‘‘सरहद’’ स्थित विरासत को बचाओं
जयपुर शहर के निर्माण की नींव महाराजा सवाई जयसिंह ने सन् 1726 में रखी थी। विश्व विख्यात नगर नियोजन, वास्तु शिल्प एवं स्थापत्य कला से रचा-बसा जयपुर, वर्गाकार सिद्धान्त पर बसाया गया था। विश्व के गिने चुने शहरों में एक इस नियोजित शहर की वास्तुकला जगत प्रसिद्ध है। वर्गाकार सिद्धान्त पर बसाई गई सर्वप्रथम चौकडी को ‘‘सरहद’’ का नाम दिया गया। ‘‘सरहद’’ सुमेर पर्वत की प्रतीक है। इसे सर्वोच्च एवं प्रथम स्थान माना गया। इसमें राजमहल, सभी प्रमुख एवं शासकीय भवनों का निर्माण किया गया।
सवाई जयसिंह ने जो निर्माण कार्य कराये उनमें वास्तुकला का ध्यान रखा गया था। कड़े नियोजन के साथ रंग, निर्माण सामग्री, खिड़की, दरवाजे, बाहरी सुन्दरता के साथ निर्माणर्शली का ध्यान रखा गया। राजमहल के पास सूर्य महल जहां जयपुर के आराध्य देव गोविन्द देव जी का भव्य मंदिर है, जयनिवास उद्यान, बादल महल, तालकटोरा, पौण्डरिक उद्यान, राजामल का तालाब आदि निर्मित किये गये। सवाई जयसिंह के पश्चात ईश्वरी सिंह ने ईसरलाट (सरगासूली) का निर्माण कराया। सवाई प्रताप सिंह ने इसी क्षेत्र में जयपुर को अधिक सुन्दर बनाने वाले अनेक भवनों और मंदिरों का निर्माण कराया गया जिसमें सबसे प्रमुख विश्व प्रसिद्ध हवामहल व सवाई मानसिंह टाउन हॉल है।
महाराजा सवाई रामसिंह द्वितीय ने चौकड़ी सरहद में सिरहढ्योडी दरवाजा, रामप्रकाश नाटकघर बनाया जो एशिया में सर्वप्रथम श्रेष्ठ नाटकघर में गिना गया। उन्होंने इस क्षेत्र में महाराजा संस्कृत कालेज, हवामहल के सामने महाराजा कालेज, स्कूलें, कन्या पाठशाला की स्थापना की। उन्होंने नगर को गुलाबी रंग प्रदान किया, तभी से यह ‘‘पिंक सिटी’’ बना। इसी क्षेत्र से गणगौर व तीज की सवारी जनानी ढ्योडी से रवाना होकर मुख्य बाजारों से निकलते हुए गणगौरी बाजार होती हुई, चौगान होते हुए तालकटोरा पहुंचती है। इस क्षेत्र में साहित्य, धर्मशास्त्र और नाटक व अनेक हस्तलिखित ग्रंथ से युक्त पोथीखाना, शस्त्रागार, कोषागार, तोषाखाना, तातारखाना, दीवाने खास, दीवाने आम, सिरहढ्योडी दरवाजा व त्रिपोलिया दरवाजा आदि बनाये गये।
इस चौकड़ी में रियासत काल के सभी ऐतिहासिक और पारम्परिक स्वरूप को दर्शाने वाले स्थानों की एक लम्बी फेरहिस्त है। उत्तर भारत का प्रमुख देवालय गोविन्द देव मन्दिर, ईसरलाट, जंतर मंतर, स्वर्ण कलश जड़ित सप्तखण्डीय चन्द्र महल, झरोखों और खिड़कियों से सुसज्जीत हवामहल, सवाई मानसिंह टाउन हॉल, राम प्रकाश टॉकीज, तालकटोरा, पौण्ड्रीक जी का बाग व वास्तुकला का समावेश लिए अनेक विख्यात मंदिर, भव्य कलात्मक वास्तुशैली से निर्मित गैटोर की छतरियां, जयनिवास उद्यान, बादल महल, तालकटोरा, चौगान, ब्रह्मपुरी, राजाशाही जमाने की चांदी की टकसाल, आतिशखाना, हाथीखाना, गुणीजनखाना, रथखाना, फर्रासखाना, जनानी ढ्योडी, श्रीजी की मोरी, काला हनुमान मंदिर आदि है। इसी क्षेत्र में राजमहल है, सुर है, संगीत है, धर्म है, भक्ति है, हवेलियां है, दुर्ग है, झीलें है, मेले हैं, त्यौहार हैं, पर्यटन स्थल है, पुरातत्व है, हस्तशिल्प और कला है।
जयपुर की प्रमुख औद्योगिक हस्तकला कार्य सांगानेर व बगरू की छपाई, जयपुरी बंधेज, धातुओं पर मीनाकारी, हाथी दांत व संगमरमर पर मीनाकारी, नगीनों की कटाई व जड़ाई, कालीन निर्माण आदि के विक्रय हेतु बड़ी चौपड़ के पास सिरहढ्योडी बाजार हैे। चौगान स्टेडियम का एक विशेष महत्व था। चौगान का उपयोग धार्मिक उत्सवों व पर्वो के लिए सुरक्षित रखा गया। इस चौगान का क्षेत्रफल 500ग349 गज है। इसका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व है। हाथी, घोड़ों व मैंढ़ों की लड़ाई का बंदोबस्त चौगान में होता था। चीनी की बुर्ज में जहां महाराजा के बैठने का इंतजाम होता वहीं से बादल महल की छत पर जाया जाता था। सिक्कों की ढलाई के लिए चांदी की टकसाल थी।
गोविन्द देव जी के भव्य मंदिर के पीछे जयनिवास उद्यान में गंगा जी का मंदिर व गोपाल जी का मंदिर है। गोपाल जी का विग्रह तो सवाई माधोसिंह जी के साथ इंग्लैंड भी गया था जिसे देखने इंग्लैंड की जनता भारी संख्या में उमड़ पड़ी थी। चन्द्र महल स्थित राजराजेश्वर मंदिर, वैष्णव समन्वय का प्रमाण है। कृष्ण बिहारी मंदिर, ब्रजनिधि मंदिर का निर्माण महाराजा प्रताप सिंह ने चांदनी चौक में कराया। यही पर प्रतापेष्वर महादेव मंदिर, निंबार्क मंदिर, सिरहढ्योडी दरवाजे से निकलते ही रामचन्द्र जी का 7 चौक का विशाल मंदिर व कलकी जी मंदिर है। यही गरीबों की विपदा हटाने के लिए सदाव्रत की व्यवस्था थी। बलदाऊ जी का मंदिर, बड़ी चौपड़ पर बाई जी का मंदिर, शिखर मंदिर, छोटी चौपड़ पर 2 हाथियों वाला चतुर्भुज का मंदिर स्थित है। सभी मंदिर भव्य गुम्बदों, मेहराबों, कलशों से सजे हुए थे। जयपुर के मंदिरों की स्थापत्य कला में एक प्रमुख पहचान, शैली व स्थान था। कलात्मक बनाये गये मंदिरों में विशाल दालान है। छत पर छोटी-छोटी दूरी पर कटावदार मेहराब सहित छतरियां रखी गई।
सभी मुख्य प्रशासनिक विभाग, वफ्फ विभाग, धर्म मर्यादा सभा, राजामल का तालाब, तालकटोरा, जयनिवास बाग, गुणीजनखाना, रथखाना, आतिशखाना, हाथीखाना, जनानी ढ्योडी, श्रीजी की मोरी, जंतर मंतर, विद्वानों, साहित्यकारों व संगीतकारों के लिए बसाई ब्रह्मपुरी इसी क्षेत्र में रखे गये।
नगर का यह भाग नाहरगढ़ और जयगढ़ की पहाड़ियों के नीचे बसा है। इन्हीं पहाड़ियों ने जयपुर को हरियाली और प्राकृतिक सुन्दरता प्रदान की। यह क्षेत्र पूरी तरह सुनियोजित, कलापूर्ण और दर्शनीय रहा है, जहां विभिन्न जाति, धर्म, वर्ण, भाषा, रीति-रिवाज और रहन-सहन के लोग आते है। सवाई जयसिंह द्वारा आयोजित यज्ञ के लिए दक्षिण-पूर्वी भागों से यज्ञशाला में बड़े-बड़े विद्धान, तांत्रिक व पंडित आये। जो ब्रह्मपुरी के विशाल हरे भरे क्षेत्र में बसाये गये। इस क्षेत्र में ही पर्व त्यौहारों पर राजकीय आयोजन होते रहे। उत्तर में आमेर में शिला देवी का दर्शनीय स्थल, गैटोर की छतरियां, आयुर्वेद महाविद्यालय, पौण्डरिक उद्यान है।
जयपुर शहर स्थापना से 2 शताब्दियों तक चारदीवारी के भीतर ही रहा। चारदीवारी की सड़को पर स्थित हवेलियों व भवनों की वास्तुकला कायम रही, परन्तु गत वर्षो में जयपुर की ऐतिहासिकता, सभ्यता, संस्कृति, विरासत आदि से जुड़े लोगों का सत्ता में प्रभाव कम होता गया और अव्यवस्था बढ़ती गयी। आज ‘‘सरहद’’ के ऐतिहासिक क्षेत्र में अवैध निर्माण, अतिक्रमण, अनियोजित निर्माण से नगर नियोजन के सारे मापदण्ड खत्म हो गये। पुराने भवनों का स्वरूप बदलकर दुकानें बनाकर शटर लगा दिये गये। छोटी जमीनों पर बने मकानों में कई-कई मंजिलें बना दी गई। इस शहर के ऐतिहासिक हिस्से के हालात सोचनीय बना दिये गये।
जलेब चौक में जगह-जगह अतिक्रमण व छोटे-छोटे अवेध निर्माण, भिखारियों की शरणस्थली, क्षेत्र में कचरागाह बन गये। गोविन्द देव जी मन्दिर के चारों ओर अतिक्रमण, अवेध निर्माण, दुकानें आदि बन गई। अनियोजित व अवेध निर्माणों व अतिक्रमणों से रास्तें व गलियां सिकुड़ गई। जलेब चौक का स्वरूप बदल गया है। पानी के फव्वारें, पानी के कुंए, बाबड़ियों का स्वरूप बदल गया। अश्वमेघ यज्ञ का स्थान कारखानों ने ले लिया। परकोटा उजड़ गया। तालकटोरा में पानी की आवक खत्म हो गई, उसके चारों ओर अतिक्रमण हो गये। परशुरामद्वारा की शोभा खत्म हो गई। नाहरगढ़ क्षेत्र के जंगली जानवर नहीं रहे, उपर पहाड़ी तक अनाधिकृत अवैध निर्माण हो गये। ब्रह्मपुरी की हरियाली समाप्त हो गई। अधिकांश हवेलियों को तोड़कर अथवा फेरबदलकर नये परिसर बन गये व पुराने कंगूरे नदारद हो गये । गलियों व रास्तों की चौड़ाई सिकुड़ गई एवं पैदल चलने की भी जगह नहीं रही।
शहर में गंदगी के ढेर रहने से देशी-विदेशी पर्यटकों को असुविधा होने लगी है। वास्तविकता यह है कि विदेशों में इस शहर के नियोजन व वास्तुकला की छवि खराब हो रही है और विदेशी पर्यटकों की संख्या कम हो रही है। पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए यहां सबकुछ है, परन्तु हम धरोहर का उचित रख-रखाव व सार-संभाल नहीं कर पा रहे हैं। जयपुर आने वाला प्रत्येक पर्यटक इस चौकडी सरहद में स्थित ऐतिहासिक स्थलों के अवलोकन को अवश्यमेव जाता है।
अतः सरकार व नगर निगम को इस क्षेत्र में स्थित विरासत को बनाये रखने के लिए (सरहद चौकड़ी के हित में) संसाधनों से युक्त सर्वाधिकार प्राप्त कमेटी का गठन किया जाय, पृथक प्रावधान किये जाने चाहिए जिससे चौकड़ी सरहद स्थित ऐतिहासिक स्थलों का रख-रखाव किया जा सके और उनका हैरीटेज स्वरूप पुनः कायम किया जा सके। क्षेत्र का सौन्दर्यीकरण हो, सुधार हो एवं आवश्यक जनसुविधाएं उपलब्ध हो, यातायात को सुधारा जा सकें, पृथक पार्किंग हो, अवेध व अतिक्रमण को हटाया जा सके एवं सफाई व्यवस्था कायम की जा सकें।
-डॉ. सत्यनारायण सिंह