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बाड़मेर में प्रशासन के दो चेहरे : दिखावे की राजनीति बनाम धरातल पर काम

बाड़मेर में प्रशासन के दो चेहरे : दिखावे की राजनीति बनाम धरातल पर काम

बाड़मेर : बाड़मेर जिले ने पिछले कुछ वर्षों में प्रशासन के दो बिल्कुल अलग चेहरे देखे हैं। एक ओर वह दौर था जब सोशल मीडिया की चमक, रील्स, कैमरों के सामने फोटोशूट और कागज़ी आंकड़ों के सहारे विकास की तस्वीर पेश की जाती रही, वहीं दूसरी ओर वर्तमान जिला कलक्टर चिन्मयी गोपाल का कार्यकाल है, जहाँ बिना शोर-शराबे के धरातल पर काम कर आमजन का विश्वास जीतने की कोशिश दिखाई दे रही है।

तत्कालीन जिला कलक्टर टीना डाबी के कार्यकाल में जल संरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए। JSJB योजना के अंतर्गत बाड़मेर जिले में 91 हजार से अधिक जल संरक्षण कार्य करवाने का दावा किया गया, लेकिन बाद में हुए भौतिक सत्यापन में बड़ी संख्या में कार्य धरातल पर दिखाई ही नहीं दिए। आरोप लगे कि कागज़ों में विकास के आंकड़े बढ़ाकर जिले की वास्तविक स्थिति को छिपाया गया। रेगिस्तान में पानी पहुंचाने के दावे किए गए, लेकिन गांवों में आमजन पानी की बूंद-बूंद के लिए परेशान रहे।

इसी दौरान प्रशासन पर फर्जी आंकड़ों के आधार पर पुरस्कार प्राप्त करने के आरोप भी लगे। आलोचकों का कहना है कि जिस सम्मान का श्रेय जिले की जनता और वास्तविक मेहनत को मिलना चाहिए था, वह कागज़ी उपलब्धियों के नाम कर दिया गया। उस समय प्रशासनिक कार्यशैली पर यह आरोप भी लगते रहे कि जमीनी समस्याओं की बजाय सोशल मीडिया प्रबंधन और व्यक्तिगत छवि निर्माण पर अधिक ध्यान दिया गया।

जल संकट, चिकित्सा सुविधाओं की कमी और प्रशासनिक उदासीनता को लेकर भी जनता में असंतोष देखने को मिला। राजकीय चिकित्सालय बाड़मेर में लंबे समय तक सोनोग्राफी मशीन बंद रहने से मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। वहीं जलदाय विभाग और अन्य प्रशासनिक व्यवस्थाओं को लेकर भी आमजन लगातार शिकायतें करते रहे।

अब वर्तमान जिला कलक्टर चिन्मयी गोपाल के कार्यकाल में प्रशासनिक कार्यशैली में बदलाव महसूस किया जा रहा है। कम समय में ही उन्होंने जल संकट को लेकर सक्रियता दिखाई और गांव-गांव पानी के टैंकरों की व्यवस्था सुनिश्चित करवाई। आमजन की शिकायतों को प्राथमिकता देने और विभागीय जवाबदेही तय करने की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं।

राजकीय चिकित्सालय में लंबे समय से बंद पड़ी सोनोग्राफी मशीन को दोबारा शुरू करवाना भी प्रशासन की सक्रियता का उदाहरण माना जा रहा है। लोगों का कहना है कि प्रशासन का असली उद्देश्य जनता को राहत देना होना चाहिए, न कि केवल प्रचार और दिखावा।

बाड़मेर की जनता अब दोनों कार्यशैलियों के बीच फर्क महसूस कर रही है। एक तरफ वह दौर रहा जिस पर विभिन्न योजनाओं, जमीन आवंटन, CSR फंड और अन्य मामलों को लेकर विवाद एवं आरोप लगे, वहीं दूसरी ओर वर्तमान प्रशासन कम बोलकर ज्यादा काम करने की नीति पर चलता दिखाई दे रहा है।

जनता का मानना है कि सोशल मीडिया और कागज़ी आंकड़ों की चमक कुछ समय के लिए प्रभाव डाल सकती है, लेकिन लंबे समय तक वही प्रशासन याद रखा जाता है जो धरातल पर लोगों की समस्याओं का समाधान करता है।

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