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यूक्रेन युद्ध खत्म होने के करीब, ट्रंप ने दिया बड़ा संकेत

यूक्रेन युद्ध खत्म होने के करीब, ट्रंप ने दिया बड़ा संकेत

वाशिंगटन। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि रूस और यूक्रेन के बीच समझौते की संभावना अब काफी करीब दिखाई दे रही है। उन्होंने उम्मीद जताई कि लंबे समय से चल रहा युद्ध जल्द खत्म होने की दिशा में बढ़ सकता है। मरीन वन से रवाना होने से पहले पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत में प्रगति हो रही है। हालांकि उन्होंने किसी बड़े समझौते या खास सफलता के बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ हुई चर्चाओं के बारे में पूछे जाने पर ट्रंप ने कहा, "यूक्रेन में युद्ध का अंत, मुझे सचमुच लगता है कि यह बहुत करीब है।"
बाद में भी ट्रंप ने रूस-यूक्रेन शांति वार्ता को लेकर सकारात्मक रुख दिखाया। उन्होंने कहा, “यह युद्ध अब समाधान की ओर बढ़ रहा है। चाहे लोग मानें या नहीं, लेकिन समझौता करीब आता दिख रहा है। हमें लगता है कि रूस और यूक्रेन के बीच आखिरकार कोई न कोई समझौता हो जाएगा।”
ट्रंप ने उन खबरों को भी खारिज किया जिनमें कहा जा रहा था कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ डोनबास क्षेत्र को लेकर कोई सहमति बनी है। जब उनसे पूछा गया कि क्या पूरा डोनबास रूस को मिलना चाहिए, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा, “नहीं, बिल्कुल नहीं।”
अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि वह युद्ध खत्म कराने के लिए “जो भी जरूरी होगा” करने को तैयार हैं।
ट्रंप यह बयान चीन यात्रा से पहले दे रहे थे, जहां उनकी मुलाकात राष्ट्रपति शी चिनफिंग से होने की उम्मीद है। उन्होंने संकेत दिया कि इस बैठक में यूक्रेन युद्ध समेत कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा हो सकती है।
ट्रंप का मानना है कि अगर दुनिया में तनाव कम होता है तो इसका फायदा वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी मिलेगा। खास तौर पर तेल की कीमतों और महंगाई पर इसका असर पड़ेगा। उन्होंने कहा, “जैसे ही यह युद्ध खत्म होगा, तेल की कीमतों में गिरावट देखने को मिलेगी।”
रूस और यूक्रेन के बीच चार साल से ज्यादा समय से जारी युद्ध ने यूक्रेन के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया है। साथ ही दुनिया भर में ऊर्जा, खाद्य आपूर्ति और सुरक्षा व्यवस्था पर भी इसका असर पड़ा है। इसी वजह से कई देश लगातार दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश कर रहे हैं।
इस बीच भारत पर भी पश्चिमी देशों का दबाव रहा है, क्योंकि युद्ध शुरू होने के बाद से भारत रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल खरीदता रहा है। हालांकि दूसरी तरफ भारत ने अमेरिका और यूरोपीय देशों के साथ ऊर्जा और रक्षा सहयोग भी बढ़ाया है, जबकि रूस के साथ अपने पुराने रणनीतिक रिश्ते भी बनाए रखे हैं।

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