राज्यपाल को ‘अर्ली हिस्ट्री ऑफ राजस्थान’ पुस्तक भेंट की
जयपुर । राजभवन में राज्यपाल हरीभाऊ किशनराव बागड़े को प्रेमलता पोखरना द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘अर्ली हिस्ट्री ऑफ राजस्थान’ की प्रति भेंट की गई। राज्यपाल ने पुस्तक का अवलोकन कर प्रति पर अंबेडकर जयंती की शुभकामनाएं व हस्ताक्षर कर इसकी सराहना की। भेंट के दौरान राज्यपाल को प्रेमलता पोखरना ने पुस्तक की विस्तार से जानकारी दी । साथ ही राज्यपाल को राजस्थान से महाराष्ट्र के प्राचीन संबंधों से अवगत कराते हुए बताया कि बागड़, बगड़ावत, बागड़ी आदि राजस्थान में प्रसिद्ध है। दैनिक जलतेदीप और माणक पत्रिका के प्रबंध संपादक दीपक मेहता ने राजस्थानी पत्रिका माणक भेंट करते हुए राजस्थान विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा और संस्कृति विभाग शुरू करने की मांग की, साथ ही हाल ही में हुए इस सम्बंध में छात्रों के आंदोलन की जानकारी भी दी। इव मौके प्रेमलता पोखरना के साथ, अनिरुद्ध सिंह राठौड़, दीपक मेहता, डॉ. यूएस पोखरना, मीनल पोखरना एवं फतेह पोखरना भी मौजूद रहे।
पुरतक के बारे में :-यह पुस्तक राजस्थान के प्रारंभिक इतिहास को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करती है। इसमें गुप्त काल से पहले, गुप्त काल और उसके बाद के समय का विस्तृत अध्ययन किया गया है। इसमें विभिन्न राजपूत राजवंशों के उत्थान, विस्तार तथा बाहरी आक्रमणों विशेष रूप से हूण, पर्सियन और शक जनजातियों के भारत पर प्रभाव का विश्लेषण किया है। पुस्तक में शिलालेख, सिक्कों (मुद्राशास्त्र) और साहित्यिक स्रोतों के आधार पर घटनाओं को क्रमबद्ध तरीके से समझाया गया है। साथ ही, उस समय की सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परिस्थितियों पर भी प्रकाश डाला गया है।
लेखिका के बारे में :- इस पुस्तक की लेखिका प्रेम लता पोखरना एक जानी-मानी मुद्रा विशेषज्ञ (न्यूमिस्मैटिस्ट) और इतिहासकार हैं। उन्होंने राजस्थान सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग में कार्य करते हुए मुद्रा विज्ञान और इतिहास के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके शोध कार्य कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। उन्होंने “Coins and Coin Hoards of Rajasthan” और “Coins of North India” एवं “Punchmark coins of Rajasthan” जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनमें प्राचीन सिक्कों और उनके इतिहास का विस्तृत अध्ययन किया गया है। उनकी पुस्तकों को विश्वविद्यालय स्तर पर, विशेषकर मुंबई और दिल्ली विश्वविद्यालय में, संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी मान्यता मिली है। उन्हें भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद और संस्कृति विभाग द्वारा वरिष्ठ फेलोशिप से सम्मानित किया गया। साथ ही, उन्हें 2005 में रॉयल न्यूमिस्मैटिक सोसायटी, लंदन की फेलोशिप और 2007 में महाराणा कुम्भा पुरस्कार भी प्राप्त हुआ।