दुर्घटनाओं के आंकड़े सड़क सुरक्षा नियमों की विफलता को दर्शा रहे हैं
सड़क हादसों पर सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय की डरावनी, चिन्ताजनक एवं भयावह रिपोर्ट आई है। इसके मुताबिक, पिछले साल 4.61 लाख सड़क हादसे हुए। इन दुर्घटनाओं में 1.68 लाख लोगों ने जान गंवाई। इन आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि तकरीबन हर एक घंटे में 53 सड़क दुर्घटनाएं हुईं। हर घंटे इनमें 19 लोगों की मौत हुई। हादसों एवं लापरवाही की खूनी होती सड़कें चिन्ता का बड़ा सबब हैं। सड़कों की ‘दुर्घटनाओं’ के कुछ दृश्य आंखों के सामने आ जाते हैं, जो भयावह होते हैं, त्रासद होते हैं, डरावने होते हैं। सच यह है कि बेलगाम वाहनों एवं यातायात कानूनों एवं नियमों की अवहेलना की वजह से सड़कें अब पूरी तरह असुरक्षित हो चुकी हैं। सड़क पर तेज गति से चलते वाहन एक तरह से हत्या के हथियार होते जा रहे हैं। उक्त रपट यह भी बताती है कि सड़क हादसों की संख्या में 11.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई और उनसे होने वाली मृत्यु की दर 9.4 प्रतिशत बढ़ी। इसी तरह सड़क हादसों में घायल होने वालों की संख्या में 15.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। एक्सप्रेसवे हाईवे और राजमार्गों पर ओवर स्पीडिंग जानलेवा दुर्घटनाओं को निमंत्रण देने का ही काम करती है लेकिन न तो वाहन चालक अपनी जिम्मेदारी समझने को तैयार हैं और न ही सरकारें एवं यातायात पुलिस। बीते वर्ष सड़क हादसों में 66 हजार से अधिक लोगों ने इसलिए जान गंवाई क्योंकि उन्होंने सीट बेल्ट नहीं पहनी थी या फिर हेलमेट नहीं लगाया था। यह विडम्बनापूर्ण है कि हर रोज ऐसी दुर्घटनाओं और उनके भयावह नतीजों की खबरें आम होने के बावजूद बाकी वाहनों के मालिक या चालक कोई सबक नहीं लेते। सड़क पर दौड़ती गाड़ी मामूली गलती से भी न केवल दूसरों की जान ले सकती है, बल्कि खुद चालक और उसमें बैठे लोगों की जिंदगी भी खत्म हो सकती है। पर लगता है कि सड़कों पर बेलगाम गाड़ी चलाना कुछ लोगों के लिए मौज-मस्ती एवं शौक का मामला होता है लेकिन यह कैसी मौज-मस्ती है जो कई जिन्दगियां तबाह कर देती है। ऐसी दुर्घटनाओं को लेकर आम आदमी में संवेदनहीनता की काली छाया का पसरना त्रासद है और इससे भी बड़ी त्रासदी सरकार की आंखों पर काली पट्टी का बंधना है। हर स्थिति में मनुष्य जीवन ही दांव पर लग रहा है। इन बढ़ती दुर्घटनाओं की नृशंस चुनौतियों का क्या अंत है? बहुत कठिन है दुर्घटनाओं की उफनती नदी में जीवनरूपी नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना, यह चुनौती सरकार के सम्मुख तो है ही, आम जनता भी इससे बच नहीं सकती। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने 2024 तक देश में दुर्घटनाओं और उनसे होने वाली मौत की संख्या को आधा करने का लक्ष्य रखा है, जो एक उम्मीद जगाता है एवं रोशनी बन रहा है। दुनिया में सर्वाधिक तेजी से उन्नत सड़कों का जाल बिछाने में भारत अग्रणी है। लेकिन सुविधाजनक एवं उन्नत होती सड़कों पर मौत की काली छाया का मंडराना सड़क विकास पर एक बदनुमा दाग है। यह दाग सरकारी रिपोर्ट में ही सामने आया है, जिसके अनुसार देश में 2022 में कुल 4,61,312 सड़क हादसे हुए, जिनमें से 1,51,997 यानी 32.9 प्रतिशत हादसे एक्सप्रेसवे एवं राष्ट्रीय राजमार्गों (एनएच) पर हुए। वहीं 1,06,682 यानी 23.1 प्रतिशत हादसे राज्य राजमार्गों जबकि 2,02,633 यानी 43.9 प्रतिशत हादसे अन्य सड़कों पर हुए। रिपोर्ट कहती है कि सड़क हादसों में जान गंवाने वाले लोगों में एक बड़ी संख्या सुरक्षात्मक साधनों का इस्तेमाल न करने वालों की रही। सीट बेल्ट न पहनने की वजह से 16,715 लोगों की इन हादसों में मौत हो गई जिनमें से 8,384 लोग ड्राइवर थे जबकि बाकी 8,331 लोग वाहन में बैठे यात्री थे। इसके अलावा 50,029 दोपहिया सवार भी हेलमेट न पहनने की वजह से इन हादसों में अपनी जान गंवा बैठे। लगातार चौथे साल घातक सड़क दुर्घटना का सबसे अधिक युवा शिकार हुए। राज्यों में तमिलनाडु में 2022 में राष्ट्रीय राजमार्गों पर सबसे अधिक 64,105 सड़क दुर्घटनाएं हुईं, जबकि सड़क दुर्घटना में जान गंवाने वालों की संख्या उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 22,595 रही।
सड़क दुर्घटनाओं का लगातार बढ़ना अनेक सवाल खड़े करता है। तभी सुप्रीम कोर्ट भी तल्ख टिप्पणी कर चुका है कि ड्राइविंग लाइसेंस किसी को मार डालने के लिए नहीं दिए जाते। हादसों से संबंधित कानूनी प्रावधान अभी इस कदर कमजोर हैं कि किसी की लापरवाही की वजह से दो-चार या ज्यादा लोगों की जान चली जाती है और आरोपी को कई बार थाने से ही छोड़ दिया जाता है। सड़क दुर्घटनाओं ने कहर बरपा रखा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2009 में सड़क सुरक्षा पर अपनी पहली वैश्विक स्थिति रिपोर्ट में सड़क दुर्घटनाओं की दुनिया भर में ‘सबसे बड़े कातिल’ के रूप में पहचान की थी। भारत में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में 78.7 प्रतिशत हादसे चालकों की लापरवाही के कारण होते हैं। वैसे एक प्रमुख वजह शराब व अन्य मादक पदार्थों का सेवन कर वाहन चलाना है। विडंबना यह है कि जहां हमें पश्चिमी देशों से कुछ सीखना चाहिए वहां हम आंखें मूंद लेते हैं और पश्चिम की जिन चीजों की हमें जरूरत नहीं है उन्हें सिर्फ इसलिए अपना रहे हैं कि हम भी आधुनिक कहला सकें। एक आकलन के मुताबिक आपराधिक घटनाओं की तुलना में पांच गुना अधिक लोगों की मौत सड़क हादसों में होती है। कहीं बदहाल सड़कों के कारण तो कहीं अधिक सुविधापूर्ण अत्याधुनिक चिकनी सड़कों पर तेज रफ्तार अनियंत्रित वाहनों के कारण ये हादसे होते हैं। दुनिया भर में सड़क हादसों में बारह लाख लोगों की प्रतिवर्ष मौत हो जाती है, जिनमें भारत में सर्वाधिक मौते होती है। ट्रैफिक व्यवस्था कुछ अंशों में महानगरों को छोड़कर कहीं पर भी पर्याप्त व प्रभावी नहीं है। पुलिस ''व्यक्ति'' की सुरक्षा में तैनात रहती है ''जनता'' की सुरक्षा में नहीं। हजारों वाहन प्रतिमास सड़कों पर नए आ रहे हैं, भीड़ बढ़ रही है, रोज किसी न किसी को निगलने वाली ''रेड लाइनें'' बढ़ रही हैं। दुर्घटना में मरने वालों की तो गिनती हो जाती है पर वाहनों से निकलने वाले जहरीले धुएँ से प्रतिदिन मौत की ओर बढ़ने वालों की गिनती असंख्य है। वाहनों में सुधार हो रहा है पर सड़कों और चालकों में कोई सुधार नहीं। सन् 2023 तक वाहनों का उत्पादन और मांग जिस अनुपात में बढ़ेगी, सड़कें उस अनुपात में नहीं। अतः यातायात-अनुशासन बहुत जरूरी है।
नया भारत निर्मित करने, औद्योगिक विकास और पूंजी निवेश के लिए सरकार सभी प्रकार के गति-अवरोधक हटा रही है। लगता है सड़कों पर भी गति अवरोध हटा रही है। कोई चाहिए जो नियमों की सख्ती से पालना करवा के निर्दोषों को मौत के मुंह से बचा सके। 1988 में बने मोटर वाहन अधिनियम का व्यावहारिकता से परे होना भी दुर्घटनाओं का बड़ा कारण है। पिछले तीन दशकों में सड़क परिवहन में आए बदलाव के अनुरूप मोटर अधिनियम में व्यापक बदलाव की दरकार है। अगर सरकार नए वाहनों को लाइसेंस देना बंद नहीं कर सकती तो कम से कम राजमार्गों पर हर चालीस-पचास किलोमीटर की दूरी पर एक ट्रॉमा सेंटर तो खोल ही सकती है ताकि इन हादसों के शिकार लोगों को समय पर प्राथमिक उपचार मिल सके। तेजी से बढ़ता हादसों एवं लापरवाही का हिंसक एवं डरावना दौर किसी एक प्रान्त या व्यक्ति का दर्द नहीं रहा। इसने हर भारतीय दिल को जख्मी किया है। इंसानों के जीवन पर मंडरा रहे मौत के तरह-तरह की डरावने हादसों एवं दुर्घटनाओं पर काबू पाने के लिये प्रतीक्षा नहीं, प्रक्रिया आवश्यक है। तेज रफ्तार से वाहन दौड़ाते वाले लोग सड़क के किनारे लगे बोर्ड़ पर लिखे वाक्य ‘दुर्घटना से देर भली’ पढ़ते जरूर हैं, किन्तु देर उन्हें मान्य नहीं है, दुर्घटना भले ही हो जाए।
इस बैठक के बाद बेंगलुरु में विपक्षी दल के नेता मिले थे। इस बैठक में 20 से ज्यादा दलों के नेता शामिल हुए थे। लेकिन बैठक का नेतृत्व कांग्रेस ने किया था। यहां तक कि राहुल गांधी ने अचानक बिना चर्चा के गठबंधन का नाम इंडिया तय कर दिया था। इस पर ममता बनर्जी ने भी समर्थन दिया था। हालांकि, नीतीश कुमार इस नाम के पक्ष में नहीं थे। इतना ही नहीं नीतीश कुमार बैठक के बाद आयोजित संयुक्त प्रेस वार्ता से पहले ही पटना लौट आए थे। इसके बाद नीतीश कुमार की नाराजगी की खबरें सामने आई थीं। कहा गया था कि जिस तरह से विपक्ष की बैठक को कांग्रेस ने हाईजैक किया, उससे नीतीश नाराज हैं। लांकि, मुंबई में आयोजित तीसरी बैठक में नीतीश कुमार हिस्सा लेने पहुंचे थे।
पटना, बेंगलुरु और मुंबई में आयोजित हुईं बैठकों के बाद इंडिया गठबंधन तो बन गया। हालांकि, सीटों के बंटवारे, संयोजक कौन होगा, भाजपा से मुकाबले के लिए गठबंधन की रणनीति क्या होगी ये तय नहीं हो सका था । हाल ही में सीटों के बंटवारे को लेकर जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से सवाल किया गया था तो उन्होंने कहा था कि 5 राज्यों में चुनाव के बाद इस पर बात होगी।
गौरतलब है कि विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिए पटना से कोलकाता, दिल्ली से चेन्नई एक कर देने वाले नीतीश कुमार ने कहा है कि आजकल गठबंधन का कोई काम नहीं हो रहा। कांग्रेस पांच राज्यों के चुनाव में व्यस्त है, इस तरफ ध्यान नहीं दे रही है। उन्होंने ये भी कहा कि हम सबको एकजुट कर, साथ लेकर चलते हैं। हम लोग सोशलिस्ट हैं। सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट को एक होकर आगे चलना है। अब नीतीश के इस बयान के मीन-मेख निकाले जाने लगे हैं। भारतीय जनता पार्टी के नेतृ्त्व वाले केंद्र की सत्ता पर काबिज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए को हराने के लिए एक सीट पर एक उम्मीदवार के फॉर्मूले की वकालत करने वाले नीतीश आखिर अचानक इतने तल्ख क्यों हो गए?
सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि इस बयान के एक दिन पहले ही नीतीश कुमार से जब इंडिया गठबंधन में अनबन को लेकर सवाल हुआ, तब उन्होंने हाथ जोड़ लिए थे। ऐसे समय में जब उत्तरप्रदेश में अखिलेश यादव ने 65 सीटों पर चुनाव लड़ने का एकतरफा ऐलान कर अपनी लकीर खींच दी है, नीतीश कुमार के इस बयान के मायने क्या हैं? सुशासन बाबू का ये बयान कहीं हिंदी पट्टी के दो बड़े राज्यों में इंडिया गठबंधन का रास्ता ब्लॉक हो जाने का संकेत तो नहीं? नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी कह चुके हैं कि गठबंधन में सबकुछ ठीक नहीं है। हम फिर बैठेंगे और मिलकर आगे बढ़ने की कोशिश करेंगे। ऐसे में सवाल विपक्षी गठबंधन के भविष्य को लेकर भी उठ रहे हैं।
अब सवाल ये भी उठ रहे हैं कि जब इंडिया के घटक दल पहले से ही महागठबंधन में साथ हैं तो फिर समस्या कहां है? कहा तो ये भी जा रहा है कि जिस तरह कांग्रेस ने राजस्थान, मध्य प्रदेश समेत सभी चुनावी राज्यों में और सपा ने उत्तर प्रदेश में अपनी लकीर खींच दी है। नीतीश कुमार की रणनीति भी कुछ वैसी ही हो सकती है। दरअसल, कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियां बिहार में 14 सीटों पर दावा कर रही हैं। 40 सीटों वाले सूबे में अगर कांग्रेस-लेफ्ट को उनकी मांग के मुताबिक 14 सीटें दे दी जाएं तो फिर जेडीयू और आरजेडी के लिए 26 सीटें ही बचती हैं।
जेडीयू के 16 उम्मीदवार 2019 में जीते थे जबकि आरजेडी 19 सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। जेडीयू पिछले चुनाव में जीती सीटों से कम सीटों पर तैयार नहीं होगी। अब दूसरा पहलू ये भी है कि कांग्रेस 2019 में केवल एक सीट जीत सकी थी और अब दावा 10 पर कर रही है।
विधानसभा चुनाव की बात करें तो कांग्रेस ने 70 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और पार्टी महज 19 सीटें ही जीत सकी थी। तब महागठबंधन सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत के जादुई आंकड़े से मामूली अंतर से पीछे रह गया था और इसके लिए कांग्रेस के प्रदर्शन को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा था। कहा जा रहा है कि 2019 के आम चुनाव और 2020 के बिहार चुनाव में कांग्रेस के प्रदर्शन को देखते हुए नीतीश कुमार कांग्रेस को अधिक सीटें देने के पक्ष में नहीं हैं। नीतीश कुमार के ताजा बयान को कांग्रेस के लिए सख्त संदेश की तरह देखा जा रहा है कि बिहार में उसे उनकी ही माननी पड़ेगी। पहले अखिलेश और अब नीतीश के बयान को पांच राज्यों के नतीजों के बाद बारगेन पावर बढ़ने की उम्मीद लगाए कांग्रेस के लिए झटके की तरह देखा जा रहा है। अखिलेश ने तो दो टूक कह दिया है कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जीत भी जाते हैं तो किसी मुगालते में ना रहें। यहां दाल नहीं गलने वाली।
उत्तर प्रदेश और बिहार, दोनों ही राज्य लोकसभा चुनाव के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण है। लोकसभा के 543 में से 120 सदस्य इन्हीं दो राज्यों से चुनकर आते हैं। आंकड़ों के हिसाब से देखें तो उत्तर प्रदेश -बिहार के सदस्यों की तादाद कुल सदस्य संख्या के करीब 22 फीसदी पहुंचती है। ऐसे में सवाल ये भी है कि अपनी खोई जगह वापस पाने के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस इन दो राज्यों में सहयोगी दलों की शर्तें मानेगी या यहां इंडिया गठबंधन का रास्ता ब्लॉक हो जाएगा?