कब रुकेगा पंजाब से विदेश जाने का क्रेज ?
यह आज की बात नहीं है । कई वर्षों से पंजाब से विदेशों में पढ़ने व नौकरी करने जाने का चलन बढ़ता ही जा रहा हैं । हम देख रहे हैं कि पंजाब में एक नई सरकार नए विचारों को आज़मा रही है और इसे रोकने का भरपूर प्रयत्न कर रही है । पंजाब के मुख्यमंत्री इस क्रेज को रोकने का भरपूर प्रयास करहे है । मुख्यमंत्री भगवत मान द्वारा हर टी वी चैनल पर युवकों को समझाने का विज्ञापन आ रहा है जिनमें बताया जाता है कि पंजाब में भरपूर रोजगार व अच्छी पढाई के अवसर है उसके बावजूद भी बाहर जाने का क्रेज कम नहीं हो रहा हैं । स्वयं प्रधानमंत्री अपने हर अहम भाषण में सिखों की ओर हाथ बढ़ा रहे हैं। पंजाब के लिए चिंता की जा रही है, यह अच्छी बात है, लेकिन केवल हमदर्दी जताने, समर्थन ज़ाहिर करने, 20 हज़ार और रोज़गार देने, मुफ्त बिजली देने, सिख धर्म का गुणगान करने, लोगों को तीर्थ यात्राएं कराने के वादे करने आदि से ही बात नहीं बनने वाली है जब तक दिलासा जमीनी हकीकत नहीं बन जाता ।
‘यह सही है कि पंजाबियों को संकट से जूझना आता है। देश के बंटवारे के बाद और फिर 1993 में समाप्त हुए आतंक और उग्रवाद के दौर में उन्होंने यह साबित भी किया है।लेकिन इसके बाद यह प्रदेश रास्ता भटक गया। 1991 बाद की औद्योगिक क्रांति का लाभ इसने नहीं उठाया। 1999-2000 तक प्रति व्यक्ति आय के लिहाज़ से कभी पंजाब भारत का नंबर वन, सबसे अमीर प्रदेश था। आज यह नंबर 13 या नंबर 12 पर आ गया है, अगर हम केवल उन राज्यों से इसकी तुलना करें जिनका प्रादेशिक जीडीपी (जीएसडीपी) 1 ट्रिलियन रुपये से ज्यादा है। तब गोवा छंट जाएगा, जो कि एक छोटा-सा राज्य है।
प्रति व्यक्ति 1.69 लाख रुपए की वार्षिक आय के साथ पंजाब अपने दो सहोदरों हरियाणा (2.65 लाख रुपए) और हिमाचल प्रदेश (2.0 लाख रुपए) से काफी पीछे रह गया है। वैसे तेलंगाना 2.7 लाख रुपए के आंकड़े के साथ सबसे ऊपर है और इसके बाद कर्नाटक, हरियाणा, तमिलनाडु और गुजरात का नंबर आता है। इन सबमें समानता क्या है यह आसानी से देखा जा सकता है। इनमें से हरेक राज्य का न केवल शहरीकरण हुआ है बल्कि उन्होंने ऐसे बड़े शहरी केंद्र बनाए हैं जो नई अर्थव्यवस्था के उद्योगों को आकर्षित करते हैं।
पंजाब की यही कहानी 2011-12 से 2021-22 के बीच जीडीपी वृद्धि दरों की है। एक ट्रिलियन से ज्यादा की अर्थव्यवस्था वाले 21 बड़े राज्यों में पंजाब 5 फीसदी की जीडीपी वृद्धि दर के साथ नीचे से छठे नंबर पर है। इसी दशक में गुजरात 8।4 फीसदी के आंकड़े के साथ सबसे ऊपर था, जबकि कर्नाटक (7.3 फीसदी) दूसरे नंबर पर और हरियाणा (6.7 फीसदी) तीसरे नंबर पर थे। यही नहीं, ‘बीमारू’ के ठप्पे वाला मध्य प्रदेश चौथे नंबर पर आ गया था और सांस रोक लीजिए, पंजाब वृद्धि दर के चार्ट में उसी स्तर पर था जिस स्तर पर बिहार था।
पंजाब कृषि में ही अटका रहा है। इसमें शहर कई हैं मगर सारे संकेतक यही बताते हैं कि यह मूलतः ग्रामीण प्रदेश ही है। यश चोपड़ा की फिल्मों में दिखाए जाने वाले सरसों के पीले फूलों से गुलज़ार रोमेंटिक खेतों, संगीत और ‘अपने पास है तो क्यों न दिखाएं’ वाले बेबाक अंदाज़ के ‘पॉप कल्चर’ के बावजूद यह हकीकत नहीं बदलती कि पंजाब अपनी पुरानी शान को ही जी रहा और तेज़ी से पतनशील प्रदेश बन गया है और कुछ नहीं, तो वह अपने जिस गौरव और आत्मसम्मान का अक्सर बड़ी गहराई से और बढ़-चढ़ कर बखान करता रहा है उन्हें वास्तविकता की क्रूर मार झेलनी पड़ रही है। यही वजह है कि एक ओर राज्य ड्रग्स के नशे में फंस गया है, तो दूसरी ओर विदेश में बसने के पागलपन में उलझ गया है।
मैनुफैक्चरिंग हो या सर्विसेज सेक्टर, यहां तक कि ज्यादा रोज़गार देने वाले सिलेसिलाए कपड़ों और होज़री जैसे उद्योग या तो आगे नहीं आए या उनमें गिरावट आई। पंजाब की जीडीपी में अब कृषि का हिस्सा 30 फीसदी हो गया है, जो कि राजस्थान के इस आंकड़े के बराबर है और मध्य प्रदेश (44 फीसदी) और आंध्र प्रदेश (36 फीसदी) के आंकड़ों से नीचे है। पंजाब और इन सभी राज्यों में एक समानता है। इन सबने भी निवेश, प्रतिभा और ग्रोथ को आकर्षित करने के नए शहरी केंद्र नहीं बनाए।
पंजाब का कृषि क्षेत्र भी उसके समकक्ष राज्यों के कृषि क्षेत्र की तरह प्रगति कर रहा होता तो वह अपनी गिरावट की रफ्तार पर लगाम लगा सकता था, लेकिन वो मध्य प्रदेश से भी बहुत पीछे है। खेलकूद समेत तमाम दूसरे क्षेत्रों को जिस ‘बल्ले बल्ले’ वाली आत्मतुष्टता ने जकड़ लिया उससे उसका कृषि क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। राज्य ने नए कृषि कानूनों के खिलाफ जिस तरह आगे बढ़कर आंदोलन चलाया वह इस कहानी को स्पष्ट कर देता है। पंजाब ने अपने किसानों की प्रतिभा और उद्यमशीलता के बूते जो हरित क्रांति लाई थी उसके मद्देनज़र उसे कृषि सुधारों की जितनी ज़रूरत है उतनी दूसरे किसी राज्य को नहीं है। फिर भी, उसने नए कानूनों का जिस तरह विरोध किया वैसा किसी राज्य ने नहीं किया। यह विभाजित सियासत, दशकों की हताशा और अपनी उद्यमशीलता का पूरा ज़ोर केवल और केवल परदेश गमन पर देने का नतीजा था।
इन आंकड़ों से जो निराशाजनक तस्वीर बनती है वह पंजाब आने वाले किसी यात्री को नहीं दिखेगी। वास्तव में पंजाब में गरीबी न के बराबर दिखेगी। न वहां झोपड़पट्टी दिखेगी, न गांवों में कच्चे मकान दिखेंगे, न दरिद्रता दिखेगी। इसे विरोधी तर्क के रूप में पेश करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इसके समर्थन में भी आंकड़े हैं। वहां मात्र 4.75 फीसदी आबादी ही गरीबी रेखा से नीचे है, जो देश में न्यूनतम है। बड़े राज्यों में केवल तमिलनाडु और केरल इस मामले में बेहतर हैं। गरीबी का यह आंकड़ा नीति आयोग की ताज़ा बहुआयामी गरीबी रिपोर्ट एवं रेटिंग से लिया गया है। तब, आखिर समस्या क्या है?
भारत के और किसी राज्य में असमानता का स्तर उतना नीचा नहीं है जितना पंजाब में है। यह सब तो अच्छी बात है। लेकिन कुल जीडीपी का उसका आंकड़ा स्थिर है, जिसका अर्थ यह है कि अमीरों की आबादी काफी कम है।
दरअसल पंजाब का ‘नव-उदारवाद’ का शिकार होना तो दूर, वह जिस जाल में उलझा है उसे कृषि आधारित सामंती पितृसत्ता के रूप में ही परिभाषित जा सकता है। इसलिए उसे इस जाल से निकलने के लिए ‘नव-उदारवाद’ की खुराक की ज़रूरत है। या, चूंकि वहां गरीबी, असमानता, और असली अमीरों की कमी है तो इसे आप समाजवादी कल्पनालोक के रूप में भी देख सकते हैं, लेकिन पंजाब के लोग यह नहीं चाहते, वे इससे भाग रहे हैं।
जालंधर के पास लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के कैंपस के लगभग सामने ग्रैंड ट्रंक रोड पर एक तलहन गुरुद्वारा है, जो विदेश गमन को समर्पित है। वहां लोग इस उम्मीद में विमान के खिलौने जैसे मॉडल चढ़ाते हैं कि वाहेगुरु जल्दी ही उन्हें विदेश जाने के लिए वरदान के रूप में टिकट, पासपोर्ट, वीज़ा दिलाएंगे। पिछले सप्ताह अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी ने श्री अकाल तख्त की सलाह पर श्रद्धालुओं से ऐसी ‘गलती’ से बाज़ आने की हिदायत दी।
वैसे पंजाब में मान सरकार आने के बाद सरकार ने हाल ही में नई औद्योगिक एवं व्यापार विकास नीति-2022 को मंजूरी दी है। इसके तहत पंजाब के मूल निवासियों को रोजगार देने वाले उद्योगों को पंजाब सरकार सब्सिडी देगी। मुख्य इकाइयों को 5 साल की अवधि के लिए प्रति कर्मचारी 36000 रुपये सालाना और महिला एससी, बीसी व ओबीसी कर्मचारियों के लिए 48000 रुपये सालाना तक रोजगार उत्पत्ति सब्सिडी प्रदान की जाएगी।पंजाब सरकार का दावा है कि दस महीने में 20 हजार से ज्यादा सरकारी नौकरियां दी हैं। नौ हजार संविदा कर्मचारियों को पक्की नौकरी दी है। स्कूली शिक्षा सुधारने के लिए सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल को ट्रेनिंग के लिए सिंगापुर भेजा गया है। अब तक दो बैच जा चुके हैं। वहीं, केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के अनुसार 2020-21 के लिए स्कूली शिक्षा में पंजाब टॉप पर रहा है।आशा रखनी चाहिए कि एक दिन पंजाब से विदेश पढ़ने व नौकरी पर जाने का क्रेज जरुर रुकेगा ।