लोकतंत्र के तीसमारखां
- बाल मुकुन्द ओझा
एक गरीब दर्जी था । गाँव की दूकान पर कपड़े सी - कर अपना और अपनी मां का गुजारा करता था। एक दिन जब वह आम के साथ रोटी खा रहा था, उस दौरान बहुत सारी मक्खियाँ आकर उसके खाने पर बैठने लगीं। दर्जी को आया बहुत जोर का गुस्सा और उसने भिनभिनाती मक्खियों पर पूरी ताकत से हाथ का पंखा दे मारा। जब उसने पंखा उठाया तो देखा कि ढेर सारी मक्खियाँ मर गयी थीं ! उसने गिना कि वे पूरी तीस थीं। दर्जी सोचने लगा जरूर मेरे अंदर कोई खास बात है तभी तो मैंने एक ही वार में तीस का काम तमाम कर दिया। इस कारनामे के बाद यह व्यक्ति अपने आप को बड़ा तीसमारखाँ समझने लगा। उसे यह घमंड हो गया कि पूरे देश में उससे अधिक बुद्धिमान और चतुर कोई नहीं है। ठीक यही स्थिति आज हमारे लोकतंत्र के रखवाले जननायकों की है। उन्हें भी यह भ्रम हो गया है कि हम जो कुछ भी करें वही ठीक है। जनता को हमारे कामों पर मुहर लगानी ही होंगी। यदि हम जनधन को लुटे तो कोई नहीं बोले। विरोध करने वाले को ठिकाने लगाना हमें बखूबी आता है। ये तीसमारखाँ जनतंत्र के ठेकेदार बनने के बाद न्याय और कानून को भी अपने ठेंगे पर रखते है।
इसके लिए किसी एक को दोषी ठहराना सही नहीं होगा। कांग्रेस को 50 साल तक भारत पर एकछत्र राज करने का मौका मिला। यह मौका जनता जनार्दन ने दिया। इसलिए कांग्रेस भी अपने को तीसमारखाँ समझने लगी। मारे उसको मारे और छोड़े उसको छोड़े। इसकी परिणीति हमें आपातकाल के रूप में देखने को मिली। लाखों लोगों को कांग्रेस रूपी तीसमारखाँ ने जेलों में ठूंस दिया।
1977 के जनता प्रयोग को जनता जनार्दन ने तीसमारखाँ में बदलने नहीं दिया। उस पीढ़ी के नेता संघषों की तपती आग से निकले थे और तीसमारखाँ बनने की उनमें चाहत भी नहीं थी। इस बीच सियासत तेजी से बदली। हमारा संघीय ढांचा कमजोर हुआ और तीसमारखाँ का नया क्लेवर भी सामने आया। देश में सुबाई राजनीति की पकड़ मजबूत होने के साथ सियासत पर सूबों के छत्रपों ने कब्जा कर लिया। यहीं से तीसमारखाँ का एक बार फिर प्रादुर्भाव हुआ। ये तीसमारखाँ जाति ,धर्म, संप्रदाय , धन और बाहुबल के नाम पर लोगों को बरगलाने में सफल हुए। कई तीसमारखाँ को जेल भी जाना पड़ा और कुछ अभी भी जेल में है। जनतंत्र में इन आधुनिक तीसमारखाओं का कम ही विश्वास है।
लेकिन तीसमारखाँ का खतरा अभी समाप्त नहीं हुआ है। अब तो तीसमारखाँ ही चहुंओर दिखाई दे रहे है। विभिन्न राजनीतिक दलों में अब तीसमारखाँ का राज ही चल रहा है। जो हिटलर की चाल चलेगा वो हिटलर की मौत मरेगा का नारा जोरशोर से लगाने वाले भी अब तीसमारखाँ बन बैठे है । अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के बाद ये तीसमारखाँ अब हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली को तहस नहस करने में जुटे है। जनतंत्र को बचाने के लिए जनता को सियासत के इन तीसमारखाओं को पहचान कर इनका लोकतंत्री होने का नकाब उतारना होगा। अन्यथा तो देश का फिर भगवान ही मालिक है।