पर्यावरण और मानव समाज के लिए खतरा है-बॉयोमेडिकल वेस्ट
आज धरती का वातावरण विभिन्न अपशिष्टों के कारण बहुत ही प्रदूषित हो गया है। इन अपशिष्टों से धरती पर प्रदूषण की मात्रा लगातार बढ़ी है और प्रदूषण ने इस धरती पर अनेक प्रकार की बीमारियों व रोगों को जन्म दिया है। जैव-चिकित्सीय अपशिष्टों की प्रदूषण और बीमारियों व रोगों को जन्म देने में महत्वपूर्ण भूमिका है।
मेडिकल कचरे का निस्तारण आज जैसा कि आज पहले की तुलना में बीमारियों की भरमार है,अपने आप में एक बहुत बड़ी व विकट समस्या है। आज विभिन्न अस्पतालों से निकलने वाले कचरे को खुले में फेंकने से अनेक प्रकार की बीमारियों के फैलने का खतरा हमेशा बना रहता है और आए दिन हम अखबारों, मीडिया के हवाले से यह खबरें देखते,पढ़ते व सुनते हैं कि मेडिकल अपशिष्ट के निस्तारण के बिना ही बहुत से अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों आदि को आज संचालित किया जा रहा है। आज विभिन्न अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों से देश में कई टन मेडिकल कचरा पैदा होता है। इसमें क्रमशः संक्रामक, पैथोलोजिकल, शॉर्प, रासायनिक, फॉर्मास्युटिकल, साइटोटॉक्सिक, रेडियोधर्मी व सामान्य कचरा शामिल है। इस मेडिकल कचरे का निस्तारण, प्रबंधन ऐसे दौर में अति आवश्यक हो जाता है जब संपूर्ण विश्व महामारी व वायरसों के बीच जी रहा हो। एक रिपोर्ट बताती है कि कोविड महामारी की पहली लहर के दौरान भारत में हर रोज 710 टन मेडिकल कचरा पैदा हो रहा था, जिसका करीबन 17(सत्रह) फीसदी हिस्सा कोविड-19(कोविड महामारी) से जुड़ा कचरा था। यह तो आंकड़़ा मात्र है, वस्तुस्थिति इससे और भी ज्यादा हो सकती है। यह बहुत ही गंभीर व संवेदनशील है कि आज दुनिया में करीब एक तिहाई अस्पताल, स्वास्थ्य केंद्र और स्वास्थ्य सुविधाएं देने वाले विभिन्न संस्थान अपने मेडिकल वेस्ट का सुरक्षित तरीके से प्रबंधन/निस्तारण नहीं कर पा रहे हैं। वहीं पिछड़े देशों में करीब 60 फीसदी स्वास्थ्य सुविधाएं अपने मेडिकल कचरे का उचित प्रबंधन करने में असमर्थ हैं। यह कचरा न केवल स्वास्थ्य बल्कि पर्यावरण के लिए भी बड़ा खतरा है।आज संपूर्ण दुनिया कोरोना वायरस का वार झेल चुकी है और वर्तमान में भी यह दुनिया संक्रामक वायरसों, बीमारियों का वार लगातार झेल रही है। वायरस का सामना कर रही इस दुनिया में मेडिकल कचरा प्रबंधन आज की नितांत आवश्यकता है। आज वातावरण में विभिन्न प्रकार के प्रदूषणों की मात्रा लगातार बढ़ती चली जा रही है और यही कारण है इसी प्रदूषण से मानव अनेक बीमारियों, रोगों महामारियों की चपेट में आ रहा है। प्रदूषण के कारण मानव की इम्यूनिटी पर भी प्रभाव पड़े हैं। समय के साथ आज लोगों की इम्यूनिटी में आमूल चूल परिवर्तन आ गये हैं।दरअसल, महामारी(कोविड-19) के दौर में फेस मास्क, दस्ताने, पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (पीपीई), इंजेक्शन और विभिन्न दवाओं की मांग काफी बढ़ गई है।वास्तव में इन दवाओं, इंजेक्शन आदि बढ़ते इस्तेमाल से जो कचरा पैदा हो रहा है उसका उचित प्रबंधन न करने से नई समस्याएं पैदा हो गई हैं। विभिन्न परीक्षण किटों के इस्तेमाल से हजारों टन मेडिकल कचरा पैदा होता है। इतना ही नहीं सीरिंज, सुई, विभिन्न मेडिकल सिक्योरिटी बॉक्स आदि से भी बहुत अधिक मात्रा में मेडिकल कचरा पैदा होता है।जर्नल पनास में प्रकाशित एक अन्य शोध से पता चला है कि वैश्विक स्तर पर कोविड-19 महामारी से जुड़ा करीब 80 लाख टन प्लास्टिक कचरा पैदा हुआ था जिसमें से 25,000 टन समुद्रों में समा चुका है। इनमें से ज्यादातर प्लास्टिक वो मेडिकल वेस्ट है जिसका इस्तेमाल अस्पतालों और लोगों द्वारा महामारी से बचाव के लिए किया गया था। बहरहाल, देश में जैविक कचरे का निस्तारण अपने आप में एक बड़ी समस्या बनता चला जा रहा है। जैविक कचरे के निस्तारण में सुस्ती से संक्रमण का भय हर समय बना रहता है। आज विभिन्न शहरों में मेडिकल बॉयोवेस्ट का सही ढंग से निस्तारण नहीं हो पा रहा है और इससे लोगों में रेडिएशन और संक्रमण का खतरा पैदा होने के चांस हमेशा बने रहते हैं। आज बड़े शहरों में अस्पतालों से बहुत सा मेडिकल बॉयोवेस्ट निकलता है। बहुत बार मीडिया के हवाले से यह खबरें आतीं हैं कि फलां फलां शहर में अस्पताल से निकलने वाले कचरे को जमीन के अंदर अस्थाई तौर पर नहीं दबाया गया और न ही निधार्रित समय सीमा में इस कचरे का निस्तारण ही किया गया। इस मेडिकल बॉयोवेस्ट से निश्चित ही रेडिएशन का प्रभाव आसपास की आबादी पर पड़ता है और स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे उत्पन्न हो जाते हैं। वास्तव में इस प्रकार के मेडिकल बॉयोवेस्ट को विभिन्न वैज्ञानिक तरीकों से निस्तारण किया जाना चाहिए, क्यों कि एक प्रकार से आज हम वायरस युग में ही जी रहे हैं। आज बड़े बड़े शहरों, कस्बों के निजी अस्पतालों, नर्सिंग होम,डिस्पेंसरी, स्वास्थ्य केंद्रों एवं क्लीनिकों से रोजाना बहुत सी मात्रा में मेडिकल बॉयोवेस्ट निकलता है, लेकिन अस्पतालों से निकलने वाले इस बायोवेस्ट के निस्तारण के उचित प्रबंध नहीं हैं। इस बायो वेस्ट मेडिकल में अक्सर पट्टियां, सीरिंज, खाली बोतलें, टिश्यू, खाली इंजेक्शन कांच की शिशियां आदि मेडिकल कचरे का ढेर सड़क के किनारे खुले में ही फेंक दिये जाते हैं। बायोवेस्ट के निस्तारण के निर्धारित प्रोटोकाल का पालन भी विभिन्न अस्पतालों की ओर से नहीं किया जाता है। अक्सर देखा जाता है कि इन निजी अस्पतालों एवं क्लीनिकों के आसपास में खुले में बिखरे बायो वेस्ट कचरे के ढेर में सुअर, गाय,कुत्ते जैसे आवारा जानवरों का जमावड़ा लगा रहता है। बायोवेस्ट के ढेर में मुंह मारते पशु अक्सर बायोवेस्ट कचरा इधर-उधर वातावरण में फैला देते हैं। इस कारण पास से गुजरने वाले आमजन को काफी तकलीफ उठानी पड़ती है। सबसे ज्यादा खतरा कचरे से विभिन्न सामान बीनने वाले बच्चों को होता है। वे कभी भी गंभीर बीमारियों का शिकार हो सकते हैं और संक्रमण अन्यत्र भी फैला सकते हैं। दरअसल, वर्तमान में भी कोरोना काल पूरी तरह से गया नहीं है और वर्तमान में तो इन्फ्लूएंजा का संक्रमण भी लोगों को हो रहा है, जैसा कि कुछ केस आए हैं, ऐसे में यदि हम मेडिकल बॉयोवेस्ट सामान्य कूड़े-करकट के ढ़ेर में अथवा खुले में बिना निस्तारण किए, छोड़ेंगे तो हमें संक्रमण के खतरों का सामना करना पड़ सकता है। कोरोना काल में हमने देखा कि अस्पतालों से पीपीई किट, पीपीई कवर, मास्क, गल्ब्स, सिरिंज, वॉइल समेत जो भी तमाम मेडिकल बायो वेस्ट निकला उसमें कोताही बरतने के कारण बहुत से लोगों को अनेक स्थानों पर अपनी जान तक गंवानी पड़ी थी। बायोमेडिकल कचरे में औषधीय, रोगयुक्त, रेडियोधर्मी व विभिन्न रासायनिक पदार्थ शामिल होते हैं। ये संक्रामक और अत्यंत खतरनाक होते हैं। इन अपशिष्टों में संभावित रूप से हानिकारक सूक्ष्मजीव होते हैं जो अस्पताल के रोगियों, स्वास्थ्य कर्मियों और आम जनता को संक्रमित कर सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार स्वास्थ्य देखभाल गतिविधियों द्वारा उत्पन्न कचरे की कुल मात्रा में से, लगभग 85% घरेलू कचरे की तुलना में सामान्य, गैर-खतरनाक कचरा है। शेष 15% खतरनाक पदार्थ माना जाता है जो संक्रामक, रासायनिक या रेडियोधर्मी हो सकता है। हर साल दुनिया भर में अनुमानित 16 बिलियन इंजेक्शन लगाए जाते हैं, लेकिन यह गंभीर व संवेदनशील है कि सभी सुइयों और सीरिंज का उचित तरीके से निपटान नहीं किया जाता है। स्वास्थ्य देखभाल के कचरे को खुले में जलाने और जलाने से, कुछ परिस्थितियों में, डाइऑक्सिन, फ्यूरान और कणिकीय पदार्थ का उत्सर्जन हो सकता है। वास्तव में अस्पताल, स्वास्थ्य सुविधा केंद्र, विभिन्न प्रयोगशालाएं, स्वास्थ्य अनुसंधान केंद्र, मुर्दाघर, शव परीक्षण केंद्र, पशु अनुसंधान और परीक्षण लैब्स, ब्लड बैंक व संग्रह सेवा केंद्र, नर्सिंग होम आदि मेडिकल अपशिष्टों के प्रमुख स्त्रोत हैं। उच्च
आय वाले देश प्रति अस्पताल बिस्तर प्रति दिन औसतन 0.5 किलोग्राम खतरनाक अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं; जबकि कम आय वाले देश औसतन 0.2 किलोग्राम उत्पादन करते हैं। भारत सरकार ने बॉयोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट एंड हैंडलिंग रूल्स- 1998 पारित किया है जो कि उन सभी लोगों पर लागू होता है जो ऐसे बायो-मेडिकल कचरे को इकठ्ठा करने , उसे उत्पन्न करने, प्राप्त करने में, ट्रांसपोर्ट , डिस्पोज करते हैं या उनसे सम्बंधित विभिन्न प्रकार की डील करते हैं। यह नियम सभी अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लीनिक, डिस्पेंसरी, पशु संस्थान, पैथोलोजिकल लैब और ब्लड बैंक पर लागू होता है। इन सभी के पास बायो मेडिकल वेस्ट / मेडिकल कचरे को ट्रीट करने के लिए अपने संस्थानों में विभिन्न प्रकार की मशीनें, और आधुनिक उपकरण आवश्यक रूप से होने चाहिए। इसके निराकरण के लिए उनके पास उचित व्यवस्था का सर्टिफिकेट होना चाहिए। यदि किसी के पास यह सर्टिफिकेट नहीं पाया जाता है तो हॉस्पिटल का रजिस्ट्रेशन रद्द किया जा सकता है और उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। वास्तव में बॉयोमेडिकल वेस्ट भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व की एक बहुत बड़ी समस्या है। आज पहले जैसा खानपान नहीं रहा और पहले जैसा स्वास्थयवर्धक खानपान न होने की वजह से नई नई बीमारियों का जन्म हो रहा है। हरेक प्रकार के खाद्य पदार्थों में आज मिलावट का जहर देखने को मिल रहा है और यही कारण है कि लोग बीमारियों से लगातार ग्रसित हो रहे हैं। चूंकि बीमारियों से ग्रसित लोगों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है, इसलिए बॉयोमेडिकल वेस्ट भी ज्यादा उत्पन्न हो रहा है लेकिन उसका ठीक से निस्तारण व प्रबंधन नहीं हो पा रहा है। संक्षेप में कहें तो, और यदि हम यहाँ आंकड़ों की बात करें तो भारत में अनुमानित प्रति बेड प्रति अस्पताल में 1-2 किलोग्राम और हर क्लिनिक पर 600 ग्राम प्रतिदिन मेडिकल वेस्ट / मेडिकल कूड़ा पाया जाता है। अतः बॉयोमेडिकल वेस्ट के बारे में यह कहना गलत नहीं होगा कि बॉयोमेडिकल वेस्ट न केवल स्वास्थ्य की देखभाल करने वाले स्वास्थयकर्मियों, चिकित्सकों,रोगियों को ही नहीं अपितु संपूर्ण मानव समाज के साथ ही पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले जोखिमों को भी उजागर करता है। डब्ल्यू एच ओ का इस संबंध में यह कहना है कि यह आवश्यक है कि सभी चिकित्सा अपशिष्ट पदार्थों को उत्पादन के बिंदु पर अलग किया जाए, उचित उपचार किया जाए और सुरक्षित रूप से निपटाया जाए।
-सुनील कुमार महला