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जन जीवन की रक्षक है नदियां

जन जीवन की रक्षक है नदियां

नदियों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कार्रवाई दिवस हर वर्ष 14 मार्च को मनाया जाता है। यह एकजुटता के लिए
समर्पित एक दिन है, जब दुनिया भर के अलग-अलग समुदाय एक साथ आकर नदियों के महत्व के बारे में बात
करते हैं। एक वैश्विक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में हर दिन 20 लाख टन सीवेज, औद्योगिक और कृषि
अपशिष्ट पानी में छोड़े जाते हैं। यह 6.8 अरब लोगों की पूरी मानव आबादी के वजन के बराबर है। इसलिए
अब समय आ गया है कि हम मानवता की भलाई के लिए अपनी नदियों को बचाएं। यह दिन नदियों के
प्रबंधन, प्रदूषण और संरक्षण से जुड़े मुद्दों को हल करने से संबंधित है। इस साल की थीम सभी के लिए जल पर
केंद्रित है । यह एक ऐसा दिन है जो पानी के हमारे जीवनदायी स्रोत को बचाने जश्न मनाने और अपने आसपास
के लोगों को जागरूक करने के लिए समर्पित है। यदि नदियों को आर्थिक उद्देश्यों के लिए संरक्षित और उपयोग
करना है, तो एकजुटता महत्वपूर्ण है और लोगों को सीमाओं के पार नदी प्रबंधन के लिए प्रतिबद्ध होना
चाहिए।
आदिकाल से जीवनदायिनी रही हमारी पवित्र नदियां आज खुद दम तोड़ रही हैं। नदियों और झीलों के रूप में
पानी के प्रचुर प्राकृतिक स्रोतों पर विचार करते हुए देखे तो भारत एक समृद्ध देश है। देश को नदियों की भूमि
के रूप में उल्लेखित किया जा सकता है, भारत के लोग नदियों की पूजा देवी और देवताओं के रूप में करते हैं।
लेकिन क्या विडंबना है कि नदियों के प्रति हमारा गहन सम्मान और श्रद्धा होने के बावजूद, हम उसकी
पवित्रता, स्वच्छता और भौतिक कल्याण बनाए रखने में सक्षम नहीं हैं। हमारी मातृभूमि पर बहने वाली गंगा,
यमुना, ब्रह्मपुत्र और कावेरी या कोई अन्य नदी हो, कोई भी प्रदूषण से मुक्त नहीं है। नदियों के प्रदूषण के कारण
पर्यावरण में मनुष्यों, पशुओं, मछलियों और पक्षियों को प्रभावित करने वाली गंभीर जलजनित बीमारियाँ
और स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं।
हमारी पवित्र नदियां आज कूड़ा घर बन जाने से कराह रही हैं, दम तोड़ रही हैं। गंगा, यमुना, घाघरा, बेतवा,
सरयू, गोमती, काली, आमी, राप्ती, केन एवं मंदाकिनी आदि नदियों के सामने खुद का अस्तित्व बरकरार रखने
की चिंता उत्पन्न हो गई है। बालू के नाम पर नदियों के तट पर कब्जा करके बैठे माफियाओं एवं उद्योगों ने
नदियों की सुरम्यता को अशांत कर दिया है। प्रदूषण फैलाने और पर्यावरण को नष्ट करने वाले तत्वों को
संरक्षण हासिल है। वे जलस्रोतों को पाट कर दिन-रात लूट के खेल में लगे हुए हैं। केंद्र ने भले ही उत्तर प्रदेश
सरकार की सात हजार करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना अपर गंगा केनाल एक्सप्रेस-वे पर जांच पूरी
होने तक तत्काल रोक लगाने के आदेश दे दिए हों, लेकिन नदियों के साथ छेड़छाड़ और अपने स्वार्थों के लिए
उन्हें समाप्त करने की साजिश निरंतर चल रही है। गंगा एक्सप्रेस-वे से लेकर गंगा नदी के इर्द-गिर्द रहने वाले
50 हजार से ज्यादा दुर्लभ पशु-पक्षियों के समाप्त हो जाने का ख़तरा भले ही केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय
की पहल पर रुक गया हो, लेकिन समाप्त नहीं हुआ। गंगा और यमुना के मैदानी भागों में माफियाओं एवं
सत्ताधीशों की मिलीभगत साफ दिखाई देती है। नदियों के मुहाने और पाट स्वार्थों की बलिवेदी पर नीलाम हो
रहे हैं।
नदियाँ प्रकृति की दी हुई वे नियामत हैं, जो अपने आंचल में ढेर सारा पानी प्रवाहित कर करोड़ों जीवों की
प्यास शांत करती हैं। किसानों को अन्न जल से नवाजती हैं। अपनी इसी मातृ वत्सला वृत्ति के कारण नदियों को

माँ स्वरुप सम्मान प्राप्त है, लेकिन विकास की अंधी हवस ने हमें माँ के प्रति अपने दायित्वों से विमुक्त कर दिया
है। तभी आदि देव दिवाकर व भगवती गोदावरी की पुत्री सई नदी (जिसका जिक्र रामचरित मानस में भी
किया गया है) काल कवलित हो रही है। कभी गंगा के समान पवित्र मानकर लोग इसके पानी का प्रयोग भोजन
बनाने में करते थे। आज गंदी व प्रदूषण के कारण खाने की बात तो छोडिये लोग नहाने से भी डर रहे हैं । 

 - बाल मुकुन्द ओझा 

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