पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व में हो रही आराधना
डग. पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व में जैन समाज के लोग आठ दिनों तक अपने अपने प्रतिष्ठान बंद रख कर धर्म आराधना , जप ,तप - तपस्या में लीन रहते दिखाई दिए । सुबह से ही पूजन , व्याख्यान ,प्रतिक्रमण कर पर्व में आराधना कर रहे ।पद्मप्रभ जैन उपाश्रय में विराजमान साध्वी मुक्तिप्रिया श्रीजी म.सा. की निश्रा में सा. मृदुप्रिया श्री जी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा की पर्युषण के द्वितीय दिन वार्षिक ग्यारह कर्त्तव्यों पर प्रकाश डाला जिसमें प्रथम है संघपूजा। संघ यानि संगठन, अकेले हम बूँद है मिल जाए तो सागर है अकेले हम धागा हे मिल जाए तो चादर है अकेले हम लकड़ी है मिल जाए तो गरठर अकेले हम फुल है मिल जाऐ तो बगीचा है अकेले हम श्रावक है मिल जाऐ तो संघ है। 'युनिटी की बहुत बड़ी ताकत है। दूसरा कर्त्तव्य है साधर्मिक भक्ति, तीसरा कर्तव्य हे स्नात्र महोत्सव चौथा हे तीर्थयात्रा, इत्यादि पर्युषण के तृतीय दिवस पर मूर्ति और मंदिरों को उपयोगिता बताई गई। मूर्तिपूजा के निमित्त देश में लाखों मंदिर बने, शिल्पकला का विकास हुआ त्याग और उदारता के उच्च गुणों का विकास हुआ भाईचारा बढ़ा, मजदूरों को रोजगार मिला, दान के संस्कार बढ़े, दर्शक तनावमुक्त बने इस प्रकार मूर्तिपूजा ने अनाथों को सनाथ बनाकर, पापीयों को पुण्यात्मा बनाकर मानव जाति को बहुत शांति प्रदान की है आदिनाथ जिनालय में विनय कुमार भंवर लाल जैन की ओर से नवपद पूजन का आयोजन किया गया।