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 शिव-शक्ति की भक्ति और संकल्पों की सिद्धि का माह श्रावण 

 शिव-शक्ति की भक्ति और संकल्पों की सिद्धि का माह श्रावण 

'श्रावण' शब्द का श्रवण ही अपने आप में ऊर्जा, ताजगी और नयेपन का पर्याय है। श्रावण माह जहां एक ओर प्रकृति के कृतित्व के असीम सौंदर्य और हरीतिमा का दिग्दर्शन करवाता है, वहीं दूसरी ओर कंकर-कंकर में शंकर की शुभता व आध्यात्मिक औदार्य की अनुभूति भी करवाता है। श्रावण का सोमवार ही नहीं पूरा माह ही हमारी धार्मिक मान्यताओं के अंतर्गत भगवान शिव और उनकी शक्ति को समर्पित है। हम पढ़ते-सुनते आये हैं कि उत्तर भारत में आस्था और धार्मिक पूजा पंथ पद्धति में सामान्य रूप से वैष्णववाद का बोलबाला है तथा इसके इतर दक्षिण भारत में शैववाद का प्रभुत्व है। आस्था के इस तथाकथित वर्गीकरण और असमता को श्रावण माह पूर्ण रूप से तब झुठलाता हुआ प्रतीत होता है, जब हम घर-घर हर-हर (महादेव) के प्रति आस्था से नत नर-नारी को देखते हैं। बद्रीनाथ और केदारनाथ से लेकर जम्मू कश्मीर में प्रतिवर्ष होने वाली अमरनाथ यात्रा भी देश-प्रदेश विशेषतः उत्तर भारत के लोगों की भी शिव के प्रति अटूट आस्था से परिचित करवाती है। क्षेत्रों की परिधि से परे पूरे सनातन जगत हेतु श्रावण के केंद्र में शिव व शिवत्व ही सुशोभित है, श्रावण माह में ही धार्मिक-चर्या के लिए आधारभूत संन्यासिक परम्परा ''चौमासे'' की शुरुआत होती है। श्रावण का प्रत्येक सोमवार ही नहीं वरन हर दिन ही शिवालयों की शोभा और स्तुति में स्वयं को अभिव्यक्त करता है। कावर, जिसे आजकल अपभ्रंश रूप से कावड़ कहा जाने लगा है, यात्रा भी शिव भक्तों की अदम्य भक्ति पर केंद्रित है, जहाँ धार्मिक व आस्थावान शिव भक्तों द्वारा दूर-दूर से पद यात्रा करते हुए लकड़ी से बनी कावर में गंगा का पवित्र जल लेकर काशी में शिव का पावन जलाभिषेक किया जाता है। श्रावण में बरसती बूंदे भी ऐसी ही प्रतीति करवाती है कि मानो सृष्टि के सारे कंकरों को शिव स्वरूप मानकर प्रकृति स्वयं उनका जलाभिषेक कर अपने पूजा प्रकल्प को सिद्ध कर रही हो । साल भर में आने वाली दो महाशिवरात्रियों में से एक महाशिवरात्रि भी श्रावण माह में ही आती है। शिव पर केंद्रित श्रावण माह मनुष्य-मन की उज्ज्वलता का भान कराता है। यह श्रावण ही है, जो कर्म की कावर द्वारा अभिसिक्त मन को इच्छित फलादेश से परिचित करवाते हुए पुनीत प्रेरणा देता है कि हम भी शिव की भांति वैमनस्य के विष का कड़वा घूंट पीकर समतावाद और सामाजिक सद्भाव जैसे सरोकारों द्वारा आत्मिक और आध्यात्मिक उन्नयन करें। बाहरी पूजा-अर्चना के साथ ही शिवत्व को भीतर उतारना ही श्रावण की सार्थकता है, तो आइये संकल्पों की सिद्धि के माह श्रावण में संकल्प करें कि इस बार शिवत्व को अन्तस् में उतारे ताकि हमारी संवेदनहीनता से उपजी निष्प्राणता में चिंतन की चेतना जाग्रत की जा सके। इस बार श्रावण का अधिकमास के रूप में आना अपने पुण्यार्जन को द्विगुणित करने का सुवसर है। यह हमारी भारतीय सनातन संस्कृति की अद्वितीय काल-गणना में ही सम्भव है, जहां तिथियों और यहां तक कि महीनों के घटाव/बढ़ाव के बावजूद सटीक समय-गणना सम्भव है। यह हमें प्रतिकूल और अनुकूल किसी भी दशा में समभाव और संतुलन की अभिप्रेरणा देता है। श्रावण मास से पूर्व आगत देवशयनी एकादशी जिसमें यह माना जाता है कि देवता आगे के चार महीनों तक सो जाते हैं, वहीं शिव को समर्पित श्रावण शिव की अपने भक्तों के प्रति वात्सल्य और कृपा भाव को प्रकट करता है। शिव भोले है किन्तु अपने भक्तों को कदापि नहीं भूले है। अपने निद्रा सुख का भी शिव अपने भक्तों के लिए सहज त्याग करने वाले भगवत-वत्सल और दयालु देव है। भगवान शिव का अपने भक्तों के प्रति यह भाव ही इन्हें महादेव के रूप में प्रतिष्ठापित करता है। कहने का अभिप्राय यही है कि इस वर्ष श्रावण के इस अधिकमास में शिवत्व का श्रवण, मनन पूर्ण मनोयोग से करे ताकि इस पुण्य और पवित्र माह में सती-पति की पूजा कर प्रकृति - पुरुष की अवधारणा से बद्ध समाज में नारी सम्मान की महत्ता और मूल्यों को साहसिक, सामूहिक और समवेत स्वीकार्यता प्रदान की जा सके। बिना शिव, शक्ति और शिवत्व के श्रावण और सृष्टि की उपादेयता सम्भव नहीं है। अतः श्रावण में शिव का ऋतुपुष्पों और बिल्व पत्रों से शृंगार हमें परम्परागत मान्यताओं से विलग यह अंगीकार करने को विवश करता है कि आशुतोष शिव 'संहार' के ही नहीं 'सृजन' के प्रकल्प में रूप में जन-जन के आराध्य देव है। 

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