तार तार इंडि गठबंधन और एकजुट एनडीए
-बाल मुकुन्द ओझा
कांग्रेस के नेता राहुल गांधी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी पर ताबड़तोड़ हमले कर अगले साल होने जा रहे यूपी विधान सभा चुनाव सहित पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में अपनी पार्टी और इंडि गठबंधन को धार देने का भरसक प्रयास कर रहे है। राहुल अपनी पार्टी को जितना मज़बूत बनाने का प्रयास कर रहे है वहीं गठबंधन के जहाज में हो रहे छेदों से भी इंकार नहीं किया जा सकता। बंगाल, तमिलनाडु और केरलम चुनावों के बाद दिखावे के लिए विपक्ष की एकता के गीत अवश्य गाये जा रहे है मगर असल में इंडि गठबंधन में दरार चौड़ी होती जा रही है। राहुल ने हाल ही मोदी और अमित शाह को गद्दार घोषित कर अपनी आक्रामकता का परिचय दिया है। मगर उनके इंडि गठबंधन के साथी उनसे दूरी बना रहे है। तमिलनाडु में डीएमके पहले ही कांग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाकर अपनी पार्टी का रूख साफ़ कर चुकी है। कांग्रेस से डीएमके की दोस्ती टूट जाने पर भाजपा ने डीएमके के साथ हाथ मिलाने की रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। केरल में वामपंथी पार्टियां कांग्रेस से पराजित होकर अलग थलग पड़ गई है। बंगाल के कम्युनिष्ट नेता खुल्लमखुला राहुल गाँधी की आलोचना कर रहे है। सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता मो सलीम ने ममता की पहचान 'अपराधी और लुटेरी' तक बता दी है। अपने केंद्रीय नेतृत्व के विपरीत बंगाल कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने भी ममता की आलोचना की। रही सही कसर एनसीपी नेता शरद पवार ने प्रधान मंत्री मोदी की सराहना कर पूरी कर दी है। अपनी करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस की सर्वेसर्वा ममता बनर्जी ने अवश्य इंडि गठबंधन के साथ रहने का एलान किया है। मगर बंगाल कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के नेता इससे सहमत नहीं है। समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव भी कांग्रेस को भाव देने को तैयार नहीं है। उन्होंने यूपी की सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने के संकेत दे दिए है। इससे कांग्रेस की मुश्किल बढ़ती जा रही है। कांग्रेस ने मायावती की पार्टी बसपा को अपने साथ लेने का प्रयास किया मगर मायावती ने कांग्रेस से मिलने तक से मना कर दिया। देश के सबसे बड़े प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने में 10 महीने से भी कम समय बचा है। ऐसे में कांग्रेस पार्टी और उनके नेता राहुल गांधी की सक्रियता सबका ध्यान खींच रही है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राहुल गांधी के इशारे पर कांग्रेस पूरे यूपी में ओबीसी और ईबीसी वोटों को अपने साथ जो जोड़ने के प्रयास में जुटी है। कांग्रेस द्वारा मायावती का दरवाजा खटखटाने से आखिलेश नाराज बताये जा रहे है। कांग्रेस नीत इंडि गठबंधन खाली हाथ है। वहीँ भाजपा नीत एनडीए एकजूट है। लगता है इंडि गठबंधन को मजबूत बनाकर भाजपा के खिलाफ संघर्ष का विपक्ष का यह प्रयास ख्याली पुलाव से अधिक साबित होने वाला नहीं है।
सच तो यह है एनडीए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मिलजुलकर मुकाबला करने के लिए बनाये गए इंडि गठबंधन में शामिल दलों का आपसी मतभेद समय के साथ और भी बढ़ता जा रहा है। संसद के बजट सत्र में कुछ मुद्दों पर एका दिखाने के बाद गठबंधन में शामिल पार्टियों ने अपनी अपनी डफली और अपना अपना राग अलापना शुरू कर दिया है।
इंडि गठबंधन में शामिल दल लाख दावा करे मगर सच तो यही है कि एकता अब तार तार हो गई है। इससे पूर्व ममता बनर्जी ने इंडि नेतृत्व पर सवाल उठाये तो लालू यादव सरीखों ने ममता को नेतृत्व सौंपने की वकालत की थी। संसद के शीतकालीन सत्र की शुरुआत से ही कांग्रेस अडानी मुद्दे पर काफी आक्रामक रही। विपक्ष के सांसदों ने इस मुद्दे पर संसद भवन परिसर में विरोध-प्रदर्शन भी किया लेकिन एसपी और टीएमसी के सांसद इस प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए। इसी भांति महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में करारी हार होने के बाद कांग्रेस ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम पर सवाल उठाए थे। इंडिया गठबंधन के सदस्य और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस के इस रुख की आलोचना की है। उन्होंने कहा कि अगर आप ईवीएम के जरिए जीत मिलने पर जश्न मनाते हैं तो कुछ महीनों बाद चुनाव में हारने पर ईवीएम को खारिज नहीं कर सकते हैं। इसी तरह अडानी के मुद्दे पर शरद पवार की एनसीपी और अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का रुख कांग्रेस से अलग देखा गया। संभल के सवाल पर कांग्रेस और अखिलेश अलग अलग खड़े दिखाई दिए। इसी बीच राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि, इंडिया गठबंधन बनने के दौरान यह तय हो गया था कि यह गठबंधन केवल लोकसभा चुनाव के लिए है, विधानसभा चुनाव के लिए यह गठबंधन नहीं है।