त हो सकता है।
तमाम दावों और प्रतिदावों के बावजूद दुनिया भर में भूखे पेट सोने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। यह
संख्या आज भी तेजी से बढती जा रही है। विश्व में आज भी कई लोग ऐसे हैं, जो भूखमरी से जूझ रहे हैं।

विश्व की आबादी वर्ष 2050 तक नौ अरब होने का अनुमान लगाया जा रहा है और इसमें करीब 80 फीसदी
लोग विकासशील देशों में रहेंगे। एक ओर हमारे और आपके घर में रोज सुबह रात का बचा हुआ खाना बासी
समझकर फेंक दिया जाता है तो वहीं दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक वक्त का खाना तक नसीब
नहीं होता और वह भूख से मर रहे हैं। कमोबेश हर विकसित और विकासशील देश की यही कहानी है। दुनिया
में पैदा किए जाने वाले खाद्य पदार्थ में से करीब आधा हर साल बिना खाए सड़ जाता है।
भारत में गरीबी उन्मूलन और खाद्य सहायता कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद
कुपोषण लगातार एक बड़ी समस्या बनी हुई है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से
ग्रस्त होने का खतरा लगातार बना रहता है। इसके अलावा करोड़ों बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास
नहीं हो पाता है क्योंकि उन्हें अपने शुरुआती वर्षों में पूरा पोषण नहीं मिल पाता है।
विभिन्न स्तरों पर गरीबी खत्म किये जाने के दावे स्वतंत्र विश्लेषक सही नहीं मानते है। मगर यह अवश्य
कहा जा सकता है कि पिछले एक दशक में गरीबी उन्मूलन के प्रयास जरूर सिरे चढ़े है। सरकारी स्तर पर
यदि ईमानदारी से प्रयास किये जाये और जनधन का दुरूपयोग नहीं हो तो भारत शीघ्र गरीबी के अभिशाप से
मुक्त हो सकता है।

- बाल मुकुन्द ओझा

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