राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा का चुनावी चक्रव्यूह
कर्नाटक में बुरी तरह हारने के बाद भाजपा अब फूंक फूंक कर कदम रख रही है। इस वर्ष के आखिरी महीने में
राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव होने है। 2018 के विधानसभा चुनाव में हिंदी
पट्टी के इन तीनों राज्यों में कांग्रेस ने अपना कब्ज़ा जमा लिया था। बाद में मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेता
ज्योतिरादित्य सिंध्या को तोड़ कर भाजपा अपना शासन कायम करने में सफल हो गयी थी। राजस्थान में
भी मध्य प्रदेश को दोहराया जा रहता था मगर ऐनवक्त पर आधा दर्जन विधायक वापस गहलोत खेमे से जा
मिले जिससे यहाँ ऑपरेशन लोटस फेल हो गया।
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व और खुद प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी तीनों राज्यों पर पैनी नजर रखे हुए है। मोदी जानते
है इन तीनों राज्यों को हासिल कर 2024 का लोकसभा चुनाव जीता जा सकता है। हाल ही राजस्थान के
अजमेर में एक लक्खी रैली कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी शंखनाद कर चुके है। मोदी ने अपनी
सरकार के नौ साल पूरे होने के मौके पर अजमेर से राजस्थान में विधानसभा चुनाव का बिगुल
फूंका। भाजपा इस रैली में जुटी भीड़ से बल्ले बल्ले है। मगर राजस्थान की परेशानी गुटों में बंटी भाजपा है।
इस मरू प्रदेश में मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ने की रणनीति है। यहाँ आधा दर्जन नेता मुख्यमंत्री की दौड़
में है। इनमें पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सहित राजेंद्र राठौड़, केंद्रीय मंत्री गजेन्द्रसिंह और अर्जुन मेघवाल,
सतीश पूनिया आदि नेता शामिल है। इसके अलावा सांसद किरोड़ी मीणा आंदोलनकारी नेता की पहचान
बनाये हुए है। हालाँकि पूर्व मंत्री घनश्याम तिवाड़ी को भाजपा में फिर शामिल कर राज्य सभा का सदय
बनाकर भाजपा ने एक जनाधार वाले नेता को साध चुकी है। इस समय राजस्थान की जो स्थिति है उसमें
वसुंधरा राजे को नज़रअंदाज कर चुनावी वैतरणी पार करना भाजपा के लिए मुश्किल भरा है। 2019 में
राजस्थान भाजपा की कमान सतीश पूनिया के हाथ में दिए जाने के बाद से वसुंधरा राजे साइडलाइन नजर
आ रही थीं। यहां तक की भाजपा के बैनर, होर्डिंग और पोस्टर में भी वो सिर्फ यदा कदा ही दिखती थीं। इस
साल दौसा, नाथद्वारा और भीलवाड़ा में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यक्रम किया, लेकिन राजे कहीं नजर
नहीं आईं। अचानक अजमेर में राजे का दिख जाना राजनीति का केंद्र बन गया। दरअसल राजस्थान में
राजे के करिश्माई नेतृत्व से इंकार नहीं किया जा सकता। मोदी भी जानते है स्थानीय क्षत्रपों को आगे कर ही
प्रदेश में चुनावी पताका फहराई जा सकती है अन्यथा कर्नाटक की हार दोहराई जा सकती है। इसके लिए
जरुरी है की वसुंधरा, राजेंद्र राठौड़, गजेंद्र सिंह शेखावत, सतीश पूनिया, किरोड़ी मीणा और घनश्याम
तिवाड़ी को एक जाजम पर बैठाकर चुनावी शंखनाद किया जाये। इसके अलावा आरएलपी के सांसद हनुमान
बेनीवाल जो पिछला चुनाव भाजपा के सहयोग से जीता था उन्हें फिर एनडीए में शामिल कर जाट मतों को
लुभाया जा सकता है।
राजस्थान के बाद सबसे ज्यादा चर्चा मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर है, यहां भाजपा सत्ता में
काबिज है और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं। मगर इस बार ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि यहां
भाजपा किसी दूसरे चेहरे पर दांव लगा सकती है। यहां शिवराज सिंह चौहान के बाद केंद्रीय मंत्री
ज्योतिरादित्य सिंधिया का सबसे बड़ा नाम हैं जिनका ग्वालियर संभाग सहित अनेक जिलों में दबदबा है।
इसके अलावा गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा, नगरीय प्रशासन मंत्री भूपेंद्र सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती का नाम
भी चर्चा में है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने साफ़ साफ़ कहा है कि भाजपा का चेहरा
शिवराज सिंह चौहान ही होंगे। स्वच्छ छवि के नेता चौहान अब तक चार बार प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
उनकी मतदाताओं पर अच्छी पकड़ है।
छत्तीसगढ़ में भाजपा की बुरी पराजय के लिए कुछ लोग पूर्व मुखयमंत्री रमन सिंह को जिम्मेदार मान रहे है।
रमन सिंह भाजपा के कद्दावर नेता माने जाते हैं, वह तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं, लेकिन पिछली बार
यहां भाजपा को मिली शिकस्त के बाद से राज्य के भावी चेहरे को लेकर बहस छिड़ी है। यहां से आदिवासी
चेहरा नंदकुमार राय, बृजमोहन अग्रवाल, ओपी चौधरी और सरोज पांडे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं, लेकिन
सबसे आगे नाम रमन सिंह का नाम ही है।
प्रधान मंत्री मोदी यह अच्छी तरह जानते है की हिंदी पट्टी के इन तीन राज्यों से होकर लोकसभा का रास्ता
जाता है। मध्य पदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में लोकसभा की 65 सीटों है। तीनों राज्यों के चुनाव
जीतकर लोकसभा के अगले चुनाव में भाजपा अपनी स्थिति मज़बूत बना सकती है। ऐसे में जरुरी है की
कर्नाटक से सबक लेकर इन तीनों प्रदेशों के क्षत्रपों को विश्वास में लिया जाएं। इसकेलिए मोदी को साम,
दाम और दंड, भेद की नीति अपनानी होंगी तभी क्षत्रपों पर कब्ज़ा किया जा सकेगा।
-बाल मुकुन्द ओझा