मानसून में घट सकता है खरीफ फसलों का रकबा
- मानसून में खरीफ फसलों के रकबे में लगभग पांच प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई है। वहीं धान का रकबा 34.6 प्रतिशत घटकर 10.77 लाख प्रति हेक्टेयर पर आ गया है, जबकि तिलहनी फसलों का रकबा 3.3 प्रतिशत गिरकर 9.21 लाख हेक्टेयर पर आ गया है।
डॉ. मनोज मुरारका, ऑयल रिसर्चर
पहले मूसलाधार बारिश और फिर मानसून की बेरुखी से देश के कई राज्यों में बाढ़ और सूखे जैसे हालात बन गए हैं। इन वजहों से किसानों की परेशानियां भी बढ़ गई हैं। मानसूनी बारिश की कमी की वजह से बुआई की प्रगति में गिरावट दर्ज की गई है, क्योंकि बारिश मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु और पूर्व के कुछ हिस्सों में ही हुई है। उत्तर-पूर्व क्षेत्र में कपास का रकबा एक साल पहले की तुलना में इस बार बहुत कम हो गया है, क्योंकि महाराष्ट्र में मानसूनी बारिश की कमी के कारण बुआई प्रभावित हुई है। कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, जून तक खरीफ सीजन में बोई गई फसलों का कुल रकबा 4.5 प्रतिशत कम होकर 129.52 लाख हेक्टेयर है, जबकि पिछले साल की इसी अवधि में यह 135.64 लाख हेक्टेयर था।
खरीफ की मुख्य फसल धान का रकबा 34.6 प्रतिशत गिरकर 10.77 लाख प्रति हेक्टेयर पर है, जबकि सभी दालों का रकबा संयुक्त रूप से 3.8 प्रतिशत बढ़कर 6.54 लाख प्रति हेक्टेयर और तिलहनों का रकबा 3.3 प्रतिशत गिरकर 9.21 लाख प्रति हेक्टेयर पर आ गया है। हालांकि बाजरे की अधिक बुआई के कारण मोटे अनाजों के तहत बुआई क्षेत्र 37.9 प्रतिशत बढ़कर 18.45 लाख प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया है। गन्ने का रकबा साल भर पहले की तुलना में थोड़ा अधिक है और 50.76 लाख प्रति हेक्टेयर तक पहुंच गया है। वहीं दालों में तुअर 0.62 लाख हेक्टेयर (एक साल पहले के 1.8 लाख हेक्टेयर के मुकाबले), मूंग 3.83 लाख हेक्टेयर (2.72 लाख हेक्टेयर) और उड़द 0.55 लाख हेक्टेयर (0.79 लाख हेक्टेयर) में बोई गई है।
तिलहन में मूंगफली की बुआई 7.68 लाख हेक्टेयर (6.78 लाख हेक्टेयर) और सोयाबीन 0.99 लाख हेक्टेयर (1.55 लाख हेक्टेयर) में बोई गई है। मोटे अनाजों में मक्के का क्षेत्रफल 7.59 लाख हेक्टेयर (9.78 लाख हेक्टेयर), बाजरा का 9.91 लाख हेक्टेयर (2.26 लाख हेक्टेयर) और ज्वार का 0.31 लाख हेक्टेयर (0.54 लाख हेक्टेयर) तक पहुंच गया है। वहीं कपास का रकबा पिछले साल के मुकाबले 32.67 लाख प्रति हेक्टेयर से 14.2 प्रतिशत घटकर 28.02 लाख प्रति हेक्टेयर हो गया है, क्योंकि महाराष्ट्र, पंजाब और कर्नाटक में बुआई कम हो गई है। गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में कपास का रकबा अधिक बताया गया है। जूट और मेस्टा के रकबे में 12.2 प्रतिशत की गिरावट के साथ 5.77 लाख प्रति हेक्टेयर की गिरावट दर्ज की गई है।
जून तक देश में 129.53 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुआई हो चुकी है, जो पिछले साल के मुकाबले लगभग 6.12 लाख हेक्टेयर कम है। हालांकि पिछले साल भी मानसून देरी से आया था। साल 2021 से तुलना करें तो चालू सीजन में लगभग 30 प्रतिशत (54.87 लाख हेक्टेयर) क्षेत्र में बुआई कम हुई है। सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में कर्नाटक, तेलंगाना, महाराष्ट्र व पंजाब हैं। खरीफ सीजन की प्रमुख फसल धान है और जून में होने वाली बारिश धान के लिए काफी महत्व रखती है, परंतु इस सीजन में धान उत्पादक राज्यों में बारिश न होने के कारण धान का रकबा कम हुआ है। चालू सीजन में धान की 10.767 लाख हेक्टेयर में बुआई हुई है, जबकि 2021 में 36.02 लाख हेक्टेयर में बुआई हो चुकी थी। यहां तक कि पिछले साल में भी मानसून में देरी होने के बावजूद 16.456 लाख हेक्टेयर में धान की बुआई हो चुकी थी।
इधर, खरीफ की बुआई का रकबा मुख्य तौर पर धान, दलहन (विशेषकर अरहर और उड़द) की बुआई में कमी के कारण घटा है। पिछले महीने के दूसरे पखवाड़े से मानसून में अच्छी प्रगति दिख रही है, जिस कारण उम्मीद है कि आगे बारिश में तेजी के साथ ही बुआई में कमी की काफी हद तक भरपाई हो जाएगी। यह भी कहा जा रहा है कि सही समय पर बुआई हो गई तो पैदावार में ज्यादा गिरावट नहीं दिखेगी। देश में करीब 10.1 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर खरीफ फसलें बोई जाती हैं। इसमें से करीब 3.534 करोड़ हेक्टेयर में बुआई पूरी हो चुकी है, इसलिए अगस्त के बाकी हफ्तों में बारिश बेहद जरूरी है। अरहर जैसी कुछ फसलों की पैदावार में गिरावट की आशंका का असर बाजार में पहले ही दिखने लगा है। तमाम कोशिशों के बाद भी इनकी कीमतों में कोई खास कमी नहीं हो पा रही है। इससे खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के प्रयासों को झटका लग सकता है, क्योंकि अरहर रोजमर्रा के भोजन में इस्तेमाल होती है।
किसानों ने इस बार 36.1 मिलियन हेक्टेयर में चावल की बुआई की है, जो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 4.3 प्रतिशत अधिक है। इस बार किसानों ने 36.1 मिलियन हेक्टेयर (89.2 मिलियन एकड़) में चावल लगाया है, जो पिछले साल की समान अवधि से 4.3 प्रतिशत अधिक है। भारत चावल उत्पादन के क्षेत्र में दुनिया का सबसे ज्यादा बड़े अनाज उत्पादक में आता है। पिछले महीने सरकार ने अपने सबसे बड़े चावल निर्यात श्रेणी को रोकने का आदेश दिया था। इस फैसले के बाद से दुनिया के सबसे बड़े अनाज निर्यात द्वारा शिपमेंट लगभग आधा हो जाएगा। इस बार अनुमान लगाया जा रहा है कि फसल की पैदावार पिछले साल के मुकाबले ज्यादा कीमत में बाजारों में बिकेगी। कृषि मंत्रालय का कहना है कि इस बार किसानों को कम कीमत पर अपनी फसल बेचने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा। अगर ऐसा होता है तो कम पैदावार के बावजूद इस मानसून को देश के किसानों के लिए शुभ कहा जा सकता है।