Dark Mode
एआई का दुरुपयोग नहीं सदुपयोग हो

एआई का दुरुपयोग नहीं सदुपयोग हो

-अशोक बैद
आज एआई का जमाना है और मानव जीवन में दिन प्रतिदिन इसका उपयोग बढ़ता जा रहा है पर देखने में आ रहा है कुछ लोग इसका सदुपयोग की जगह दुरुपयोग ज्यादा करने लगे हैं जिससे एआई वरदान की जगह अभिशाप बनता जा रहा है। लोग एआई का दुरुपयोग कर मनगढ़ंत, झूठी, भ्रामक बातें फैलाने लगे हैं। फोटो, वीडियो तो गलत बना ही रहे हैं, फेक न्यूज़ भी चला रहे हैं पर अब तो इतिहास के साथ भी छेड़छाड़ करने लगे हैं। चाहे फेक न्यूज़ चलाना हो या इतिहास के साथ छेड़छाड़ करना, ग़लत है और इसके विरुद्ध कठोर कानून और सख्त कार्रवाई की जरूरत है। आज जरूरत केवल नई तकनीक विकसित करने की नहीं बल्कि उसके नैतिक और सुरक्षित उपयोग को सुनिश्चित करने की भी है। विज्ञान और तकनीक तभी वरदान बन सकते हैं जब उनके साथ जिम्मेदारी, नियंत्रण और मानव की सकारात्मक सोच जुड़ी हो। जब मानव की सोच ही विकृत, तथ्यों के साथ छेड़छाड़, तोड़-मरोड़ करने की हो तो फिर कानून जरूरी हो जाता है।

सोशल मीडिया पर गत पांच-सात दिनों से पैदल चलने, बैलगाड़ी चलाने के लाइसेंस, होटल में खाना खाने के बिल, किसी सामान को खरीदने के बिल की पोस्टें खूब वायरल हो रही हैं। पैदल चलने का लाइसेंस बीकानेर से संबंधित बताया जा रहा है। बनाने वाले व्यक्ति ने एआई का उपयोग तो कर लिया मगर स्वयं को और एआई दोनों को मंदबुद्धि साबित कर रहा है। नकल में भी अक्ल की जरूरत होती है जो शायद इस व्यक्ति के पास नहीं थी। उसे पता होना चाहिए एआई वही बताता है जो हम उससे पूछने की कोशिश करते हैं और जो सूचना हम उसे देते हैं उसे ही एआई प्रस्तुत करता है। एआई अक्सर हमारे कहने का अर्थ गलत समझा लेता है जिससे मूर्खतापूर्ण गलतियां होती हैं। यह वही बताएगा जो इंटरनेट पर पहले से भरा हुआ है। एआई मनुष्य की तरह प्राकृतिक बुद्धि वाला नहीं है बल्कि उसका नाम ही कृत्रिम बुद्धि वाला है। कृत्रिम का अर्थ है 'मनुष्यों द्वारा बनाया गया' या 'नकली', जबकि प्राकृतिक का अर्थ है 'प्रकृति द्वारा निर्मित' या 'असली'। एआई पर पूर्ण विश्वास करना एक जटिल और जोखिम भरा कार्य है क्योंकि एआई पूरी तरह से भरोसेमंद नहीं है। एआई के बारे में चेतावनी भी जारी की जाती है कि "एआई किसी भी व्यक्तिगत, भावनात्मक या चिकित्सकीय संकट का समाधान नहीं है। ऐसे मामलों में मानव विशेषज्ञों की ही मदद लें। एआई पर विश्वास 'अंधविश्वास' नहीं बल्कि 'तार्किक विश्वास' होना चाहिए। एआई को एक टूल के रूप में प्रयोग करें और हमेशा अपनी 'मानवीय बुद्धि' को प्राथमिकता दें।" पर जब व्यक्ति के दिमाग में खुराफाती सोच हो तो फिर एआई की विश्वसनीयता पूर्णतया खतरे में पड़ जाती है। जब खुरापाती दिमाग चलता है तो फिर मानवीय बुद्धि रह ही कहां जाती है। जब किसी व्यक्ति के दिमाग में खुरापाती सोच बन जाए तो वह कुछ भी कर सकता है, अर्थ का अनर्थ कर सकता है। और फिर सोशल मीडिया पर तो भेड़ चाल की प्रवृत्ति है। आज का युवा कहलाने को तो बहुत इंटेलिजेंट है मगर जब उसकी ऐसी हरकतें देखते हैं तो उसकी बुद्धि पर तरस आता है। कोई एक पोस्ट करता है तो अन्य उसके अच्छे-बुरे, गलत-सही, सत्य-असत्य को जाने बिना बस देखा-देखी धड़ाधड़ वायरल करते जाते हैं। यही इस पैदल चलने वाले लाइसेंस वाली पोस्ट में हुआ है। हां मानता हूं राज्य की व्यवस्था में राजाओं का नियंत्रण होता था। राज्य व्यवस्था के लिए नियम कानून बने हुए थे लेकिन इस तरह कुकुरमुत्ता की तरह लाइसेंस नहीं बनते थे जिस तरह से आज सोशल मीडिया पर बाढ़ आई हुई है जो बतायें हैं कि यह तब का बना हुआ है। और बनते भी थे तो इस प्रकार के नहीं। ठाले बैठे लोग ऐसा कर रहे हैं और ठाले क्यों हैं क्योंकि अपनी इन्हीं खुरापाती हरकतों के कारण ठाले हैं। कौन काम दे इनको जो अर्थ का अनर्थ कर दे। कोरी बुद्धि से कुछ नहीं होता, बुद्धि के साथ विवेक भी चाहिए।

यदि किसी ने दिमाग लगाया होता तो इसमें कई ऐसी कमियां, खामियां दृष्टिगोचर हो रही है जो उस जमाने से मेल ही नहीं खाती पर ऐसा करने के लिए किसके पास समय है और किसके पास इतना दिमाग। यदि कागज पर छपी बातों का विश्लेषण करें तो सबसे पहले जानकारी होनी चाहिए कि बीकानेर राज्य की स्थापना 1488 ईस्वी में हुई थी जबकि इसे मार्च 1455 में बना दिखाया गया है। ऊपर संवत् लिखा हुआ है जो हिंदी गणना संख्या के अनुसार १8१२ लिखा है। हिंदी गणना में चार आठ (8) की तरह नहीं बल्कि ऐसे (४) लिखा जाता है। लाइसेंस क्रमांक लिखा है 72, जब हिंदी गणना संख्या में संवत (वर्ष) लिखा है तो फिर अंग्रेजी के अंकों में 72 कैसे लिख सकता है? उस समय अंग्रेजी माह (जनवरी-दिसंबर) नहीं लिखे जाते थे बल्कि भारतीय महीने (चैत्र-फाल्गुन) दर्ज होते थे। बीकानेर राज्य की मुहर इस प्रकार की नहीं थी। लाइसेंस शब्द ही प्रचलन में नहीं था क्योंकि तब अंग्रेजी भाषा का कोई ज्ञान नहीं था। अंग्रेजों के आने से पहले अंग्रेजी थी ही नहीं और अंग्रेज आए थे 1608 में। लिखावट शुद्ध देवनागरी लिपि में है जबकि प्राचीन बीकानेर राज्य के दस्तावेजों में लिखी लिपि देखें तो अलग ही मिलती है जिसे मुड़िया, मोडिया लिपि कहा जाता है। स्वर-व्यंजन की बनावट अलग होती थी। अ, झ, ण आदि लिखने का तरीका बिल्कुल भिन्न था। लिखने के लिए तब काली स्याही और सरकंडे की कलम का उपयोग होता था। उस जमाने में इस प्रकार के ए4 साइज का कागज भी नहीं था और ना ही इस प्रकार की प्रिंटिंग प्रेस थी जो डिजाइन बना सकती थी। कार्यभारी ने हस्ताक्षर भी अंग्रेजी में किए हैं। कागज पुराना दिखाया गया है और लिखावट चमकदार दिखाई गई है। इस प्रकार कहा जा सकता है हर चमकती हुई डिजिटल जानकारियां सही नहीं होती। इंसानी समझ, अनुभव और संवेदनाएं आज भी किसी मशीन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। और फिर सोशल मीडिया की बात करें तो यहां भरोसा बहुत कम रह जाता है।

माना कि एआई अक्सर हमारे कहने का अर्थ गलत समझ लेता है जिससे मूर्खतापूर्ण गलतियां हो जाती है मगर यहां तो लगता है जानबूझकर एआई का गलत उपयोग किया गया है। एआई के किसी टूल से जानबूझकर ऐसा बनाया गया है। कुल मिलाकर सोशल मीडिया पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनी घटिया सामग्री नकली, अविश्वसनीय और जल्दबाजी में बनाई हुई वीडियो और तस्वीरों का प्रकोप अब बेरोकटोक बढ़ता जा रहा है जिस पर लगाम लगानी बेहद जरूरी है।

Comment / Reply From

Newsletter

Subscribe to our mailing list to get the new updates!