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वंदे मातरम् राष्ट्रवाद का मंत्र, यह कभी अप्रासंगिक नहीं होगा : मदन दिलावर

वंदे मातरम् राष्ट्रवाद का मंत्र, यह कभी अप्रासंगिक नहीं होगा : मदन दिलावर

कोलकाता। राजस्थान परिषद की ओर से राजस्थान दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित "वंदे मातरम 150 वर्ष पूर्ति गौरवशाली स्मरण" के भव्य समारोह में राजस्थान सरकार के शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं बल्कि राष्ट्रवाद का जीवंत मंत्र है, जो सदैव प्रासंगिक रहेगा और देशवासियों को प्रेरित करता रहेगा। उन्होंने कहा कि इस गीत ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में नई चेतना का संचार किया था और आज भी इसकी गूंज राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की भावना को सशक्त करती है।कोलकाता स्थित राष्ट्रीय ग्रंथागार के सभागार में आयोजित इस गरिमामय कार्यक्रम में बड़ी संख्या में प्रवासी राजस्थानी समाज के लोग, साहित्यकार, शिक्षाविद एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। समारोह की अध्यक्षता समाजसेवी एवं उद्योगपति बेणु गोपाल बांगड़ ने की।अपने संबोधन में मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि इसी ऐतिहासिक दिन (29 मार्च, 1857) महान क्रांतिकारी मंगल पांडे ने स्वतंत्रता की पहली लड़ाई का शंखनाद किया था। उन्होंने बंगाल की इस पावन भूमि को भारतीय जनसंघ के प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद की जन्मस्थली बताते हुए इसे राष्ट्रवादी विचारधारा की उर्वर धरती बताया।उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देशभक्ति का उद्घोष बन गया था। यह गीत इतना प्रेरणादायी है कि इसे सुनकर निराश व्यक्ति में भी नवजीवन का संचार हो सकता है। उन्होंने कहा कि इतिहास में ऐसे दौर भी आए जब इस गीत का विरोध हुआ, लेकिन इसके बावजूद यह गीत जनमानस की चेतना में निरंतर जीवित रहा।उन्होंने कहा कि वंदे मातरम का विरोध जब मुस्लिम लीग ने किया तो तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसके खिलाफ इसको लिखने वालों के खिलाफ जांच बैठा दी। उन्हीं लोगों ने जब अपातकाल लगाई और देश को जेल में बदल दिया तो इसी वंदे मातरम का गयान हर जेल में होता था जिसके बाद अंधेरा छंटा।दिलावर ने कहा कि आपातकाल के कठिन दौर में भी देशभक्तों ने जेलों में वंदे मातरम् का गायन कर लोकतंत्र की लौ जलाए रखी। उन्होंने कहा कि यह गीत भारत की आत्मा का स्वर है और इसका महत्व कभी कम नहीं हो सकता।उन्होंने कहा कि वंदे मातरम को जो सम्मान देश में मिलना चाहिए था वह कभी नहीं मिला लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके संपूर्ण गायन का फैसला कर, सम्मान दिया है।उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान समय में इस गीत को जो सम्मान मिलना चाहिए था, वह सुनिश्चित करने की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि राजस्थान के नगरीय विकास एवं स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने अपने संबोधन में बंगाल की क्रांतिकारी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसी धरती से निकलकर रास बिहारी बोस, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज का गठन कर स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। उन्होंने कहा कि राजस्थान ने भी वीरता, साहित्य और बलिदान की परंपरा में सदैव देश का मार्गदर्शन किया है।उन्होंने महाराणा प्रताप, राणा कुंभा जैसे महान योद्धाओं का स्मरण करते हुए कहा कि राजस्थान ने स्वतंत्रता के बाद भी देश को सर्वाधिक वीर सैनिक और बलिदानी दिए हैं। उन्होंने कहा कि आज राजस्थानी समाज देश ही नहीं बल्कि विश्वभर में अपनी प्रतिभा और परिश्रम का परचम लहरा रहा है।समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ प्रेम शंकर त्रिपाठी ने वंदे मातरम् की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि यह गीत भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति है, जिसमें मातृभूमि के प्रति समर्पण और श्रद्धा का अद्वितीय संगम दिखाई देता है।इस अवसर पर ‘वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ पूर्ण होने के उपलक्ष्य में राजस्थान परिषद द्वारा प्रकाशित एक संग्रहणीय स्मारिका का भी लोकार्पण किया गया। इस स्मारिका का संपादन युवा पत्रकार सच्चिदानंद पारीक एवं भागीरथ सारस्वत ने वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रेम शंकर त्रिपाठी के मार्गदर्शन में किया है। इसमें वंदे मातरम् की मूल भावना, उसके राष्ट्रीय संदेश तथा उसके ऐतिहासिक महत्व पर देश के प्रख्यात साहित्यकारों, कवियों एवं लेखकों के विचार संकलित किए गए हैं।कार्यक्रम के दौरान सुप्रसिद्ध गायिका मारुति मोहता एवं उनके सहयोगी कलाकारों ने वंदे मातरम् की संगीतमय प्रस्तुति देकर उपस्थित जनसमूह को भावविभोर कर दिया। साथ ही राजस्थानी लोकगीतों की मनोहारी प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में सांस्कृतिक रंग भर दिए।राजस्थान परिषद के महामंत्री अरुण प्रकाश मल्लावत ने परिषद की गतिविधियों की जानकारी देते हुए बताया कि संस्था अपनी स्थापना के समय से ही राजस्थानी कला, संस्कृति और साहित्य के संरक्षण तथा संवर्धन के लिए निरंतर कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के आयोजन न केवल सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का माध्यम हैं बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी महत्वपूर्ण प्रयास हैं।नेशनल लाइब्रेरी के डीजी अजय प्रताप सिंह ने कहा कि नेशनल लाइब्रेरी भारत के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में लाइब्रेरी और ज्ञानवर्धक पुस्तक लोगों के बीच उपलब्ध करवाने को प्रतिबंध है। इसके लिए उन्होंने राजस्थान के लोगों का आह्वान किया। समारोह का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।

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