तीसरे मोर्चे के लिए उपजाऊ नहीं है मरुभूमि
राजस्थान में दिसम्बर में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा में सीधा
मुकाबला है। कुछ स्थानों पर छोटे दल भी कमर कसे हुए है मगर उनका कोई प्रदेशव्यापी प्रभाव
दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। तीसरा मोर्चा इस प्रदेश में कोई आकार नहीं ले पाया है। सांसद
हनुमान बेनीवाल तीसरे मोर्चे का झंडा जरूर उठाये हुए हुए है । उनकी पार्टी रालोपा के प्रदेश में
कुल जमा तीन विधायक है। बेनीवाल जुझारू नेता है इसमें कोई दो राय नहीं है। मगर अकेला
चना भाड़ नहीं फोड़ सकता की कहावत उन पर सटीक बैठती है। वे इस समय न एनडीए में है
और न ही इंडिया गठबंधन में है। यही हालत प्रदेश में वामपंथी संगठनों की है। वे कहने को
इंडिया गठबंधन में है। यह देखने वाली बात है कांग्रेस उनके लिए कुछ सीटें छोड़ती है या नहीं।
बसपा का कोई ज्यादा आधार नहीं है। पिछले विधानसभा चुनाव में इस पार्टी के छह विधायक
जीते थे जो सदा की तरह सत्ता की लालच में कांग्रेस में शामिल हो गए। दो विधायन ट्राइबल
पार्टी के जीते थे। बड़ी संख्या में निर्दलीय भी जीते जो कांग्रेस के साथ हो गए। इस भांति देखे
तो प्रदेश में किसी तीसरे मोर्चे की सम्भावना न के बराबर है।
राजस्थान में चौधरी कुम्भाराम आर्य से लेकर हनुमान बेनीवाल तक तीसरे मोर्चे के अनेक
झंडाबरदार हुए है। इनमें आर्य सहित नाथूराम मिर्धा, दौलत राम सारण, दिग्विजय सिंह, देवी
सिंह भाटी, लोकेन्द्र सिंह कालवी, किरोड़ी लाल मीणा, घनश्याम तिवाड़ी और हनुमान बेनीवाल
के नाम मुख्य रूप से लिए जा सकते है। इन लोगों ने भारी शोर शराबे और धूम धड़ाके से
तीसरे मोर्चे की हुंकार भरी थी मगर प्रदेश की मरुभूमि में ये मोर्चा सरसब्ज नहीं हुआ। अनेक
की भ्रूण हत्या भी हो गई। वर्तमान में तीसरे मोर्चे की कमान नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल
संभाले हुए है। इनकी पार्टी रालोपा के वर्तमान में राज्य विधानसभा में तीन विधायक है। पिछले
सालों में हुए विधानसभा उप चुनावों में बेनीवाल की पार्टी ने अपना दमखम दिखाया था।
राजस्थान की मरुभूमि राजनीतिक रूप से बेहद सजग और सतर्क है। यहाँ के जागरूक मतदाता
केवल दो ही दलों को शासन चलाने का मौका देते है। तीसरे का भविष्य लगभग नगण्य है। यह
जरूर है, हर विधानसभा चुनाव से पहले राजस्थान में तीसरे मोर्चे की संभावनाएं तलाशी जाती है
मगर चुनावी परिणाम अनुकूल नहीं आने से यह गर्भ में ही समाप्त हो जाता है। ले देकर दो
चार दलों के चार - छह नेता ही विधानसभा में तीसरे मोर्चे के नाम से जीतकर आते है।
हालाँकि चुनाव की सुगबुगाहट प्रारम्भ होते ही कुछ नेताओं ने कथित रूप से तीसरे मोर्चे के घोड़े
कागजों में दौड़ने शुरू कर दिए है।
राजस्थान में चुनावी सरगर्मियां शुरू हो गयी है नेताओं ने चुनावी मैदान में एक दूसरे को देख
लेने की ताल ठोंक रखी है। यहाँ मुख्यत दो दलों में मुकाबला होता है जो पांच पांच साल के
लिए शासन करते है। अभी कांग्रेस राज्य में सत्तारूढ़ है और भाजपा अपनी बारी का इंतज़ार कर
रही है। तीसरा मोर्चा अभी आकार नहीं ले पाया है मगर कुछ नेता तीसरा मोर्चा बनाने की हुंकार
जरूर भर रहे है। राज्य में भाजपा और कांग्रेस के अलावा अन्य दलों में हनुमान बेनीवाल की
रालोपा , भारतीय ट्राइबल पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के मुठी भर विधायक है।
मायावती की बसपा ने पिछले दो चुनावों में हर बार छह छह सीटें जीती मगर दोनों बार ही
उनके जीते विधायक कांग्रेस में शामिल होते देर नहीं की। कांग्रेस और भाजपा से बगावत कर
निर्दलीय विधायक यहाँ काफी संख्या में चुनकर आते है। जो चुनाव के बाद सत्तारूढ़ दल की
शरण में चले जाते है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की आम आदमी पार्टी यहाँ अपना वजूद
तलाश रही है। केजरीवाल ने पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान के साथ हाल ही प्रदेश का डोरा
कर अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराई। यह पार्टी लोगों को मुफ्त की रेवड़िया बांटने का विश्वास
दिलाकर चुनावी हुंकार भरने के प्रयास में है।
पिछले विधानसभा चुनाव में हनुमान बेनीवाल ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी बनाकर 58 सीटों पर चुनाव लड़ा
था। मगर उन्हें तीन सीट व 2.4 प्रतिशत वोट मिले थे। इसी तरह भाजपा से बगावत कर घनश्याम तिवाड़ी
ने भी भारत वाहिनी पार्टी के नाम से राजस्थान में 63 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।
मगर तिवाड़ी सहित सभी की जमानत हो गई थी। इसी भांति आम आदमी पार्टी ने भी जोर-शोर से चुनाव
लड़ा था। मगर उसका कोई भी उम्मीदवार एक हज़ार वोटों की संख्या पार नहीं कर पाया। प्रदेश में आप को
136345 यानी मात्र 0.38 प्रतिशत वोट मिले थे। पिछले चुनाव में बसपा को 4.03 प्रतिशत मत मिले थे।
कुल मिलाकर इन दलों को तीसरा मोर्चा माने तो फिर यह कह देना काफी है की राजस्थान में तीसरे मोर्चे का
कोई भविष्य नहीं है।