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बॉर्डर टूरिज्म- जहां गोलियां गूंजती थीं, वहां सैलानियों का सैलाब
केरन/श्रीनगर . बॉर्डर वाले इलाकों में पर्यटन शुरू होने से स्थानीय लोगों में उम्मीद जागी है। भास्कर टीम ने नीलम वैली के पास सीमा के अंतिम गांव केरन पहुंचकर हालात देखे।
77 साल के बुजुर्ग किशनगंगा नदी के दूसरी ओर टकटकी लगाकर देख रहे हैं। जहां वो खड़े हैं, वहां से 80-100 मीटर दूरी पर पीओके की नीलम वैली है... हमारे देश का मुकुट।
नदी के इस ओर केरन गांव है। श्रीनगर से 165 किमी दूर। उत्तरी कश्मीर के इस क्षेत्र में जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने बीते साल बॉर्डर टूरिज्म शुरू किया।
केरन गांव ने दुश्मनों की गोलियां झेलीं, यहां हर घर में बंकर
यहां से करीब 130 किमी दूर बालाकोट है, जहां भारतीय सेना ने एयर स्ट्राइक कर आतंकी कैंप ध्वस्त किए थे। केरन गांव ने दुश्मनों की गोलियां झेली हैं। हर घर में बंकर है। दो साल पहले सेना ने कम्युनिटी बंकर बनाया, पर कभी इस्तेमाल नहीं हुआ। गांव में करीब 200 परिवार हैं। हर घर का कोई न कोई पीओके में है।
बुजुर्ग अशरफ मीर कहते हैं,‘1986-87 में आतंक का दौर शुरू हुआ और पाकिस्तान से आतंकी हमारे गांवों में घुस आए। गांववाले उनके बहकावे में आकर उस पार चले गए। उन्हें रोकने की काफी कोशिशें कीं, पर संगीनों के साए में किसकी चलती है। करीब हजार लोग गए होंगे।
वो चोटी की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं, ‘ऊपर 10 हजार की आबादी वाला भुगना गांव था, पूरा गांव बहकावे में चला गया। आज वहां सेना के अलावा कोई नहीं है। सारे घर खाली पड़े हैं।
शाकिर भट्ट कहते हैं पाक की तरफ रईस लोगों ने होटल और गेस्ट हाउस बना लिए हैं। अब पाक बांध के जरिए पानी का बहाव केरन की ओर कर रहा है और हमारी जमीनों को बहा रहा है।
नदी के किनारे पर टेंट- वीकेंड में भीड़, पोस्ट ऑफिस में सोना पड़ता है पर्यटकों को
केरन में ही देश का पहला पोस्ट ऑफिस भी है। पोस्टमास्टर शाकिर हुसैन भट्ट बताते हैं,‘पर्यटन शुरू होने से बदलाव आया है। वीकेंड पर जगह नहीं बचती है, तो लोग पोस्ट ऑफिस में भी सो जाते हैं।’ भट्ट कहते हैं कि हर महीने करीब 100 लोग शुभचिंतकों को चिट्ठियां भेजते हैं। भगवान इस जगह को अमन-चैन दें। चार साल की शांति के बाद हम सुकून की नींद ले पा रहे हैं, अब महसूस हो रहा है कि जन्नत कैसी होती है।
2 साल पहले बाकी देश से कटा था, बाहर वाले नहीं जा सकते थे
दो साल पहले तक यह क्षेत्र बाकी देश से कटा रहता था। बाहर के लोगों को मंजूरी नहीं थी। अब जरीदा लोन को उम्मीद है कि पर्यटन से तस्वीर बदलेगी। लोग इन दिनों हिसाब लगा रहे हैं कि नए होम स्टे, होटल और टेंट सिटी कैसे शुरू करें। लोन ने अपना घर होम स्टे में बदल दिया है। घर की महिलाएं किचन संभालती हैं।
उन्होंने बताया कि वीकेंड में इतने सैलानी आते हैं कि बमुश्किल व्यवस्था कर पाते हैं। बीते वीकेंड में हमारे घर 26 मेहमान थे। घरों में जगह नहीं मिली, तो लोग मस्जिदों में रुक गए।’
नीलम वैली में 200 घरों में होम स्टे
गांववाले बताते हैं,‘200 घरों में होम स्टे सुविधा है। हर घर में औसत 16 लोगों की क्षमता है। 150 से ज्यादा टेंट भी हैं। ठंड और वसंत में यहां की खूबसूरती अतुलनीय होती है। पाइन ट्री से लकदक पहाड़ियां सफेद चादर में लिपट जाती हैं, नदी का पानी नीला दिखता है। इसलिए इसे नीलम वैली कहते हैं।
इन दिनों नदी के दोनों तरफ भारत-पाक के सैलानी घूमने आते हैं। सीटी बजाते हैं और शोर मचाकर खुशी जताते हैं। डांस करते हैं। वी लव यू... वी लव यू और ऑल इज वेल के नारे लगते हैं। ज्यादातर टूरिस्ट सामान लेकर आते हैं और नदी के किनारे खाना पकाते हैं।
बॉर्डर टूरिज्म के लिए मंजूरी जरूरी
केरन जैसे क्षेत्र कुपवाड़ा के डीसी ऑफिस से मूंजरी लेनी पड़ती है। ऑनलाइन भी मंजूरी मिलती है। मंजूरी मिलने पर 8 फॉर्म मिलते हैं, जो एक-एक कर सात चेकपोस्ट पर जमा करने होते हैं, गांव की चौकी पर पर्यटकों के आई कार्ड भी जमा कर लिए जाते हैं। लौटते वक्त चेकिंग के बाद इन्हें लौटा दिया जाता है।
95 घरों से लोग सेना और पुलिस में
ग्रामीणों ने बताया कि यह पूरा गांव सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलता है। हम लोग अपने घोड़ों पर राशन-पानी लेकर पोस्ट पर जाते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि यहां 95 घरों में लोग सरकारी मुलाजिम हैं, इनमें ज्यादातर लोग सेना और पुलिस में हैं।
70% स्थानीय पर्यटक
गांव में अब तक इंटरनेट नहीं पहुंचा है। कुछ ऊंचाई वाले इलाकों में मोबाइल का सिग्नल मिलता है। यहां मोबाइल में दो घड़ियां दिखती हैं और दोनों के समय में अंतर है। एक घड़ी भारत की है और दूसरी पाक की। इस वजह से गांव के लोगों और यहां आने वाले पर्यटक टाइम को लेकर कंफ्यूज हो जाते हैं।
गांव के सईद लोन बताते हैं कि एक साल पहले तक पाकिस्तान के वाईफाई के सिग्नल मिलते थे, तो पूरा गांव इस्तेमाल करता था, पर बाद में नेटवर्क मिलना बंद हो गया। हालांकि वो कहते हैं कि यह सब पाकिस्तान की यहां के नंबर को ट्रैक करने की चाल भी हो सकती है, क्योंकि इतने बड़े एरिया में वाई फाई नेटवर्क कैसे पहुंच सकता है।
होम स्टे और गांव की एकमात्र इलेक्ट्रॉनिक की दुकान चलाने वाले सईद लोन कहते हैं कि केरन देश की नाक है। पहले की सरकारों ने बॉर्डर इलाकों को प्राथमिकता में नहीं रखा, पर अब प्रशासन ने बॉर्डर इलाकों को सबसे ऊपर रखा है। अमन रहता है तो बड़ा बदलाव आएगा। अभी यहां पर आने वाले टूरिस्ट 70% स्थानीय, तो 30% दूसरे राज्यों से हैं।