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कायम है क्षेत्रीय पार्टियों का जलवा

कायम है क्षेत्रीय पार्टियों का जलवा

2019 के लोकसभा चुनाव में 150 सीटों पर कब्ज़ा करने वाली क्षेत्रीय पार्टियों का जलवा आज
भी कायम है। आगामी लोकसभा चुनावों में क्षेत्रीय पार्टियों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होने जा
रही है। जैसे जैसे लोकसभा चुनाव नज़दीक आते जा रहे है वैसे वैसे क्षेत्रीय दलों ने एनडीए
अथवा इंडिया गठबंधनों में अपनी भूमिका तलाशनी शुरू कर दी है। इनमें बहुत से क्षेत्रीय दल
गठबंधनों में शामिल हो गए है और अनेक अब तक निर्गुट या तटस्थ बने हुए है। कई ऐसे भी
है जो एक से दूसरे गठबंधन में जाने में परहेज नहीं कर रहे है। जयंत चौधरी के राष्ट्रीय
लोकदल ने सपा से अपना नाता तोड़कर एनडीए की शरण ले ली है। कुछ अभी भी अपनी बारी
का इंतज़ार कर रहे है। लगता है वे भी कोई न कोई छतरी तलाश ही लेंगे। वर्तमान में देश के
अनेक प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें है जो राष्ट्रीय फलक में अपना प्रभाव रखती है। इस
समय आंध्र, तमिलनाडु, झारखण्ड, उड़ीसा, प बंगाल, दिल्ली और पंजाब में क्षेत्रीय दलों की
सरकार है जहाँ लोकसभा की 200 से अधिक सीटें है। पिछली लोकसभा में लगभग सौ ऐसी
सीटें थी जहाँ भाजपा या कांग्रेस मुकाबले में नहीं थी। आंध्र जैसे प्रदेश में तो मुख्य मुकाबला ही
क्षेत्रीय दलों में था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक लगभग डेढ़ सौ सीटों पर 2019 के चुनाव में
क्षेत्रीय दलों ने कब्ज़ा कर लिया था।
भारत में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के साथ क्षेत्रीय दलों के निर्माण का अपना विशेष इतिहास है।
देश में आज़ादी के बाद से ही क्षेत्रीय दलों ने अपना वर्चस्व स्थापित करना शुरू कर दिया था।
जैसे जैसे राष्ट्रीय दल कमजोर हुए वैसे वैसे क्षेत्रीय दल बढ़ते गए। विशेषकर कांग्रेस और जनता
पार्टी से निकल कर अनेक नेताओं ने अपने क्षेत्रीय दल बना लिये। आज अनेक राज्यों में इन
क्षेत्रीय दलों की अपनी सरकारें है। जो मज़बूती से कार्य कर रही है। एक बार देवेगौड़ा के नेतृत्व
में क्षेत्रीय दलों के गठजोड़ की केंद्र में सरकार बन चुकी है। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में
क्षेत्रीय दलों की सरकार में प्रमुख भूमिका रही है।
पंजाब में अकाली दल, जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस, केरल में मुश्लिम लीग और
तमिलनाडु में द्रविड़ दल इनमें सबसे पुराने है। देश के अधिकांश प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों ने अपना
प्रभुत्व जमा लिया है। इनमें शिरोमणि अकाली दल, नेशनल कांफ्रेंस, डी एम.के, अन्ना
डी.ऐम.के, तेलुगू देशम, असम गण परिषद, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आरजेडी, जनता यूनाइटेड,

तृणमूल कांग्रेस, लोक दल,जेडी एस, समाजवादी पार्टी, बसपा, शिव सेना, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी,
मिजोरम नेशनल फ्रंट, नागा नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी, मणिपुर पीपुल्स पार्टी, महाराष्ट्र गोमातक
पार्टी, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, सिक्किम संग्राम परिषद, बीजू जनता दल, वाई एस आर
कांग्रेस, भारत राष्ट्र समिति, केरला कांग्रेस जननायक जनता पार्टी आदि। आम आदमी पार्टी ने
क्षेत्रीय दल से राष्ट्रीय दल का दर्ज़ा हासिल कर लिया है। इस समय दिल्ली और पंजाब में आप
की सरकारें है। आज अनेक राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें सफलतापूर्वक कार्य कर रही है। 1967 में 8
राज्यों में क्षेत्रीय दलों की सरकारें थीं। वर्तमान में प.बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, बिहार में क्षेत्रीय
दलों की सरकार स्थापित है। क्षेत्रीय दलों की यह खासियत है की इसके प्रमुख नेता ही पार्टी के कर्णधार होते
है। पार्टी के हाई कमान भी स्वयं होते है। बंगाल में ममता, उड़ीसा में नवीन पटनायक, , आंध्र में जगन
मोहन रेड्डी, तमिलनाडु में स्टालिन अपनी पार्टी के प्रमुख होने के साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री भी है। इसके
अलावा जो क्षेत्रीय दल इस समय सत्ता में नहीं है उनके सुप्रीमों भी एक ही व्यक्ति है और उनके दल में उनकी
तूती बोलती है। यूपी में समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव, तेलंगाना में केसीआर, महाराष्ट्र में
एनसीपी प्रमुख शरद पवार, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, जम्मू कश्मीर में फारुख अब्दुला, पंजाब में
अकाली दल प्रमुख बादल, कर्णाटक में जेडी एस के देवेगौड़ा अपनी अपनी पार्टी के सर्वेसर्वा है। ज़्यादातर
क्षेत्रीय पार्टियां व्यक्ति आधारित हैं और एक व्यक्ति या उसके परिवार से संचालित हो रही हैं। यह स्थिति
लोकतंत्र के लिए दुखदायी कही जा सकती है।
देश के प्रमुख राजनीतिक दलों और बुद्धिजीवियों का मानना है कि लोकसभा चुनाव के बाद
सरकार के गठन में क्षेत्रीय दलों की भूमिका महत्वपूर्ण बने रहने की संभावना है। देश में
फिलहाल छोटी पार्टियों का दौर समाप्त होने की कम ही उम्मीद है। 

 - बाल मुकुन्द ओझा 

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