अमेरिका-ईरान टकराव और विश्व शांति की नई चुनौती
-ः ललित गर्ग
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव के बाद बड़ी कठिनाई से बना संघर्ष विराम अपनी निर्धारित अवधि पूरी करने से पहले ही टूटने की कगार पर पहुंच गया है। ईरान द्वारा अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर किए गए ताजा हमलों और उसके जवाब में अमेरिका की भीषण बमबारी ने एक बार फिर पूरी दुनिया को युद्ध की आशंकाओं के बीच खड़ा कर दिया है। यह केवल दो देशों के बीच का सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि वैश्विक शांति, आर्थिक स्थिरता और मानवीय मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है। जिस समय विश्व को महामारी, आर्थिक मंदी, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट जैसी समस्याओं से मिलकर लड़ना चाहिए, उस समय महाशक्तियों का युद्धोन्माद पूरी मानवता को पीछे धकेलने का कार्य कर रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर उत्पन्न विवाद ने इस संघर्ष को और अधिक विस्फोटक बना दिया है। विश्व के लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति इसी समुद्री मार्ग से होती है। यदि यह मार्ग बाधित होता है तो केवल तेल की कीमतें ही नहीं बढ़ेंगी, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसका व्यापक दुष्प्रभाव पड़ेगा। महंगाई बढ़ेगी, उत्पादन लागत में वृद्धि होगी, आपूर्ति शृंखलाएं टूटेंगी और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था सबसे अधिक प्रभावित होगी। युद्ध की आग कभी सीमाओं में नहीं रहती, उसकी तपिश अंततः पूरी दुनिया को झुलसाती है।
इस संघर्ष का सबसे दुखद पक्ष यह है कि इसमें निर्दोष नागरिकों, नाविकों और आम जनजीवन को सबसे अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। हाल के घटनाक्रम में भारतीय नाविकों के प्रभावित होने और भारत के सहयोग से विकसित रणनीतिक महत्व वाले चाबहार बंदरगाह परियोजना को नुकसान पहुंचने से यह स्पष्ट हो गया है कि युद्ध किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक विश्वास-तीनों पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अमेरिका स्वयं को लोकतंत्र और विश्व व्यवस्था का संरक्षक बताता है, लेकिन उसकी विदेश नीति लंबे समय से प्रतिबंधों, सैन्य दबाव और शक्ति प्रदर्शन पर आधारित रही है। किसी भी राष्ट्र को झुकाने के लिए आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य हमले और राजनीतिक दबाव स्थायी समाधान नहीं हो सकते। महाशक्ति होने का अर्थ केवल सैन्य सामर्थ्य नहीं, बल्कि संयम, दूरदृष्टि और विश्व समुदाय के प्रति नैतिक उत्तरदायित्व भी है। यदि शक्ति विवेक से संचालित न हो तो वही शक्ति विनाश का कारण बन जाती है।
दूसरी ओर ईरान को भी यह समझना होगा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों को अपने रणनीतिक हितों के लिए बंधक बनाना न तो अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप है और न ही वैश्विक विश्वास के अनुकूल। किसी भी देश की सुरक्षा तब तक स्थायी नहीं हो सकती जब तक वह पड़ोसी देशों और विश्व समुदाय के साथ सहयोग, विश्वास और पारदर्शिता का वातावरण निर्मित न करे। भय और प्रतिशोध पर आधारित सुरक्षा व्यवस्था अंततः स्वयं को ही असुरक्षित बना देती है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कार्यशैली ने इस पूरे संकट को और अधिक अनिश्चित बनाया है। एक ओर वे कठोर सैन्य कार्रवाई करते हैं, दूसरी ओर वार्ता और समझौते की बातें करते हैं। इस प्रकार के विरोधाभासी संदेश न केवल कूटनीतिक विश्वास को कमजोर करते हैं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अस्थिरता पैदा करते हैं। महाशक्तियों के नेताओं के प्रत्येक वक्तव्य का प्रभाव केवल उनके देशों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विश्व की अर्थव्यवस्था, निवेश, ऊर्जा बाजार और करोड़ों लोगों के जीवन पर पड़ता है। इसलिए नेतृत्व में धैर्य, स्थिरता और विश्वसनीयता अत्यंत आवश्यक है।
इतिहास गवाह है कि युद्धों ने कभी स्थायी समाधान नहीं दिया। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया तक, हर युद्ध ने नई समस्याएं ही पैदा की हैं। लाखों लोगों की जान गई, करोड़ों लोग विस्थापित हुए, लेकिन अंततः समाधान फिर बातचीत की मेज पर ही खोजे गए। यदि अंत में संवाद ही करना है, तो शुरुआत भी संवाद से ही क्यों नहीं हो सकती? यही प्रश्न आज पूरी मानवता के सामने खड़ा है। भारत ने सदैव विश्व को शांति, सह-अस्तित्व और अहिंसा का मार्ग दिखाया है। गौतम बुद्ध, भगवान महावीर और महात्मा गांधी की भूमि ने यह सिखाया कि वास्तविक विजय शत्रु को पराजित करने में नहीं, बल्कि शत्रुता को समाप्त करने में है। भारत की विदेश नीति भी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘विश्वबंधुत्व’ के आदर्शों पर आधारित रही है। भारत ने हमेशा संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया है। यही कारण है कि भारत आज विश्वसनीय मध्यस्थ, संतुलित शक्ति और जिम्मेदार वैश्विक भागीदार के रूप में सम्मान प्राप्त कर रहा है।
वर्तमान संकट में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकती है। भारत के अमेरिका, ईरान और खाड़ी देशों के साथ संतुलित संबंध हैं। भारत यदि संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से सक्रिय शांति पहल करे, तो तनाव कम करने में उसकी भूमिका प्रभावी सिद्ध हो सकती है। साथ ही भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और विदेशों में कार्यरत भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए भी दूरदर्शी रणनीति अपनानी होगी। आज आवश्यकता किसी एक पक्ष की विजय की नहीं, बल्कि मानवता की विजय की है। हथियारों की होड़ से न तो समृद्धि आती है और न ही सम्मान। वास्तविक शक्ति मिसाइलों, बमों और युद्धपोतों में नहीं, बल्कि विश्वास, सहयोग और संवाद में निहित होती है। युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है, वह केवल नई समस्याओं को जन्म देता है। अहिंसा कायरता नहीं, बल्कि आत्मबल, धैर्य और दूरदर्शिता का सर्वोच्च स्वरूप है।
विश्व समुदाय को अब यह स्पष्ट संदेश देना होगा कि किसी भी देश की मनमानी, सामरिक अहंकार और युद्धोन्माद को स्वीकार नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र सहित वैश्विक संस्थाओं को अधिक प्रभावी, निष्पक्ष और सक्रिय भूमिका निभानी होगी। यदि आज भी दुनिया ने युद्ध की राजनीति पर अंकुश नहीं लगाया, तो भविष्य की पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी। आज पूरी दुनिया की प्रार्थना यही है कि अमेरिका को शक्ति के साथ सद्बुद्धि मिले, ईरान को संयम और विवेक का मार्ग मिले तथा दोनों राष्ट्र हथियारों की भाषा छोड़कर संवाद की संस्कृति अपनाएं। शांति ही विकास का आधार है, संवाद ही स्थायी समाधान का मार्ग है और अहिंसा ही मानव सभ्यता का सबसे बड़ा अस्त्र है। यही समय की पुकार है, यही मानवता की अपेक्षा है और यही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।