बेजुबान पक्षी और पर्यावरण संरक्षण का अनूठा संगम
- महेन्द्र तिवारी
आज के आधुनिक युग में वैश्विक स्तर पर शहरीकरण अत्यंत तीव्र गति से बढ़ रहा है। इस प्रगति के साथ ही दुनिया भर के महानगर और शहर एक अत्यंत विकराल समस्या से जूझ रहे हैं, और वह समस्या है कचरा प्रबंधन की। हमारे शहरों की चमचमाती सड़कों, सार्वजनिक पार्कों और गलियों में बिखरा हुआ कचरा न केवल दृश्य प्रदूषण फैलाता है बल्कि पर्यावरण के लिए भी एक गंभीर संकट बन चुका है। इस कचरे में सबसे अधिक मात्रा कृत्रिम पदार्थों, खाने के पैकेटों और विशेष रूप से धूम्रपान के बाद बचे हुए सिगरेट के टुकड़ों की होती है। ये छोटे छोटे टुकड़े देखने में भले ही मामूली लगें, लेकिन इनकी संख्या और इनसे होने वाला नुकसान अत्यधिक है। नगर प्रशासनों के लिए इन सूक्ष्म अवशेषों को साफ करना एक अत्यंत जटिल और खर्चीला कार्य साबित होता है। हर साल स्थानीय निकायों और नगर निगमों को सड़कों के कोनों और नालियों में फंसे इस कचरे को हटाने के लिए अपने वित्तीय कोष का एक बहुत बड़ा हिस्सा पानी की तरह बहाना पड़ता है। करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी रहती है क्योंकि मनुष्यों की लापरवाही थामने का नाम नहीं ले रही है। इसी वैश्विक समस्या का एक अत्यंत अनोखा और नवोन्मेषी समाधान खोजने का प्रयास यूरोपीय देश स्वीडन में किया गया, जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। इस अद्भुत प्रयोग की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें सफाई के कार्य के लिए इंसानों की जगह बेजुबान पक्षियों, विशेष रूप से कौवों को प्रशिक्षित किया गया।
स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम के समीप स्थित सोडरटालिये नामक एक खूबसूरत शहर में इस क्रांतिकारी विचार को धरातल पर उतारने की शुरुआत हुई। वहां के एक नवोदित उद्यम ने पशु व्यवहार विज्ञान का उपयोग करके पर्यावरण को स्वच्छ बनाने की एक अनूठी योजना तैयार की। इस संस्थान के दूरदर्शी संस्थापक क्रिश्चियन गुंथर हैनसेन ने कई वर्ष पहले इस विषय पर गहन विचार किया था। उनका मानना था कि यदि प्रकृति में मौजूद जीवों की स्वाभाविक बुद्धिमत्ता और उनकी क्षमताओं का सही दिशा में उपयोग किया जाए, तो वे मानवीय समाज की कई बड़ी समस्याओं के समाधान में अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। अपने इसी अनूठे विचार को वास्तविकता में बदलने के लिए उन्होंने एक विशेष परियोजना की रूपरेखा तैयार की। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य शहर की सड़कों पर बिखरे धूम्रपान के अवशेषों को एकत्रित करना था। उन्होंने इस कार्य के लिए किसी यांत्रिक साधनों या मानवीय श्रम पर निर्भर रहने के बजाय आकाश में उड़ने वाले और हमारे आस पास रहने वाले कौवों को अपना सहयोगी बनाने का निर्णय लिया, जो शहरी परिवेश में बेहद आसानी से ढल जाते हैं।
इस संपूर्ण योजना को क्रियान्वित करने के लिए संस्थान द्वारा एक अत्यंत विशिष्ट स्वचालित यंत्र का निर्माण किया गया। यह उपकरण एक विशेष प्रकार की पुरस्कार प्रणाली पर आधारित था। इस यंत्र की कार्यप्रणाली को इस प्रकार से तैयार किया गया था कि जैसे ही कोई कौवा सड़क या पार्क से सिगरेट का कोई टुकड़ा अपनी चोंच में उठाकर लाता और उसे उस यंत्र के निर्धारित स्थान पर डालता, वैसे ही वह स्वचालित उपकरण सक्रिय हो जाता था। वह यंत्र तुरंत ही उस टुकड़े के बदले में कौवे के लिए खाने की कोई सामग्री, जैसे कि मूंगफली या अनाज का छोटा दाना बाहर निकाल देता था। इस प्रकार कौवों को अपनी मेहनत के बदले तुरंत स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होने लगा। धीरे धीरे कौवों ने इस पूरी प्रक्रिया के पीछे के कार्य कारण संबंध को समझ लिया। वे यह जान गए कि इस विशिष्ट यंत्र में कचरा डालने पर उन्हें अपनी भूख मिटाने के लिए भोजन प्राप्त होगा। कुछ ही समय के भीतर कौवों का व्यवहार पूरी तरह से बदल गया और वे सक्रिय रूप से सड़कों, उद्यानों, फुटपाथों और छिपे हुए कोनों से सिगरेट के अवशेषों को खोज खोज कर उस स्वचालित उपकरण में डालने लगे। यह दृश्य अत्यंत विस्मयकारी था कि पक्षी स्वेच्छा से नगर की सफाई में योगदान दे रहे थे।
वैज्ञानिकों और पक्षी विशेषज्ञों का हमेशा से यह मानना रहा है कि कौवे इस पृथ्वी पर पाए जाने वाले सबसे चतुर और बुद्धिमान पक्षियों की श्रेणी में आते हैं। उनकी मानसिक क्षमता और संज्ञानात्मक कौशल अत्यंत उच्च स्तर के होते हैं। कौवों में मनुष्यों के चेहरों को पहचानने, उन्हें याद रखने और जटिल परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार के औजारों का उपयोग करने की अद्भुत क्षमता होती है। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए विभिन्न शोधों के अनुसार, कौवों की किसी भी समस्या को समझने और उसका समाधान खोजने की तार्किक क्षमता मनुष्यों के 3 से 4 वर्ष के छोटे बच्चों के समकक्ष मानी जाती है। वे केवल देखकर और बार बार के अभ्यास से नई चीजें बहुत तेजी से सीख सकते हैं। यही मुख्य कारण था कि स्वीडन के इस अभूतपूर्व प्रयोग के लिए कौवों का चयन किया गया, क्योंकि किसी अन्य पक्षी के लिए इस प्रकार की जटिल पुरस्कार प्रणाली और कार्य के अंतर्संबंध को इतनी जल्दी सीख पाना अत्यंत कठिन होता।
इस प्रयोग की आवश्यकता और इसके आर्थिक महत्व को समझने के लिए स्वीडन के कचरा संबंधी आंकड़ों पर दृष्टि डालना आवश्यक है। स्वीडन की एक प्रमुख स्वच्छता संस्था के आधिकारिक प्रतिवेदनों के अनुसार, पूरे देश में हर साल लगभग एक बिलियन (भारतीय संख्या प्रणाली में 100 करोड़ : एक अरब) सिगरेट के टुकड़े सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर लापरवाही से फेंक दिए जाते हैं। यह संख्या अत्यंत डरावनी है क्योंकि यह देश में फैलने वाले कुल कचरे का लगभग 62 प्रतिशत हिस्सा है। यदि केवल सोडरटालिये शहर की बात की जाए, तो वहां का स्थानीय प्रशासन प्रतिवर्ष सड़कों और पार्कों की मैन्युअल सफाई पर लगभग 20 मिलियन (भारतीय संख्या प्रणाली में 2 करोड़) स्वीडिश क्रोना की विशाल धनराशि खर्च करता है। इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद छोटे छोटे कोनों से इस कचरे को पूरी तरह साफ करना असंभव हो जाता है। ऐसे में यह नवीन प्रयोग प्रशासन के लिए आर्थिक राहत और स्वच्छता की एक नई किरण बनकर उभरा। इस योजना से जुड़े विशेषज्ञों का दावा था कि यदि इस स्वचालित व्यवस्था को पूरे शहर में बड़े पैमाने पर लागू कर दिया जाए, तो सिगरेट के टुकड़ों को साफ करने की प्रशासनिक लागत में लगभग 70 से 75 प्रतिशत तक की भारी कमी लाई जा सकती है। इसका मुख्य कारण यह है कि कौवे इंसानी सफाईकर्मियों की तुलना में बहुत अधिक फुर्तीले होते हैं और वे उन संकरी नालियों, दीवारों की दरारों और छिपे हुए स्थानों तक चंद मिनटों में पहुंच सकते हैं जहां इंसानों को पहुंचने में घंटों का समय लग सकता है।
यद्यपि इस अनूठे प्रयोग को वैश्विक स्तर पर बहुत अधिक सराहना मिली और इसे पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना गया, परंतु इसके साथ ही इस पर कई गंभीर सवाल और आपत्तियां भी दर्ज की गईं। अनेक पशु प्रेमियों, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों ने कौवों के स्वास्थ्य को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की। उनका तर्क था कि सिगरेट के इन टुकड़ों में अत्यधिक जहरीले हानिकारक तत्व और भारी धातुएं पाई जाती हैं। जब बेजुबान पक्षी इन अवशेषों को अपनी चोंच में दबाएंगे, तो वे विषैले तत्व उनके शरीर में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे उनकी सेहत को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है और उनकी अकाल मृत्यु भी हो सकती है। इसके अतिरिक्त, इस प्रयोग के नैतिक पक्ष पर भी व्यापक बहस छिड़ गई। समाज के एक बड़े वर्ग का मानना था कि मनुष्यों द्वारा फैलाई गई गंदगी और लापरवाही का खामियाजा बेजुबान जीवों को क्यों भुगतना चाहिए। इंसानों के कचरे को साफ करने की जिम्मेदारी पक्षियों पर डालना नैतिक रूप से कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता। विभिन्न मंचों और सामाजिक विमर्श में भी इस विषय पर तीखे मतभेद देखने को मिले, जहां कुछ लोगों ने इसे तकनीकी प्रगति कहा, तो वहीं दूसरों ने इसे बेजुबान पशु पक्षियों के अप्रत्यक्ष शोषण की संज्ञा दी।
इन तमाम विवादों और व्यावहारिक कठिनाइयों के बीच यह तथ्य भी सामने आया कि यह संपूर्ण परियोजना केवल एक प्रारंभिक और प्रायोगिक स्तर तक ही सीमित रही। इसे कभी भी सोडरटालिये शहर के बड़े हिस्सों या पूरे स्वीडन में पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका। कुछ स्वतंत्र प्रतिवेदनों में यह भी संकेत दिया गया कि स्थानीय नगर प्रशासन ने भविष्य में इस योजना को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने के लिए वित्तीय या प्रशासनिक सहयोग जारी नहीं रखा। इसके बावजूद, इस प्रयोग ने दुनिया भर के विचारकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि किस प्रकार आधुनिक तकनीक और पशु व्यवहार विज्ञान के समन्वय से पर्यावरण की गंभीर चुनौतियों के नए विकल्प तलाशे जा सकते हैं। यह प्रयोग वैश्विक समाज के समक्ष एक अत्यंत चुभता हुआ और महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न भी छोड़ जाता है। यदि हम अपनी वैज्ञानिक विधाओं के बल पर आकाश में उड़ने वाले कौवों को कचरा उठाकर एक निश्चित स्थान पर डालना सिखा सकते हैं, तो हम इंसानों को सड़कों पर कचरा न फैलाने की बुनियादी आदत क्यों नहीं सिखा पाते। वास्तव में इस पूरी समस्या की जड़ नगर प्रशासनों की कमी या उपकरणों का अभाव नहीं है, बल्कि स्वयं मनुष्यों की घोर लापरवाही और नागरिक चेतना का शून्य होना है। यदि प्रत्येक नागरिक सार्वजनिक स्थानों पर कचरा और सिगरेट के टुकड़े फेंकना बंद कर दे, तो हमें किसी भी शहर को साफ रखने के लिए बेजुबान पक्षियों या जटिल स्वचालित यंत्रों की सहायता लेने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। स्वीडन का यह प्रयोग मानव इतिहास में हमेशा एक ऐसी अनोखी मिसाल के रूप में याद किया जाएगा जिसने यह प्रमाणित किया कि प्रकृति का प्रत्येक जीव केवल मूकदर्शक नहीं है, बल्कि यदि मनुष्य अपनी हठधर्मिता छोड़े, तो वे हमारी कई समस्याओं के समाधान में हमारे सबसे बड़े सहयोगी बन सकते हैं।