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प्रतिभाशालियों के हौसले तोड़ता रोज-रोज का पेपर लीक

प्रतिभाशालियों के हौसले तोड़ता रोज-रोज का पेपर लीक

-ऋतुपर्ण दवे
भारत में एक बार फिर प्रतिष्ठित मेडिकल परीक्षा का पेपर लीक हो गया। पेपर लीक एकदम आम सा हो गया है। जितनी सहजता से खामियों को छुपाते हुए परीक्षा रद्द कर दी जाती है, उसके एवज में लाखों बच्चों के मनोमस्तिष्क पर इसका क्या प्रभाव पड़ता होगा, समझने की कोशिश भी नहीं का जाती। यह अफसरशाही नहीं तो क्या है? अबकी बार नीट यूजी 2026 पेपर लीक ने फिर तमाम व्यवस्थाओं और परीक्षा तंत्र पर करारा तमाचा जड़ा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ और जो तौर-तरीके देखने में आ रहे हैं उससे लगता है कि न ही आखिरी बार होगा। सबसे पहले बात 3 मई 2026 को भारत भर में हुई उस परीक्षा की जिसमें 22 लाख से अधिक छात्र देश-समाज के लिए कुछ करने की लालसा लिए नीट यूजी परीक्षा में शामिल हुए। उन्हें उम्मीद थी कि उनका सब कुछ बदल जाएगा। लेकिन सपने चूर-चूर हो गए। महज एक बयान जारी कर नौ दिन बाद नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) ने मेडिकल कोर्सों में दाख़िले खातिर होने वाली नीट-यूजी की परीक्षा रद्द कर दी। वजह बताई गई कि एजेंसी को 7 मई को एक व्हिसलब्लोअर ने जानकारी दी कि एक 'गेस पेपर' का पीडीएफ़ व्हाट्सऐप पर सर्कुलेट किया गया था, जिसमें वास्तविक नीट परीक्षा जैसे ही प्रश्न थे। एनटीए के महानिदेशक ने कहा कि परीक्षा में किसी भी तरह का उल्लंघन हमारी ज़ीरो-टॉलरेंस नीति के ख़िलाफ है और इससे उन 22 लाख छात्रों के भविष्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है जिन्होंने परीक्षा के लिए कड़ी मेहनत की थी। बयान के लब्बोलुआब में नपे-तुले शब्दों से अपनी निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जरूर पापड़ बेले गए। लेकिन अब उन लाखों बच्चों का क्या होगा जिन्हें लीक पेपर से कोई वास्ता नहीं था, पेपर अच्छा गया था लेकिन, चयन तय था, लेकिन सपने एक झटके में टूट गए! क्या एनटीए को भान होगा कि बच्चों के कोमल मनोमस्तिष्क पर क्या असर पड़ेगा? जब परीक्षा के पहले ही पीडीएफ बिके, सोशल मीडिया पर वायरल संदेश और सौदेबाजी की बातें हो रहीं थीं तब सारी एजेंसियों के कान में तेल पड़ा था? परीक्षा कोई भी हो, उसकी पवित्रता और निष्पक्षता का ध्यान रखने की गुरुतर जिम्मेदारी उन्हें संचालित करने वालों की होती है।
भारत में कुछ पेपर लीक बहुत ही सुर्खियों, विवादों और चर्चाओं में रहे हैं। ऐसे कुछ मामले आज भी लोगों को भुलाए नहीं भूलते। इनमें मध्य प्रदेश व्यावसायिक परीक्षा मंडल (व्यापम) का 2013 का मामला काफी चर्चित है। इसमें नकली परीक्षार्थी (सॉल्वर) दूसरों की जगह परीक्षा में सम्मिलित हुए। लंबी रकम देकर इस तरह नौकरियां में जाने का रास्ता भी बना था लेकिन पकड़े गए। मामले में कई आरोपियों सहित जाँच एजेंसियों के लोगों की संदिग्ध मौतें भी हुईं। तब पूरा मामला तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए भी गले की हड्डी बना। आरोप-प्रत्यारोपों की झड़ी लगी लेकिन सभी आरोप सिद्ध नहीं हो पाए। एक अन्य मामला कर्मचारी चयन आयोग का सामने आया। जब सुप्रीम कोर्ट ने पूरी भर्ती प्रणाली को दूषित बता दिया। कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) की कम्बाइंड ग्रेजुएट लेवल (सीजीएल) 2017 परीक्षा का पेपर परीक्षा शुरू होने से पहले ही सोशल मीडिया पर लीक हो गया। सीबीआई जांच में पता चला कि कुछ परीक्षा केंद्रों के सुपरवाइजर्स ने अभ्यर्थियों को रिमोट एक्सेस सॉफ्टवेयर के जरिए बाहरी मदद दिलवाई थी। 2022 में रेलवे भर्ती विवाद में सवा करोड़ युवाओं का सड़कों पर उबाल दिखा जिन्होंने स्क्रीनिंग टेस्ट पर आपत्ति उठाई। 2024 में यूजीसी नेट की परीक्षा दूसरे ही दिन रद्द कर दी गई जिसमें 9 लाख प्रतिभागियों के भविष्य पर प्रश्न चिन्ह लग गया जो पीएचडी करने और प्रोफेसर बनने का सपना संजोए हुए थे। बहुचर्चित नीट-2024 में 67 छात्रों का 720 अंक ही अर्जित करना सुर्खियों में रहा। इसमें झारखण्ड के एक प्रिन्सपल और वाइस प्रिन्सपल ने पर्चा चुराकर लाखों में बेचा था। जिससे सभी के समान अंक आए और मामले ने तूल पकड़ा।
आखिर इतनी जिम्मेदार परीक्षाओं के प्रश्न पत्र लीक होना न केवल एनटीए बल्कि उन सारी छोटी-बड़ी उन एजेंसियों के लिए बड़ा सवाल है जिनके कंधों पर परीक्षा की निष्पक्षता, पारदर्शिता का बोझ है। सवाल यह भी है कि अब तक देश की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा यूपीएससी का पेपर क्यों नहीं लीक हुआ? महज प्रिलिम परीक्षा के दौरान 1992 में इलाहाबाद केंद्र पर पेपर लीक होने की शिकायत आईं थी जिस पर संसद में बहस हुई थी। सीबीआई जांच में भी यह सिर्फ एक इनविजिलेटर द्वारा पेपर कॉपी करने का मामला निकला न कि लीक का।
आए दिन पेपर लीक के मामले सामने आते रहते हैं। इसी बार अब तक कई परीक्षार्थियों ने आत्मघाती कदम उठा लिया है। यह बहुत दुखद है। इसे कौन समझेगा? किस पर बच्चों के कोमल मन को झकझोरने और उन्हें ना समझी में बुरे कदम उठाने का आरोप लगेगा? बहुत ही दुखद है मेहनत के बाद इस तरह की घटनाएँ जहाँ रिवाज बन गई हैं वहीं कई प्रतिभाशाली अपने जीवन को संभाल भी नहीं पा रहे हैं। पिछले 12-13 वर्षों के छोटे-बड़े मामले देखें तो लगभग सैकड़ा पार हो चुका है। तकरीबन दो करोड़ छात्रों के भविष्य पर हर वर्ष असर पड़ता है। कई उम्र की सीमा लांघ चुके होते हैं तो कई का मनोबल टूटता और बेहतर करने के बजाए अवसाद का शिकार हो जाते हैं जीवन से हाथ धो लेते हैं। उधर एजेंसियां ईमानदारी के नाम पर खुद को कटघरे में पाकर पेपर ही कैंसल कर, दोबारा कराने का आदेश देकर बरी और ईमानदार हो जाती हैं। इधर मामले बनते हैं और अपराधी कटघरे में भी पहुंचते हैं लेकिन अनेकों बार देखने में आया कि निश्चित समय-सीमा में चार्ज शीट दाखिला में देरी से वो भी बाहर आकर दोबारा अपने पुराने कार्यों मे संलग्न हो जाते हैं।
पेपर लीक को लेकर सरकार को सख्त होना पड़ेगा। कहने को तो कई आरोपी अब तक गिरफ्त मे आ चुके हैं। लेकिन इसका हल ढ़ूंढ़ना ही होगा, संसद में बहस करनी होगी, कठोरतम व्यवस्था व प्रभावी कानून बनाने होंगे ताकि लोग पेपर लीक करने या कराने के नाम से ही थर्राने लगे और इस बारे में सोचना ही बंद कर दें। इसके लिए यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (यूपीएससी) को रोल मॉडल मान इससे सीख लेनी चाहिए। परीक्षाओं की पवित्रता की गारन्टी हुक्मरानों और अफसरों को लेनी ही होगी ताकि प्रतिभाशालियों का हौसला बार-बार न टूटे और विचलित भी न हों।

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