आवारा पशुओं की समस्या : देखन में छोटी लगे घाव करे गंभीर
बाल मुकुन्द ओझा
राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले के लालगढ़ जाटान में ट्यूशन से लौट रही 5 वर्षीय बेटी पर एक आवारा गाय ने हमला कर दिया। चीख सुनते ही मां मंजीत कौर गाय से भिड़ गईं और सींग पकड़कर बेटी की जान बचा ली। इस दौरान उनकी कई पसलियां टूट गईं। यह तो एक बानगी है। देखा गया है देशभर के छोटे नगरों से लेकर बड़े मैट्रो शहरों में आवारा पशुओं के कातिलाना कहर की खबरें अकसर मीडिया में सुर्खियां बनती रहती हैं फिर भी उन पर लगाम नहीं कसी जा रही। सही तो यह है आवारा पशुओं का यह मुद्दा हमें देखने में छोटा लगता है लेकिन है बड़ा गंभीर। आवारा कुत्ते भी लोगों की नाक में कम दम नहीं करते। बच्चे तो उन के डर से घर से बाहर तक नहीं निकल पाते। अब तो शहरों में गाय भैंस या सांड़ ही क्यों, बंदरों का खौफ भी देखा जा रहा है। अस्पतालों में कुत्तों के अलावा बंदरों के काटने के बहुत से मामले सामने आने लगे हैं। आवारा पशुओं की समस्या पूरे देश में विकराल रूप ले रही है। आए दिन आवारा पशुओं की धमाचौकड़ी की चपेट में आकर निर्दोष लोग अपने हाथ-पैर तुड़वाने को मजबूर है तो वाहनों को भी नुकसान पहुंच रहा है। शहरी इलाकों में कुत्तों के साथ गायों के झुंड विचरण करते मिल ही जाएंगे। इस कारण न केवल लोगों को आने-जाने में दिक्कत होती है बल्कि सड़कों पर गंदगी फैलती है। इन पशुओं से एक्सीडेंट की भी समस्या बढ़ रही है। रात में मोहल्ले में गायों की लाइन लग जाती है और सुबह रोज गंदगी फैली रहती है जिसको साफ करने में घंटों समय लगता है। गायों तथा सांडों के बड़े झुंड, बाजारों, गलियों, मुख्य सड़कों तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर सरेआम टहलते हुए राहगीरों के लिए खतरा बने हुए हैं। आवारा पशुओं की भरमार एवं उनके आतंक के कारण रहवासियों को तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। आए दिन बाजार क्षेत्र में दुकानदारों को आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है। बाजार क्षेत्र सहित सकरी गलियों में कुत्तों, साँडों व आवारा पशुओं का निरंकुश होकर घूमना लोगों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। इनके आपस में झगड़ने के कारण कई बुजुर्ग-महिलाएँ एवं बच्चे भी इनकी चपेट में आने के कारण चोटिल हो जाते हैं। कभी-कभार तो छोटे स्कूली बच्चे इन आवारा पशुओं के आपसी झगड़े को देख काफी भयभीत हो जाते हैं। अक्सर खाद्य व सब्जी आदि की दुकानों पर भी यह अपना मुँह मारते रहते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में समुचित सफाई नहीं होने और जगह-जगह कचरे के ढेर लग रहने से वहाँ आवारा मवेशियों का जमघट लगा रहता है। भयावह स्थिति तब बन जाती है, जब ये आवारा मवेशी मार्गों के किनारे लगे कचरे के ढेरों पर आपस में झगड़ते हैं। कई बार तो बाजार क्षेत्र में भी इनके आपस में झगड़ने से यातायात बाधित होता है। दिन हो या रात आवारा पशु सड़क पर झुंड बनाकर बैठ जाते हैं जिससे लोगों का निकलना मुश्किल हो जाता है। कई बार तो स्थिति ऐसी बन जाती है कि लोगों को वाहन रोककर इन्हें हटाना पड़ता है तब आगे का रास्ता खुलता है। आवारा पशुओं ने लोगों को परेशान कर दिया है। शहरी क्षेत्रों के मुख्य बाजार और कॉलोनियां के मार्गों पर जाकर अठखेलियां करने लगते हैं और दुर्घटना का कारण बनते हैं जिसके चलते प्रतिदिन कोई ना कोई दुर्घटना घटती रहती है। स्थिति रात के समय और भी घातक हो जाती है। इन आवारा पशुओं में से कुछ का रंग काला होने की वजह से किसी भी वाहन चालक के लिए दूर से इन्हे देख पाना बहुत मुश्किल होता है। कई वाहन चालक इनका शिकार बनकर मौत के मुंह में समा चुके हैं। सही बात तो यह है कि शहरी प्रशासन के पास इतने संसाधन नहीं होते है वे गली गली जाकर आवारा पशुओं को पकडे। आवारा पशुओं से शहरों को मुक्त करने के लिए प्रशासन के साथ साथ नागरिकों को भी आगे आना होगा। गौवंश की रक्षा का दावा करने वाले लोग हो हल्ला मचाते अवश्य नजर आएंगे मगर नासूर बनी आवारा पशुओं की समस्या से आम नागरिक और देशी विदेशी पर्यटक को मुक्ति दिलाने के कार्य में कहीं नजर नहीं आएंगे । सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद, अब देशभर में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या का स्थायी समाधान होना चाहिए। आम नागरिकों, बच्चों और बुज़ुर्गों की सुरक्षा सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। जानवरों के प्रति संवेदनशीलता ज़रूरी है, लेकिन इंसानी ज़िंदगी और सार्वजनिक सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।