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प्रतियोगिता के प्रेशर से असमय बुझते चिराग

प्रतियोगिता के प्रेशर से असमय बुझते चिराग



देश में कोचिंग हब के रूप में प्रसिद्ध राजस्थान के कोटा में छात्रों की आत्महत्या के मामले रुक नहीं रहे हैं। बीते सोमवार को एक और छात्रा ने आत्महत्या कर ली है। साल के शुरुआती जनवरी महीने में ही स्टूडेंट की आत्महत्या का दूसरा मामला सामने आया है। कोटा के बोरखेड़ा क्षेत्र में रहने वाली छात्रा निहारिका सिंह ने घर पर ही फांसी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। आत्महत्या करने से पहले लिखे पत्र में उसने लिखा- ‘मम्मी-पापा, मैं जेईई नहीं कर सकती, इसलिए सुसाइड कर रही हूं। आई एम लूजर, यही लास्ट ऑप्शन है।’ जाहिर है बच्ची इतनी भयाक्रांत थी कि परीक्षा से पहले ही आत्महत्या करने का फैसला कर लिया। जाहिर है इस फैसले में परिवार की उम्मीदों का बोझ ही शामिल होगा, जिसके चलते परीक्षा की विफलता को उसने जीवन का अंत मान लिया।

एजुकेशन सिटी कोटा में हर साल देशभर से 1 से 2 लाख बच्चे अपने और माता पिता के सपने पूरा करने पहुंचते हैं। कोटा में इंजीनियरिंग और मेडिकल की कोचिंग करने आये सभी स्टूडेंट्स सफल नहीं हो पाते कुछ ऐसे स्टूडेंट होते हैं जिन्हें असफलता हाथ लगती है। कई ऐसे स्टूडेंट भी होते हैं जो पढ़ाई का प्रेशर और माता-पिता की उम्मीद को पूरा नहीं कर पाते, तो सुसाइड जैसे कदम उठा लेते हैं। कोटा में बढ़ते हुए सुसाइड के मामलों को लेकर कोचिंग प्रशासन, जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन अपने-अपने स्तर पर कई प्रयास कर चुका है, लेकिन कोटा में कोचिंग स्टूडेंट के सुसाइड रुकने का नाम ही नहीं ले रहे।

कोचिंग सिटी की शुरुआत 1991 में हुई थी तब से लेकर अब तक लगभग 35 से 40 लाख स्टूडेंट कोटा से आईआईटी और मेडिकल की कोचिंग कर चुके हैं। लेकिन यहां सुसाइड के मामले लगातार बढ़ रहे है। यूपी और बिहार के लाखों स्टूडेंट आईआईटी और मेडिकल की कोचिंग करने यहां आते हैं ऐसे में अब तक के हुए सुसाइड मामलों में जो मामले निकल कर आए है मूलतः वह है माता-पिता और पढ़ाई का प्रेशर, टीनएज में लव अफेयर, ब्रेकअप।

एक आंकड़े के मुताबिक कोटा में ज़्यादातर छात्रों की उम्र 15 और 17 के बीच में है। उनके लिए शहर में अकेले रहना, परिवारों की उम्मीदें, हर दिन 13-14 घंटों की पढ़ाई, टॉपर्स के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा के दबाव के साथ रहना आसान नहीं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, भारत में साल 2021 में लगभग 13 हज़ार छात्रों ने आत्महत्या की थी। ये आंकड़े साल 2020 के आंकड़े से 4.5 प्रतिशत ज्यादा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक़, हर साल करीब सात लाख लोग आत्महत्या करते हैं और 15-29 साल के उम्र में आत्महत्या मौत का चौथा सबसे बड़ा कारण है।
ऐसे में अहम प्रष्न यह है कि आखिर क्यों मां-बाप बच्चों के साथ ऐसा सहज संवाद नहीं बना पाते कि इस आत्मघाती फैसले से पहले वह किसी तरह का विमर्श उनके साथ कर सके? क्यों हम बच्चों के सामने ऐसे हालात पैदा कर देते हैं कि उन्हें लगता है कि परीक्षा में उत्तीर्ण न हुए तो जीवन ही खत्म हो जाएगा? प्रश्न यह भी है कि उम्मीदों का कब्रगाह बनते कोटा भेजने से पहले क्या अभिभावकों ने सोचा है कि क्या जेईई में निकलना निहारिका का पैशन भी है?

पिछले दिनों जब ‘परीक्षा पर चर्चा’ कार्यक्रम में देश के करोड़ों छात्र-छात्राओं, शिक्षकों व अभिभावकों से दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम व वर्चुअल संवाद के जरिये प्रधानमंत्री परीक्षा भय से मुक्त होने की बात कर रहे थे, देश के कई भागों से छात्रों के आत्महत्या करने की खबरें आ रही थीं। जाहिर है अभिभावक व शिक्षक इन बच्चों के मानसिक द्वंद्व व वास्तविक दिक्कतों को नहीं समझ पा रहे हैं, जिसके चलते इन बच्चों को मौत को गले लगाना अंतिम विकल्प नजर आ रहा है।

निश्चित रूप से परीक्षा का भय इस कदर बच्चों पर हावी है कि उन्हें लगने लगता है कि परीक्षा में असफलता के बाद जीवन में कुछ शेष नहीं रहेगा। प्रधानमंत्री ने इस संबोधन में इन तमाम चुनौतियों को संबोधित किया। उन्होंने गहरी बात कही कि ‘बच्चों के रिपोर्ट कार्ड को अपना विजिटिंग कार्ड न बनाएं।’ यह एक हकीकत है कि अपने जीवन में शैक्षिक व रोजगारपरक लक्ष्यों को हासिल न कर पाने वाले अभिभावक अपने बच्चों से आईएएस, डॉक्टर व इंजीनियर बनने की उम्मीद पाल बैठते हैं। जमीनी हकीकत को नजरअंदाज करते हुए यह नहीं सोचते कि बच्चे की क्षमताएं क्या हैं और हमारी उम्मीदों का बोझ वे किस सीमा तक बर्दाश्त कर पाएंगे।
 
बीते दिनों संगरूर में मेरिटोरियस स्कूल के हॉस्टल से एक छात्र के पिता को फोन जाता है कि तुम्हारे बच्चे के नंबर कम आए हैं। उसे हॉस्टल से निकाल दिया जाएगा। इसके तीन घंटे बाद खबर आई कि छात्र ने हॉस्टल के कमरे में फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। यहां इस फोन करने वाले शिक्षक की जवाबदेही तय की जानी चाहिए कि उसने ऐसा संवेदनहीन व्यवहार क्यों किया। क्या नंबर कम आने के लिये छात्र को हॉस्टल से निकाल देना समस्या का समाधान है? यह दबाव अभिभावकों पर बना तो छात्र तनाव में आ गया। क्या उन कारणों की पड़ताल नहीं की जानी चाहिए थी जिसकी वजह से छात्र के नंबर कम आए? नये दौर में संक्रमण काल से गुजर रहे छात्रों को समझने में क्या शिक्षक जिम्मेदार भूमिका निभा रहे हैं?

मनोचिकित्सकों के अनुसार स्टूडेंट इंजीनियर और डॉक्टर की कोचिंग करने आते हैं। वह जब यह देखते हैं कि एक से बढ़कर एक होनहार छात्र-छात्राएं हैं और पेपर में अपने कम नंबर देखते हैं, तो इतने बड़े कदम उठा लेते है। कारण यही है कि मां-बाप की उम्मीद को पूरा नहीं कर पाते। इसलिए बिल्डिंग से कूदकर या फिर पंखे से लटककर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं। वहीं विशेषज्ञ यह सलाह भी देते हैं कि कोचिंग प्रशासन को इन बच्चों का पहले ही टेस्ट ले लेना चाहिए, ताकि उसे पता लग सके कि बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बनने के लायक भी है या नहीं। दूसरी बात हर मां-बाप को नहीं सोचना चाहिए कि हमारा बच्चा जीवन में डॉक्टर या इंजीनियर ही बने और भी कई रास्ते हैं जिससे सफलता हासिल की जा सकती है। हर पेरेंट्स को ऐसे नहीं सोचना चाहिए कि बच्चों को कोटा भेज दो तो इंजीनियर या डॉक्टर में सिलेक्शन हो जाएगा हां लेकिन बच्चे को अपना हंड्रेड परसेंट परफॉर्मेंस देना चाहिए। कई पेरेंट्स ऐसे हैं जो बच्चों पर पढ़ाई को लेकर दबाव बनाते हैं।

हर बच्चा अपने आप में विशिष्ट होता है। ईश्वर उसे किसी निश्चित लक्ष्य के लिये रचता है। दुर्भाग्य से मां-बाप उसकी रुचि व रुझान को नहीं समझ पाते। अपनी इच्छाएं थोपकर उसे कैरियर की दिशा निर्धारित करने के लिए कह देते हैं। यहीं से उसके जीवन में द्वंद्व शुरू होते हैं। जो पाठ्यक्रम छात्र-छात्राओं के मन का होता है उसमें वे जीवन में आशातीत सफलता प्राप्त करते हैं, विशिष्टता हासिल करते हैं। राज्य सरकार ने कोचिंग संस्थानों को कहा है कि 9वीं क्लास के पहले एडमिशन न लें। छात्रों की रुचि के हिसाब से एडमिशन करें। एडमिशन से पहले छात्र का टेस्ट लें और काउंसलिंग करवाएं। छात्र की क्षमता के हिसाब से ही एडमिशन लें। समय-समय पर पेरेंट्स को बच्चे की प्रोग्रेस के बारे बताएं। अगर छात्र बीच में छोड़ कर जाना चाहे, तो बची हुई फीस वापस करें। सरकार की ओर से कोचिंग संस्थानों को कई और दिशा-निर्देश भी दिए गए। दुर्भाग्य से हम 21वीं सदी के बच्चों को 19वीं सदी के हंटर से हांक रहे हैं। उनके अहसासों व उम्मीदों का खात्मा कर रहे हैं। अपनी उम्मीदों की भारी गठरी बच्चों के नाजुक कंधों पर रखने से पहले माता पिता और अभिभावकों को भी थोड़ा विचार करना चाहिए।

 -   रोहित माहेश्वरी

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