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विपक्षी गठबंधन की राह में कई रोड़े है

विपक्षी गठबंधन की राह में कई रोड़े है

28 सदस्यों वाले विपक्षी गठबंधन की दो दिन तक चली बैठक शुक्रवार को मुंबई में संपन्न हो गई। बैठक में संकल्प लिया गया कि आगामी लोकसभा चुनाव 'जहां तक संभव हो' एकजुट होकर लड़ा जाएगा। एक पेज के प्रस्ताव में कहा गया है कि सीटों के बंटवारे के मुद्दे पर बातचीत 'तुरंत शुरू की जाएगी और इसे गिव एंड टेक की सहयोगात्मक भावना के साथ अंजाम दिया जाएगा।' संबंधों में किसी भी गड़बड़ी को दूर करने और संयुक्त अभियान और संचार रणनीति तैयार करने के लिए 14 सदस्यीय समन्वय समिति का गठन किया गया है। गठबंधन ने अभी संयोजक नियुक्त नहीं किया है और लोगो को भी अंतिम रूप नहीं दिया गया है।

इंडिया गठबंधन के आगे सबसे बड़ी समस्या भाजपा के कैंडिडेट के आगे वन टू वन कैंडिडेट खड़ी करने में आने वाली है।जिसके लिए अभी गठबंधन की ओर से कोई इशारा नहीं किया गया है। कुछ नेताओं की ओर से पूर्वी उत्तर प्रदेश के घोसी उपचुनाव की नजीर दी जा रही है कि कैसे वहां भाजपा के खिलाफ वन टू वन प्रत्याशी यहां खड़ा किया गया है।कांग्रेस ने घोसी में अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा किया है और समाजवादी पार्टी को फुल सपोर्ट किया है।दरअसल घोसी कभी कांग्रेस की सीट रही नहीं इसलिए उसका प्रत्याशी खड़ा करना या न करना कोई मायने नहीं रखता है।किसी ऐसी सीट से जो कांग्रेस की परंपरागत सीट रही हो वहां दी हुई कुर्बानी ही असल में कुर्बानी है।बसपा ही यहां कुछ कर सकती थी पर पार्टी शुरू से ही उपचुनाव नहीं लड़ती रही है।इसलिए बसपा का कोई प्रत्याशी यहां से नहीं है।उत्तरप्रदेश में पिछले कई चुनावों से वाम पार्टियां अपना चुनावी अस्तित्व खत्म कर चुकी हैं इसलिए उनके भी चुनाव लड़ने या न लड़ने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है।इसलिए यहां तो बात बन गई पर दूसरी जगहों पर क्या होगा ?

अटकलें हैं कि 2019 में जो पार्टी जो सीटें जीती थी, वो सीटें उसे दी ही जाएं। साथ ही जिन सीटों पर जिस पार्टी के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे थे, वो सीटें भी उसी पार्टी को दी जाएं।इस तरह रनरअप फॉर्मूले से कांग्रेस पार्टी को 261 सीटें देनी मजबूरी होंगी। जबकि ममता बनर्जी कहती रहीं हैं कि कांग्रेस 200 सीटों पर लड़े, जाहिर है कि ममता बनर्जी को ये पसंद नहीं आएगा।दूसरी ओर इस फार्मूले को अप्लाई करने पर पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को केवल एक सीट मिल पाएगी और वाम दलों को तो वह भी नहीं। आम आदमी पार्टी की दिल्ली और पंजाब में सरकार है पर उसे केवल तीन ही सीट मिल पाएंगी।इंडिया गठबंधन के अधिवेशनों में माहौल तो खूब बन रहा है पर मुद्दों पर ठोस काम का अभाव दिखता रहा है।

भिन्न- भिन्न विचारों वाली पार्टियों के बीच गंभीर मुद्दों पर आम सहमति कैसे बनेगी? यूसीसी और महिला आरक्षण और मंदिर के मुद्दे पर आपस में सर फुटोव्वल की नौवत आने की हमेशा आशंका बनी रहेगी। दरअसल यूसीसी पर आम आदमी पार्टी का हमेशा से सपोर्ट रहा है। इसी तरह शिवसेना का मंदिर आंदोलन से गहरा नाता रहा है। बाबरी मस्जिद गिराने का श्रेय शिवसेना लेती रही है।महिला आरक्षण का खुलकर तो नहीं पर अंदर ही अंदर विरोध करने वाले दल भी गठबंधन में हैं।आने वाले दिनों में भाजपा ऐसी चालें चलेंगी कि इन दलों को इन मुद्दों पर अपना स्टैंड सार्वजनिक करना पड़ेगा।

किसी खास चुनाव में मिले वोटों को आधार बनाकर सीटों की शेयरिंग कई राज्यों में बहुत मुश्किलें पैदा करेगी। खासकर उन स्टेट में जहां पिछले 2 चुनावों से कोई नई पार्टी उभर रही है।2022 के विधानसभा चुनावों में गुजरात में कांग्रेस को 27.28 फीसदी वोट मिले थे जबकि भाजपा को 52.50 फीसदी वोट मिले।पांच सीटें आम आदमी पार्टी ने जीतकर करीब 15 फीसदी वोट हासिल करने में कामयाब रही थी।जाहिर है कि आम आदमी पार्टी कभी नहीं चाहेगी कि गुजरात में सीट शेयरिंग का फार्मूला 2019 के चुनावों को बनाया जाए। आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 2019 के मुकाबले 2022 में तेजी से बढ़ रहा है। इसका मतलब तो यही है कि 2024 में भी उसे ज्यादा वोट मिलने की उम्मीद होगी।ऐसी दशा में कोई भी पार्टी क्यों सीटों से समझौता करेगी? ऐसा ही पेच कई 2024 में भी उसे ज्यादा वोट मिलने की उम्मीद होगी।ऐसी दशा में कोई भी पार्टी क्यों सीटों से समझौता करेगी? ऐसा ही पेच कई राज्यों में दिखने वाला है।कम से कम पश्चिम बंगाल,गुजरात और महाराष्ट्र और पंजाब में तो बहुत मुश्किल होगी।

इसके आलावा इंडिया अलायन्स के जो नेता ये कह रहे हैं कि विपक्षी एकता से मोदी डर गए हैं, मोदी नर्वस हैं, वे शायद मोदी को जानते ही नहीं। जो लोग कह रहे हैं कि मोदी, विरोधी दलों की एकता से घबरा गए हैं, वे नहीं जानते कि मोदी किस मिट्टी के बने हैं। नर्वस होना, डरना, घबराना ये मोदी की फितरत में है ही नहीं। 13 साल पहले जब वह गुजरात में मुख्यमंत्री थे तो मोदी पर कौन सा हमला नहीं हुआ? उन्हें 'मौत का सौदागर' कहा गया, 'मुसलमानों का हत्यारा' कहा गया। पुलिस भी आई, एसआईटी भी बनी, पूछताछ भी हुई, कोर्ट में केस चले, मीडिया के हमले हुए, अमेरिका ने वीजा नहीं दिया, पूरी दुनिया में बदनामी हुई। केंद्र सरकार ने मोदी को पिन डाऊन करने के लिए पूरी ताकत लगा दी। उस्ताद पुलिस अफसर, चालाक ब्यूरोक्रैट, चतुर राजनेता सब मिलकर मोदी के पीछे लग गए। मेधा पाटकर, तीस्ता सीतलवाड़ जैसे न जाने कितने एनजीओ वाले मोदी को घेरने की कोशिश करते रहे। पर मोदी इन सारे हमलों का सामना करते रहे, बिना डरे लड़ते रहे, गुजरात में चुनाव जीतते रहे। जब मोदी लोकसभा का चुनाव लड़े तो सारे विरोधी दल इसी तरह मोदी के खिलाफ थे जैसे आज हैं। सब कहते थे मोदी कभी प्रधानमंत्री नहीं बन पाएंगे। सब मानकर बैठे थे कि मोदी चुनाव नहीं जीत पाएंगे, लेकिन मोदी ने सबको धूल चटा दी। दूसरी बार चुनाव हुआ तो 'चौकीदार चोर है' का नारा लगा। मोदी को उद्योगपतियों का दोस्त, किसानों का दुश्मन साबित करने की भरपूर कोशिश हुई, लेकिन पब्लिक पर इसका कोई असर नहीं हुआ। इस बार इल्जाम तानाशाही का है, लोकतंत्र की तबाही का है, पर अभी तक कोई साबित नहीं कर पाया कि मोदी ने लोकतंत्र के विरोध में ऐसा क्या किया है। विरोधी दलों ने कहा कि मोदी इस बार जीत गए तो देश में कभी चुनाव नहीं होंगे। मोदी ने इसका जवाब दे दिया कि वह लोकसभा, विधानसभा, पंचायत सारे चुनाव कराना चाहते हैं, एकसाथ कराना चाहते हैं ताकि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत हों। हर सरकार को, राज्य में हों या केंद्र में, पांच साल बिना किसी बाधा के काम करने का मौका मिले। इसीलिए मोदी को हराने के नाम पर एक हुए विरोधी दलों के नेता 9 साल में भी मोदी को पहचान नहीं पाए। वे समझ नहीं पाए कि मोदी किधर जा रहे हैं। वे इसी गलतफहमी में हैं और रहेंगे कि मोदी डर गए और मोदी किसी और रास्ते से आ जाएंगे।

अशोक भाटिया,

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