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ट्रंप का बड़ा दावा, ईरान से शांति समझौते पर आज लग सकती है मुहर

ट्रंप का बड़ा दावा, ईरान से शांति समझौते पर आज लग सकती है मुहर

वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर जल्द हस्ताक्षर हो सकते हैं, जिसके बाद रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को अंतरराष्ट्रीय आवाजाही के लिए पूरी तरह खोल दिया जाएगा।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कहा कि समझौते की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। उन्होंने यह भी दावा किया कि ईरान अब परमाणु हथियार हासिल करने की इच्छा नहीं रखता और भविष्य में दोनों देशों के संबंध पहले की तुलना में बेहतर हो सकते हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति के अनुसार, समझौते के बाद ईरान के संवर्धित यूरेनियम को हटाने और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों पर भी सहयोग किया जा सकता है। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यदि वार्ता तय दिशा में आगे नहीं बढ़ी तो अमेरिका के पास अन्य विकल्प भी मौजूद हैं।

ट्रंप के बयान का सबसे बड़ा असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस की आपूर्ति होती है। ऐसे में इस मार्ग के खुलने की संभावना को बाजारों के लिए अहम माना जा रहा है।

भारत समेत कई ऊर्जा आयातक देश इस घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। खाड़ी क्षेत्र से होने वाली तेल आपूर्ति में किसी भी बदलाव का असर वैश्विक कीमतों, शिपिंग लागत और ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।

हालांकि, ईरान की ओर से ट्रंप के दावों को लेकर अलग संकेत मिले हैं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बाकेई ने कहा कि फिलहाल किसी अंतिम शांति समझौते या समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर की पुष्टि नहीं की जा सकती। उनके अनुसार, दोनों पक्षों के बीच चर्चा जारी है और संभावित दस्तावेज केवल आगे की बातचीत का आधार बन सकता है।

ईरानी अधिकारियों का कहना है कि परमाणु मुद्दे समेत अन्य विषयों पर वार्ता आने वाले हफ्तों तक जारी रह सकती है। ऐसे में दोनों देशों के बीच किसी व्यापक समझौते को लेकर अभी भी कई सवाल बने हुए हैं।

फिलहाल दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही इन चर्चाओं पर टिकी हुई है, क्योंकि इनके नतीजे का असर केवल दोनों देशों पर ही नहीं, बल्कि पूरे मध्य पूर्व और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

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