नशे में डूब रही देश की तरुणाई
दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश भारत है। आज हमारा युवा नशाखोरी के मकड़जाल
में फंसता जा रहा है। युवा किसी भी देश का भविष्य होता हैं, लेकिन हमारा यह भविष्य नशे के समंदर
में डूब रहा है। बड़ी संख्या में युवा नशे के दलदल में धंसते जा रहे हैं जहां बाहर निकल पाना लगभग
नामुमकिन है। युवा वर्ग नशे की चपेट में है। इनका असर बच्चों पर भी पड़ रहा है। इन पर नशा न सिर्फ
शारीरिक बल्कि मानसिक दुष्प्रभाव डाल रहा है। नशे की पूर्ति के लिए अपराध से भी वह हिचक नहीं रहे हैं।
थिंक चेंज नामक एक स्वतंत्र संस्था की एक हालिया रिपोर्ट में बताया गया है कोरोना के बाद देश में नशीले
पदार्थों की खपत तेजी से बढ़ी है। रिपोर्ट में कहा गया है नशे की यह प्रवृत्ति देश की तरुणाई तक पहुँच गई है
जिसके खतरनाक परिणामों से देश को जूझना पड़ेगा। नशे का कारोबार देश में 15 लाख करोड़ को पार कार
चुका है।
मिडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आये दिन न सिर्फ लोग गांजा-चरस-अफीम-सुलेशन-ड्रग्स, कोरेक्स और
नशीली इंजेक्शन के आदि हो रहे हैं बल्कि इनके सेवन से लोग मौत के शिकार भी हो रहे हैं। नशा करने से
लिवर, किडनी और फेफड़े खराब हो जाते हैं। डिप्रेशन, मानसिक अस्थिरता, फोकस और कंसन्ट्रेशन लॉस,
भ्रम की बीमारी, आत्यहत्या करने का खतरा और इन जैसी कई बीमारियों के होने का खतरा होता है। युवाओं
में नशे की प्रवृत्ति कुछ वर्षों से निरंतर बढ़ रही है। कुछ में तो नशे की जरूरत इस कदर हावी होने लग जाती है
कि वे कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। भारत में आधिकारिक तौर पर 10 से 17 वर्ष के बीच के 15.8
मिलियन बच्चे नशे के आदी हैं। विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है। भारत
में मादक द्रव्यों के सेवन की सीमा और पैटर्न के पहले व्यापक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में नैशनल ड्रग डिपैंडैंस
ट्रीटमैंट सैंटर ने मादक द्रव्यों के सेवन से प्रभावित और तत्काल मदद की आवश्यकता वाले युवाओं की एक
बड़ी आबादी पाई। शायद सबसे गंभीर चिंता 14-15 वर्ष की आयु के युवाओं की भागीदारी है। नशे के कारण
सबसे अधिक प्रभावित युवा वर्ग है। इससे उनका मानसिक संतुलन खराब हो रहा है। एक बार नशे की लत
में पड़ने के बाद इससे निकलना मुश्किल हो रहा है। युवा वर्ग इस दवाइयों की लत में इस कदर डूबा रहता है
कि इसके दुष्परिणाम के बारे में नहीं सोचता। इसमें छोटे-छोटे बच्चे शामिल हैं। देश के अनेक राज्यों में सूखे
नशे का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। सूखे नशे ने लोगों का सुख चैन तो छीन ही लिया है। शराब के बाद सूखा
नशा युवाओं की नसों में इस कदर दौड़ने लगा है कि परिवार के परिवार बर्बादी के कगार पर पहुंच गए हैं।
चिट्टा, गांजा, चरस, हेरोइन और स्मैक को हाई सोसाइटी प्रोफाइल का हिस्सा मानने वाले परिवारों के बच्चे
जवानी में ही अपना सब कुछ गंवा रहे हैं। नशा एक ऐसी बुराई है ,जिसमे मानव का जीवन समय से पहले
ही अंधकार और मौत की राह पर चला जाता है। नशाखोरी क्या है? एक खतरनाक बीमारी जिसके क्षणिक
सुख के चलते इंसान अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठता है। यह केवल एक बीमारी नहीं है बल्कि यह अनेक
रोगों की जननी भी है।
नशे के अवैध कारोबार को रोकने के लिए जरूरी है की सरकार के साथ समाज जागरूक हो। यह अनेक
सामाजिक, शारीरिक और आर्थिक बुराइयों और बीमारियों की जड़ है। इससे दूर रहना समाज और देश के
हित में है। इसके लिए सामूहिक प्रयासों की जरुरत है। हमारा समाज तभी स्वस्थ होगा जब हम इन बुराइयों
से अपने को दूर कर लेंगे। जब तक आप खुद नहीं चाहेंगे, कोई और आपका नशा नहीं छुड़ा पाएगा। सबसे
पहले मन में ठान लें कि आप नशा छोड़ना चाहते हैं। फिर जो भी नशा कर रहे है उसकी तरफ देखे नहीं।
अपने शरीर पर हो रहे शारीरिक नुक्सान का अनुमान करे। अपने परिवार और बच्चों के भविष्य को देखें।
मन कड़ा करें और नशे को छोड़ दे।
-बाल मुकुन्द ओझा