सड़कें बन रहीं सुरक्षित कम, जानलेवा ज़्यादा
हाल ही में जारी वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में हर साल लाखों लोग सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं और इनमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी कार दुर्घटनाओं की है। तेज़ रफ्तार, नियमों की अनदेखी और लापरवाह ड्राइविंग ने सड़कों को मौत का कुआं बना दिया है। दुनिया भर में सड़क सुरक्षा आज एक गंभीर वैश्विक चुनौती बन चुकी है। दुनिया में सबसे ज्यादा सड़क दुर्घटनाओं वाले शीर्ष 5 देशों में भारत, चीन, अमेरिका, ब्राजील और रूस शामिल हैं। इन देशों में खराब सड़क बुनियादी ढांचे, तेज़ गति, यातायात नियमों की अनदेखी और अधिक जनसंख्या के कारण सड़क हादसों और मौतों की दर सबसे अधिक है, जहां भारत में हर 4 मिनट में एक व्यक्ति की जान चली जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि व्यापक और सतत जागरूकता अभियान नहीं चलाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराता जाएगा।
वैश्विक स्तर पर देखें तो संयुक्त राज्य अमेरिका में 2024 में सबसे अधिक, यानी 1.9 मिलियन से ज्यादा कार दुर्घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें 36 हजार से अधिक लोगों की मौत और 2.7 मिलियन से अधिक लोग घायल हुए। प्रति मिलियन आबादी पर औसतन 5,938 दुर्घटनाएं हुईं। अमेरिका में जागरूकता अभियान चलने के बावजूद दुर्घटनाओं का ग्राफ नीचे नहीं आ पा रहा और कार दुर्घटनाएं एक गंभीर समस्या बनी हुई हैं। विश्व के शीर्ष पांच देशों में जहां सड़क हादसे सबसे अधिक होते हैं, उनमें भारत, चीन, अमेरिका, ब्राजील और रूस शामिल हैं। खराब सड़क डिजाइन, तेज़ गति, बढ़ती आबादी और यातायात नियमों की अनदेखी इन देशों में मौतों की बड़ी वजह बन रही है।
भारत की स्थिति वैश्विक परिदृश्य में सबसे अधिक चिंताजनक है। विश्व की केवल 1 प्रतिशत कारें भारत में हैं, लेकिन सड़क दुर्घटनाओं से होने वाली कुल मौतों का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा यहीं दर्ज होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सड़क हादसों से होने वाली मौतों के मामले में भारत पहले स्थान पर है। हर वर्ष करीब साढ़े चार लाख दुर्घटनाएं होती हैं और औसतन हर तीन से चार मिनट में एक व्यक्ति सड़क पर दम तोड़ देता है। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि हर बार किसी घर का उजड़ जाना, किसी परिवार का सहारा छिन जाना है।
सबसे दुखद तथ्य यह है कि सड़क दुर्घटनाओं में जान गंवाने वालों में सबसे बड़ी संख्या 18 से 35 वर्ष के युवाओं की है। यही वह वर्ग है जिसे देश की सबसे सक्रिय, ऊर्जावान और उत्पादक आबादी माना जाता है। सड़क हादसे न केवल परिवारों को तोड़ते हैं, बल्कि देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति पर भी गहरा असर डालते हैं। एक युवा की मौत का मतलब केवल एक जान का जाना नहीं, बल्कि वर्षों की संभावनाओं का समाप्त हो जाना है।
सरकारी आंकड़े इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। वर्ष 2023 में देश में लगभग 4.8 लाख सड़क दुर्घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें 1.72 लाख से अधिक लोगों की जान चली गई। 2024 में यह आंकड़ा और बढ़कर 1.77 लाख मौतों तक पहुंच गया, यानी हर दिन औसतन 485 लोगों की जान गई। राष्ट्रीय राजमार्ग, जो देश के कुल सड़क नेटवर्क का मात्र 2 प्रतिशत हैं, उन पर 31 प्रतिशत मौतें दर्ज की गईं।
ताज़ा आंकड़े 2024 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर 52,609 (लगभग 31% हिस्सा) लोग मारे गए। 2025 के पहले 6 महीनों में 26,770 से अधिक मौतें दर्ज की गई हैं।
यह तथ्य बताता है कि बेहतर और चौड़ी सड़कें जहां सुविधा देती हैं, वहीं तेज़ रफ्तार को भी बढ़ावा देती हैं। आंकड़ों पर नजर डाले तो 58% से अधिक मौतें ओवर स्पीड के कारण होती हैं।
राज्यवार स्थिति पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक सड़क दु र्घटनाओं में मौतों के लिहाज से लगातार शीर्ष पर बने हुए हैं। हादसों की संख्या के मामले में तमिलनाडु सबसे आगे है, लेकिन बीते साल में मौतों की संख्या उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक दर्ज की गई। सड़क हादसों में हुईं मौतों के मामलों में यूपी दुनिया के कई देशों को पीछे छोड़ता है। इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी एजुकेशन (IRTE) की रिपोर्ट के अनुसार, यूपी में हर साल करीब 24 हजार लोग अपनी जान गंवाते हैं। प्रतिदिन हुई मौतों के लिहाज से देखें तो यह संख्या 65 के आसपास आती है। तमिलनाडू में हादसों की संख्या करीब 14 फीसदी के करीब, मध्यप्रदेश में 11.8 फीसदी, केरल में 9.5 फीसदी और उत्तर प्रदेश में 9 फीसदी है। जबकि मौत के मामले में उत्तरप्रदेश 14 फीसदी है। उसके बाद में तमिलनाडू, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और कर्नाटक आते हैं।
राजस्थान की तस्वीर भी कम भयावह नहीं है। कुल सड़क नेटवर्क में राज्य की हिस्सेदारी भले ही 3.4 प्रतिशत हो, लेकिन घातक दुर्घटनाओं में इसका अनुपात कहीं अधिक है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान सड़क दुर्घटनाओं के मामले में देश में सातवें और मौतों के मामले में छठे पायदान पर है। प्रदेश में हर साल सड़क दुर्घटनाओं में दस हजार से अधिक लोग अपनी जान गवां देते हॅै। 2023 के आंकड़ों के अनुसार, राज्य में प्रतिदिन 30 से अधिक मौतें सड़क हादसों में हो रही हैं। हर साल राज्य में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सात हजार से अधिक दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें चार हजार से ज्यादा लोगों की जान गई।
विशेषज्ञों के अनुसार सड़क दुर्घटनाओं में मौतों की बड़ी वजह तेज़ गति है। बेहतर मखमल जैसी सड़कें और लंबे, सीधे हाईवे वाहन चालकों को तेज रफ्तार से वाहन चलाने के लिए प्रेरित करते हैं। पश्चिमी राजस्थान में सैकड़ों किलोमीटर तक बिना मोड़ वाली सड़कें हैं, जहां थकान या झपकी जानलेवा साबित हो रही है। इसके अलावा आवारा मवेशी, गलत ओवरटेकिंग, लेन ड्राइविंग का पालन न करना, सीट बेल्ट नहीं लगाना और नशे में वाहन चलाना दुर्घटनाओं के प्रमुख कारण हैं।
दौसा जिला इस संकट का जीता-जागता उदाहरण बन गया है। वर्ष 2024 में यहां 713 दुर्घटनाएं हुईं, जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 737 पहुंच गई। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि बेहतर सड़कों के बावजूद मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है, जो बताता है कि समस्या केवल इंफ्रास्ट्रक्चर की नहीं, बल्कि व्यवहार की भी है।
सरकार हर साल सड़क सुरक्षा पखवाड़ा मना कर लोगों को जागरूक करती है। इसके बावजूद सड़क दुर्घटनाएं घटने के बजाय बढ़ती जा रही है। सरकार नए मोटर व्हीकल एक्ट के तहत यातायात नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माने बढ़ाए हैं, हेलमेट और सीट बेल्ट को अनिवार्य किया है और ऑटोमैटिक चालान प्रणाली लागू की है। बावजूद इसके, नशे में ड्राइविंग के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। वर्ष 2024 में राजस्थान में 40 हजार से अधिक चालक शराब के नशे में पकड़े गए, जबकि 2025 में यह संख्या और बढ़ गई। अकेले जयपुर–बांदीकुई एक्सप्रेसवे पर वर्ष 2024 में करीब 5 हजार ओवरस्पीड के चालान काटे गए थे, वहीं 2025 में यह संख्या बढक़र करीब 40 हजार हो गई। यानी ओवरस्पीडिंग पर कार्रवाई में लगभग 9 गुना इजाफा हुआ है। इसके साथ ही राज्य में 900 से अधिक ब्लैक स्पॉट चिह्नित किए गए हैं, जहां हादसों का खतरा हमेशा बना रहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सड़क सुरक्षा को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि निरंतर मिशन के रूप में लेना होगा। स्पीड लिमिट का सख्त पालन, ब्लैक स्पॉट्स पर इंजीनियरिंग सुधार, पर्याप्त रोशनी, बेहतर साइन बोर्ड, हाईवे पेट्रोलिंग और दुर्घटना के बाद त्वरित चिकित्सा सहायता से हजारों जानें बचाई जा सकती हैं। साथ ही, जनता को भी यह समझना होगा कि सड़क केवल चलने की जगह नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का साझा मंच है।
हाईवे और एक्सप्रेसवे विकास के प्रतीक हैं, लेकिन यदि रफ्तार पर लगाम नहीं लगी, तो यही सड़कें मौत की राह बन जाएंगी। जरूरत है संतुलन की—रफ्तार भी हो, लेकिन सुरक्षा के साथ। तभी विकास का यह सफर सच मायनों में सुरक्षित कहा जा सकेगा।
-देवेंद्र सिंह