राजस्थान में तीन तेरह होती कांग्रेस
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जहां महंगाई राहत शिविरों के जरिये प्रदेश में अपनी
सरकार के रिपीट होने का लगातार दावा कर रहे है वहां कांग्रेस के असंतुष्ट नेता सचिन पायलेट
गाहे बगाहे उनके दावे की हवा निकालते देर नहीं कर रहे है। अब यह लगभग साफ़ होता जा
रहा है गहलोत आगे किसी भी स्थिति में सचिन के साथ रहने को तैयार नहीं है। सचिन ने
खुल्लम खुल्ला गहलोत पर पैसे के बल पर सियासत का आरोप जड़ दिया है। अपने एक
दिवसीय अनशन के बाद सचिन पायलट ने भ्रष्टाचार व भर्ती परीक्षाओं के पर्चे लीक होने के
मुद्दे को लेकर अपनी ही सरकार के विरुद्ध गुरुवार से पांच दिवसीय "जनसंघर्ष यात्रा" प्रारंभ
कर दी है। अजमेर से शुरू यह पैदलयात्रा 125 किमी का सफर तय कर 15 मई को जयपुर
पहुंचेगी। पायलट व समर्थक प्रतिदिन 25 किमी पैदल चलेंगे। अजमेर में जनसभा में पायलट ने
कहा कि राजनीति आग का दरिया है और तप कर जाना है। जनता ने लूटने का लाइसेंस किसी
को नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि पहले कांग्रेस मात्र 21 सीटों पर रह गई थी। हम खून-पसीना
बहाकर कांग्रेस को सत्ता में लाए। पायलट बोले-पर्चे लीक होने की जांच होनी चाहिए। इधर,
कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि यह कांग्रेस की नहीं, पायलट की यात्रा
है। आलाकमान इस पर मंथन करेगा। यात्रा की संगठन से अनुमति नहीं ली गई। पायलेट ने यह
यात्रा भ्रष्टाचार के खिलाफ बताई है मगर सियासतदारों का कहना है सचिन ने गहलोत के
खिलाफ अपना ब्रह्मास्त्र चल दिया है। इससे पूर्व पायलट ने जयपुर में अपने आधिकारिक
आवास पर प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए कहा था कि उन्हें लगता है कि अशोक गहलोत
की नेता सोनिया गांधी नहीं बल्कि वसुंधरा राजे है।
पायलेट समझ गए है उन्हें सियासत में अब अकेले ही आगे बढ़ना होगा क्योंकि गाँधी परिवार
अब उनका साथ नहीं देगा। पायलेट अंतिम दम तक भ्रष्टाचार या अन्य किसी बहाने गहलोत से
लड़ने के बाद अन्ततोगत्वा अपनी अलग राह पकड़ेंगे ऐसा सियासत पर निगाह रखने वाले लोगों
का कहना है। पायलेट ने पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर भाजपा
में जाने के अपने रास्ते लगभग बंद कर लिए है। अब आम आदमी पार्टी या प्रदेश में तीसरा
मोर्चा खड़ा करने का विकप ही उनके पास बचा है। सचिन उस नाव पर सवार हो गए है जिसके
बारे में कहा जा रहा है हम तो डूबेंगे सनम मगर तुमको भी ले डूबेंगे।
राजस्थान की कांग्रेस सरकार अगले विधानसभा चुनाव में रिपीट होगी या नहीं इस पर कांग्रेसी
नेताओं की बेचैनी बढ़ती जा रही है। परस्पर दावे प्रतिदावे किये जा रहे है। मुख्यमंत्री अशोक
गहलोत अपनी जनकल्याणकारी योजनाओं के बूते सरकार रिपीट होने का विश्वास व्यक्त कर रहे
है वहीं उनके विरोधी उनके इस दावे की खिल्ली उडा रहे है। सचिन पायलेट कह रहे है जब तक
कार्यकर्ताओं को मान सम्मान नहीं मिलेगा तब तक रिपीट की बात करना बेमानी है। हालांकि
इस बार कांग्रेसी नेता परिपाटी बदलने का दावा कर रहे हैं। वहीं मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और
सचिन पायलट के बीच जंग थमने के बजाय धधकने लगी है। मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर
कांग्रेस हाईकमान के फैसले के लंबे इतंजार के बाद अब सचिन पायलट फिर मुखर हो गए हैं।
पायलेट ने प्रदेशभर में किसान रैलियों के जरिये गहलोत को जमीनी चुनौती देना शुरू कर दिया
है। उल्लेखनीय है राजस्थान में पिछले दो दशक से कोई नेता लगातार दो बार मुख्यमंत्री नहीं
बन पाया है। मतदाता हर 5 साल बाद यहां मूड बदल लेती है और कोई भी पार्टी अपने आखिरी
साल में आते-आते एंटी इनकंबेंसी का शिकार होकर चुनावों में हार जाती है। इस सियासी उठापटक
के बीच मंत्रियों और विधायकों ने चौक चौराहों पर अपनी नाराजगी के तीखे तेवरों से कांग्रेस सियासत को
हिलाकर रख दिया है। जैसे जैसे विधानसभा चुनावों की तिथि नज़दीक आती जा रही है वैसे वैसे राजस्थान
में सत्तारूढ़ कांग्रेस में घमासान थमने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है।
गौरतलब है 2018 में राजस्थान विधानसभा चुनाव के बाद से अशोक गहलोत और सचिन पायलट में
खींचतान चल रही है। 2018 में जब कांग्रेस की सत्ता में वापसी हुई थी तो उस वक्त कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष
सचिन पायलट थे। ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि गांधी परिवार मुख्यमंत्री की कुर्सी उन्हें सौपेगा। लेकिन उस
वक्त आलाकमान ने अशोक गहलोत की वरिष्ठता और अनुभव को ध्यान में रखकर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया
था। जबकि सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन दो साल के अंदर ही साल 2020 में सचिन
पायलट ने बगावती तेवर दिखाने लगे थे। उसके बाद गांधी परिवार के दखल के बाद मामला शांत हुआ था।
लेकिन इस खींचतान में सचिन पायलट को उप मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी थी।
-बाल मुकुन्द ओझा