विद्वानों ने कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर कुशा ग्रहण की
सुमेरपुर। गुरुवार को कुशा ग्रहणी अमावस्या पर भगवान परशुराम राष्ट्रीय पंडित परिषद ट्रस्ट के स्थानीय विद्वानों ने समीप के कोलीवाड़ा ग्राम के खेतों व जवाई नदी किनारे जाकर विधि विधान से कुशा उखाड़कर वर्ष भर के धार्मिक कार्यों के लिए संग्रह की।इस अवसर पर भगवान परशुराम राष्ट्रीय पंडित परिषद ट्रस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष पंडित सुरेश गौड़ ने बताया कि भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को कुशाग्रहणी अमावस्या या कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहते है।पंडित गौड़ ने बताया कि कुश में त्रि देवों का वास होता है।कुश के मूल में ब्रह्मा,मध्य में विष्णु, अग्र भाग में शंकर का वास होने से इसे पवित्र माना है।आज के दिन उखाड़ा गया कुश एक वर्ष पर्यन्त कार्यों में लिया जा सकता है। हमारे सनातन धर्म में कुशा को अत्यन्त पवित्र माना गया है। वैदिक परम्परा के प्रत्येक कार्य संध्या उपासना- पूजा-यज्ञ - जप- श्राद्ध- ग्रहणादि कार्यों में अत्यंत उपयोगी होता हैं।इसके आसान पर बैठकर जप - तप करने से सिद्धि प्राप्त होती है।इसके बिना कोई वैदिक कार्य नहीं किए जा सकते, पवित्री में भी कुशा का उपयोग होता है, प्रतिदिन ग्रहण की गई कुशा उसी दिन काम में ली जाती है,प्रत्येक मास की अमावस्या को लिया गया कुश एक मास तक कार्यों में ले सकते हैं, किन्तु भाद्रपद मास की कुशोत्पाटिनी अमावस्या को उखाड़ा गया कुश एक वर्ष तक शुद्ध व उपयोगी रहता है, यह वर्ष पर्यन्त निर्माल्य नही होता है।कुशा निकालते वक्त उक्त मंत्र से प्रार्थना करें। फिर कुशा ग्रहण करनी चाहिए *विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठि निसर्गज:।* *नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्ति करो भव।* इस मंत्र से कुश उखाड़े *हुं फट् स्वः* इस मौके पंडित दीपक मिश्रा,पंडित हरिशंकर तिवाड़ी,पंडित अशोक मिश्रा , सहित कई विद्वान मौजूद रहे