छड़ी महोत्सव समापन पर उमड़ा श्रद्धा का सैलाब ,
पदमपुर . संत फकीर पारब्रह्मदेव का तीन दिवसीय छड़ी महोत्सव पूज्य पारब्रह्मदेव मंदिर में भानुशाली समाज के तत्वाधान में महा आरती के साथ हुआ संपन्न , हजारों की संख्या में बीकानेर संभाग , गुजरात आदि स्थानों से आये श्रद्धालुओं ने छड़ी उत्सव में सम्मिलित होकर श्रद्वा भाव से ऐतिहासिक छड़ी के समक्ष नम मस्तक होकर किए दर्शन, माताओ ने बच्चों का मुंडन संस्कार करवाया मनाया जश्न एवं सुख समृद्धि की प्रार्थना कर भजन संध्या का आंनद भक्ति भाव से नृत्य कर किया खुशियों का इजहार , गादेश्वर अशोक कुमार शर्मा व हैमन्त शर्मा ,प्रतीक शर्मा ने छड़ी का भव्य श्रगारं व पूजा अर्चना का कार्य मंत्रोंउच्चारण से संपन्न करवाने पर छड़ी साहिब को मन्दिर में नगर परिक्रमा कर दुसरे स्थान पर अस्थाई रूप से स्थापित कर कन्याओं व ब्राम्हणों को सिंधी समाज के व्यक्तियों द्वारा ब्रहमभोज करवाकर उनके चरण स्पर्श किए गए । दिन लगातार पर अटूट लंगर व मिठे पानी के साथ अन्य प्रकार की छबीले श्रद्वालुओ के सहयोग से लगाई गई । अध्यक्ष तुलसी हंजवानी , लालचंद बादलानी ,दौलत सोनी, मुकुल शर्मा , ईशर बदरा ,लालू मस्ताना , मुकुल शर्मा ,हरीश शर्मा , हरीश डामा ,हेमंत डामा , कुंदन डामा ,जनकराज गजरा बीकानेर , खुशी कटारिया प्रवीन चंदानी श्रीगंगानगर , जामन दास गजरा , रूपचंद सेठिया , गोरधन सेठिया, सहित समाज के प्रमुख लोगो ने छड़ी उत्सव का हिस्सा बन सफल आयोजन की शुभकामनाएं प्रेषित , भारतीय सिंधु सभा के संभाग प्रभारी घनशाम हरवानी ने छड़ी इतिहास के बारे में बताया कि पारू से बने पारब्रह्म देव देश भर में आस्था का केंद्र बने हुए हैं । पारब्रह्मदेव जी का संपूर्ण जीवन अत्यंत इतिहासिक व चमत्कारी रहा , पिता का नाम मधुसूदन शर्मा व माता का नाम मेधी बाई था। वे कुल से ब्राह्मण थे, गांव कुलरिया में खेती करते थे। मधुसूदन शर्मा के संतान में सात पुत्र थे। सातवां पुत्र जिसका नाम पारू था। इनके जन्म के बाद इनकी जन्म कुंडली जब एक विद्वान ब्राह्मण से बनवाई जा रही थी तो उसे विद्वान ब्राह्मण ने मधुसूदन शर्मा को कहा कि यह बालक भगवान शंकर जी का रूद्रावतार है और यह जन्म फकीर है। यह बात सुनकर मधुसूदन शर्मा व उसकी धर्मपत्नी परेशान हुए तो उन्होने पारू की सगाई आठ साल की छोटी उम्र में एक सुशील कन्या से करवा दी। इस कन्या का नाम मेधी बाई था। अपनी सगाई की बात से पारू स्वयं परेशान हो गया और उन्होंने अपनी माता से एक चुनरी मांगी और लेकर नारायणसर रवाना हुआ जहां इनकी सगाई हुई थी। यह चुनरी उन्होंने मेघीबाई के सिर पर डालकर उन्हें सदा के लिए अपनी बहन बना लिया और यहां से विदाई लेकर पारब्रह्म हिंगलाज रवाना हुआ। यहां पर पारब्रह्म ने हिंगलाज माता की तपस्या की और माता ने प्रसन्न होकर पारब्रह्म को दर्शन दिए और पारब्रह्म को त्रिशूल से नवाजा और आदेश दिया कि वह जाकर मेकण दादा कापड़ी को गुरू धारण करे । पारू ने मेकणदादा कापड़ी को गुरू बनाया और उनकी बहुत सेवा की और वरदान प्राप्त किए। पारू से पारब्रह्मदेव हुए गुरू पारब्रह्म ने अनेक पर्चे दिए और चमत्कार दिखायें और अंत में सिन्ध देश के थरपारकर जिले के माऊपटण गांव में संत पारब्रह्म ने जीते जी समाधि ली। समाधि लेने से पूर्व संत पारब्रह्म के परिवार वालों को समाचार मिला तो वह कुनारिया से माऊटपण आकर संत जी प्रेम से रोने लगे। अपने परिवार के सदस्यों को मोह-ममता से रोता देखकर गुरू पारब्रह्म ने ऐसा चमत्कार किया जिसे देखकर सब हैरान रह गए। पारब्रह्म ने चतुर्भुजी रूप धारण कर लिया। जिसके चारों हाथों में एक - एक छड़ी ओर पांचवीं छड़ी मस्तक पर थी मस्तक वाली छड़ी उठवाने लगे तो यह छड़ी धरती में समा गई। अब इनमें एक छड़ी अहमदाबाद के कुबेर नगर, दूसरी कछ भुज गुजरात, तीसरी पदमपुर में और चौथी अजमेर में है। ये छड़ियां पारब्रह्म जी ने अपने दुःखी कुटुम्बजनों को देकर शांत किया I