विश्व पुरातत्व दिवस 18 अप्रेल को
जयपुर शहर के निर्माण की नींव नवम्बर 1726 में रखी गईं थी। यह शहर विदेशी पर्यटकों, धार्मिक व देशी पर्यटकों, धनाढ़यों फिल्मी सितारों को अजब लगाव व संतोष देता है क्योंकि पुराने तौर तरीकों व विरासती जलवे के साथ ही यह एक आधुनिक शहर भी है। वर्ष 1727 में जब देश नगर नियोजन से प्रायः अनजान था, जयपुर शहर एक नाप-आकार के राजमार्गो के दोनों और एक सी दुकान-भवनों के वास्तु शिल्प व गुलाबी रंग में रंगा एक खूबसूरत नगर बना।
वर्ष 1832 में आने वाले एक फ्रेंच यात्री ने लिखा था। मुख्य मार्गो के दोनों और महलों, मंदिरों, मकानों के नीचे कारीगरों की दुकानें है जहां दर्जी, स्वर्णकार, ठठेरे, हलवाई, सिकलीगर, चर्मकार व हस्तशिल्प के दस्तकार आदि प्रायः खुली हवा में अपना-अपना काम करते देखे जाते है। दिल्ली में ऐसी एक ही सड़क है चांदनी चौक लेकिन जयपुर मे सभी सड़के ऐसी है। कहं कोई झोपड़ी, कोई जीर्णशीर्ण मकान या कूड़े का ढेर नहीं। नगर वैसा ही दिखाई देता है जैसा यह वास्तव में है। मंदिरों, झरोखों, भव्य द्वार, चौपड़ सुरम्य उद्योगों, चौकों, कपोत-मयूरों के साथ ही रंग-बिरंगें परिधानों में सजें नर-नारियों का यह नगर मध्यकालीन सभ्यता व संस्कृति वाला जयपुर नगर नियोजकों के शोध-अध्ययन को केन्द्र रहा।
जयपुर आने वाले प्रसिद्ध खगोल शास्त्री फादर जोंस ट्राईफेंथेयर ने इस शहर को भारत का सबसे सुंदर शहर बताया जिसमें सीधे, चौडे़ राजमार्ग, समतल व चौड़ी मुख्य सड़कें, पेयजल व जल निकास की उत्तम व्यवस्था, निर्माता सामग्री, सार्वजनिक व निजी आवश्यकताओं के लिए आवास व विक्रय व्यवस्था भावी विकास व विस्तार की पर्याप्त गुंजाइश है। आधुनिक नियोजकों व वास्तुकार के मुंह पर पुराना जयपुर एक तमाचा है। विश हीवर ने नगर के परकोटे व प्राचीन द्वारों की तुलना क्रेमलिन की दीवारों से की है।
जयपुर का आधुनिकरण 1835 में महाराजा रामसिंह ने प्रारम्भ किया। जल प्रदाय व्यवस्था, रोशनी, पक्की सड़कें, स्कूल-कॉलेज, अस्पताल, रामनिवास उद्यान, रामप्रकाश थियेटर, एल्बर्ट हाल निर्मित हुए। महाराजा मानसिंह के समय महाराजा कॉलेज, महारानी कॉलेज, सवाईमान सिंह अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, गायत्री देवी गर्ल्स स्कूल, भगवान दास बैरक्स (सचिवालय) तख्तेशाही, राजस्थान विश्वविधालय, विश्वप्रसिद्ध होटल बने। साल 1947 में परकोटे की जनसंख्या ढाई लाख थी। मानसिंह के समय बाहरी जयपुर का निर्माण प्रारम्भ हुआ, परन्तु पुराने जयपुर की शोभा के अनुरूप नियोजित ढंग से। साल 1943 में आगरा विश्वलिधालय के दीक्षांत भाषण में मिर्जा इस्माइल ने कहा था- आगरा भारत का सबसे गंदा शहर है। जयपुर तब निहायत साफ सुथरा शहर था। रास्तों के दोनों और यू शेप की नालियां, दोनों समय सफाई व धुलाई। नियमित सफाई व्यवस्था। कचरें गंदगी, बदबू, मक्खी-मच्छर का नाम नहीं। मकानों के बीच की गलियों की सफाई के साथ हाथों-हाथ कचरे को उठाने की व्यवस्था, चौक व खुले स्थानों पर बच्चों के खेल व सांस्कृतिक आयोजनों की व्यवस्था। सामुदायिक, सामूहिक जनचेतना व समाज व समाज व राज्य का डर आज तो जयपुर का स्वच्छ, स्वास्थ्यप्रद, हरा-भरा, अतिक्रमण मुक्त रखना इस नगर की सबसे प्रमुख समस्या है।
जयपुर का दुर्भाग्य है कि इसकी स्थापत्यकला, नियोजन व खूबसूरती को नजरअंदाज किया गया। पंजाब के लिए चण्डीगढ़, खूबसूरती को नजरअंदाज किया गया। पंजाब के लिए चण्डीगढ़, उड़ीसा के लिए भुवनेश्वर व गुजरात के लिए गांधीनगर बना मगर उसी तर्ज पर नए जयपुर की बसावट पर सोचा ही नहीं गया। राजधानी बनना ही जयपुर के लिए अभिशाप बन गया। अवैध निर्माण व अतिक्रमण, व्यावसायिक गतिविधियों, अनियंत्रित परिवहन के कारण इसका स्वरूप बदरंग होता गया। अलाइन्मेंट, स्काईलाइन, एक रूपता समाप्त हो गई।
जहां प्रथम फ्रेंच यात्री व फादर जांस टाईंफ्रेन्थर ने इस शहर को सबसे सुन्दर नगर बताया था वहीं गत वर्ष जयपुर आए फ्रांस के प्रसिद्ध वास्तुविद प्रो. रेमीपेपीलों जयपुर की चारदीवारी व प्राचीन स्वरूप में तेजी से हो रहे बदलाव से खासे चिन्तित थे। दो बार जयपुर आचुके प्रो. पेपीलो, जो जयपुर की चौक परम्परा से बने मकानों से विशेष प्रभावित रहे है का कथन ळै कि जयपुर का हेरिटेज स्वरूप समाप्त हो रहा हैं। झरोखों, जालियां व चित्रकारी से सजी दीवारें तोड़कर एयरकन्डीशनर व कूलर लगाए जा रहें है। परिवारों के बंटवारे के लिए बिना सोचे समझे प्राचीन झरोखों, खिड़कियों, दीवारों व चौकों में तोड़फोड़ की जा रही है। हम प्रेरणा लें फ्रांस के गुलाबी शहर टयूलोस से जो पांच सौ साल पुराना है और उसके मूल स्वरूप व वास्तुशिल्प को आज तक नहीं छेड़ा गया है प्रमुख भवनों के मूल स्वरूप व बाहरी स्वरूप के परिवर्तन पर कानूनी रोक लगा दी है। दूसरी और जयपुर को उजाड़ा जा रहा है।
दिल्ली, मुम्बई इण्डस्ट्रीयल कोरीडोर के सीइओ अभिताभ कान्त, जिन्होंने पर्यटन के क्षेत्र में कीर्तिमान स्थापित किए है, ने जयपुर में स्पष्ट कहा कि जयपुर को सड़कों पर बिखरे व सड़ते कचरे से छुटकारा पाना चाहिए, जयपुर की ख्याति धूमिल हो रही है। इसी प्रकार दो विदेशी एन्डी व लिंडसे ने अपने एक संदेश में लिखा कि जयपुर भीड़भरा, गंदा व बदबूदार शहर है। ऐतिहासिक स्थल गंदें, तिरष्कृत, अंधेरे गलियारों में गंदगी, सड़ते पेशाब घर जिनकी दीवारें गंदी लिखावटों से भरी है। सड़के, चौराहे व गोल चक्करों पर भीड़भाड़ व जाम, सड़कों पर गढ्ढे व आवारा पशु, कचरें के ढेर से प्रतीत होता है कोई सक्रिय संगठन व सफाई पद्धति ही नहीं है। तेज दौड़ती, गिरती-पड़ती-लड़ती-शोर मचाती भीड, भारी व हल्के वाहन, स्कूटर रिक्शा, साइकिलें, हाथी, घोडे़ बैण्डबाजे-बारातें, जुलूस-रैलियां जाहिर करती है कि जयपुर में कोई वर्ल्ड सिटी कभी नहीं बन सकता। नई योजनाएं तब ही कारगर व सफल होंगी जब सबसे पहले इस नगर को स्टिंक सिटी से पुनः पिंकसिटी बनाया जाएं।
-डॉ. सत्यनारायण सिंह