बटका प्रवृत्ति को लेकर सतर्क तोताराम जी
सदियों सदियों से वैसे तो कुत्ते को आदमी का वफादार साथी कहा गया है, लेकिन कुत्ते की एक प्रवृत्ति काटने या 'बटका' भरने की भी होती है। जब जब आदमी कुत्ते के साथ बकवास(मतलब कुत्ते के साथ छेड़छाड़/ऊल-जलूल हरकत) करता है, तब-तब कुत्ता आदमी के शरीर में 'बटका' रोप देता है। वैसे तो आज का जमाना भी आपसी बटका-बटकी(दांतों से काटना) का है, लेकिन आजकल सबसे ज्यादा बटका-बटकी राजनेताओं में चलती है। वैसे, आज तक तो तोताराम जी को कुत्तों के बटके भरने से डर लगता आया है, क्यों कि कुत्ते द्वारा आदमी के बटका भरने पर नाभि में एकाध नहीं नाभि में पूरे चौदह इंजेक्शन लगते हैं। लेकिन आजकल तोताराम जी कुत्तों के 'बटका' भरने से बिल्कुल नहीं डरते, क्यों कि कुत्तों द्वारा आदमी के बटका भरना(आदमी को काटना) एक आम बात है और आजकल आम बात आम ही होती है, कभी खास नहीं बनती है। वैसे यह खास बात तब बन सकती है जब कोई आदमी 'कुत्ते' के बटका भर ले। समाचार भी वही बनता है, क्यों कि समाचार वह है जो असाधारण हो, जिसे कोई छुपाने की कोशिश कर रहा हो। कुत्ते का आदमी को काटना एक साधारण प्रक्रिया है, इसलिए अमूमन यह समाचार नहीं बनता। लेकिन यदि आदमी कुत्ते को काट लें, मतलब आदमी कुत्ते के बटका भर ले, तो यह बात सुर्खियों में आ जाती है। बहरहाल, तोताराम जी आजकल डरते हैं तो राजनेताओं के 'नफरती और भड़काऊ' भाषाओं से, क्योंकि नेताओं में आजकल बटका प्रवृत्ति विकसित हो रही है। तोताराम जी कहते हैं कि नेताजी आजकल 'नफरती और भड़काऊ' भाषाओं से 'बटके पर बटका' भरते हैं। ये बटके 'कुत्तों के बटके' से भी खतरनाक श्रेणी के होते हैं, जिनके घाव कभी नहीं भरते। तोताराम जी कहते हैं कि ग़र ये बटके खतरनाक नहीं होते तो माननीय सुप्रीम कोर्ट को इन 'बटको' को लेकर शायद कड़ी टिप्पणी नहीं करनी पड़ती। इन बटकों में 'नफरत के कीटाणु' भरे पड़े हैं। आजकल नेता सार्वजनिक मंचों से 'बटके पर बटके' फेंकते हैं। इन बटको की खास बात यह होती है कि इनमें संयम नाम की कोई चीज नहीं होती। वास्तव में संयम और बटकों में उलटा संबंध पाया जाता है। मतलब यह है कि जहाँ बटका है, वहां संयम का कोई अस्तित्व नहीं, और जहाँ संयम है, वहां बटकों का कोई अस्तित्व नहीं। वैसे, राजनीति में धर्म का समावेश इन बटकों को 'परम् सुपर बटका' बनाता है। आज टीवी चैनलों पर राजनैतिक दलों के प्रवक्ता उलट-सुलट मुंह चलाकर 'बटके पर बटका' भरते नजर आते हैं। आजकल ये बटके इतना नेम एंड फेम हासिल कर चुके हैं कि अपना धारदार मीडिया भी इनकी(बटका प्रवृत्ति) की धारदार कवरेज़ करता है। मजे की बात यह है कि इन 'बटकों' से एक तरफ सफेदपोशों का अच्छा-खासा काम चलता है तो दूसरी तरफ इस बटका प्रवृत्ति का निरंतर कवरेज़ करने के कारण मीडिया वाले भी ठाले नहीं रहते। देश की बेरोजगारी दूर हो रही है इस बटका प्रवृत्ति से। इन बटकों से नेताओं को जनाधार मिल रहा है और जनाधार से मलाई पर मलाई मारी जा रही है। इधर कुछ बटका चिकित्सकों को भी इससे रोजगार-वोजगार मिल रहा है। तोताराम जी को इन 'बटकों' से बहुत डर लगता है और पिछले कुछ दिनों से वे किसी 'बेहतरीन बटका चिकित्सक' की तलाश में हैं। बटके अद्भुत हैं, अकल्पनीय हैं, यह बात अलग है कि राज्य तक इन बटकों पर निष्क्रिय हैं। लेकिन अपने खासमखास तोताराम जी इन बटकों को लेकर अति सक्रिय और सतर्क हैं।
-सुनील कुमार महला