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गर्भावस्था में मां को होती प्रेग्नेंसी ब्रेन की परेशानी

गर्भावस्था में मां को होती प्रेग्नेंसी ब्रेन की परेशानी

याददाश्त कमजोर, गर्भ में बच्चे से बात करने के लिए दिमाग में नई ‘वायरिंग’


नई दिल्ली . मां बनने के लिए महिलाएं कई मुश्किलों से गुजरती हैं। ऐसी ही एक मुश्किल अक्सर प्रेग्नेंट महिलाओं के सामने आती है, वह है प्रेग्नेंसी ब्रेन।

आप सोच रहे होंगे कि ये कैसी मुसीबत है, जिसका नाम आज तक नहीं सुना।

दरअसल, गर्भावस्था के दौरान अगर किसी महिला की याददाश्त कमजोर हो जाए और वह चीजें भूलने लगे तो इसे ‘प्रेग्नेंसी ब्रेन’ कहते हैं।

इस समस्या को और भी कई नामों से जाना जाता है, जैसे- ‘बेबी ब्रेन’, ‘मम्मी ब्रेन’ और ‘मॉमनेशिया’।

गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. मीना सामंत बताती हैं कि प्रेग्नेंसी ब्रेन की समस्या सिर्फ प्रेग्नेंट महिलाओं में ही देखने को मिलती है।

अमेरिका और यूरोप में इस समस्या को लोग गंभीरता से लेते हैं, मगर भारत जैसे देशों में इसे नजरअंदाज किया जाता है।

दरअसल, पुरुष प्रधान समाज होने की वजह से भारत में भूलने की समस्या या याददाश्त कमजोर होने की समस्या को खुद महिलाएं या उनके परिवार वाले भी बीमारी नहीं मानते।
डॉ. मीना सामंत कहती हैं कि प्रेग्नेंसी के दौरान महिला में कई सारे हॉर्मोंस जैसे एस्ट्रोजन, प्रोजेस्ट्रॉन और ग्रोथ हॉर्मोन बढ़ जाते हैं। दूसरा, फिजिकल बदलाव भी होते हैं।

शुरुआत में उन्हें उल्टियां होती हैं। बाद में वजन बढ़ने पर सांस लेने में, चलने-फिरने में तकलीफ होती है। इसके अलावा, महिला साइकोलॉजिकल बदलावों से भी गुजरती है।

उन्हें आने वाले बच्चे को लेकर खुशी भी होती है और डर भी लगा रहता है।

क्या खाना है-क्या नहीं, बच्चे की डिलीवरी नॉर्मल होगी या सिजेरियन, जैसी बातें उसे परेशान करती हैं।

जिसकी वजह से उसकी नींद भी डिस्टर्ब होती है और स्ट्रेस बढ़ता है।

इसी दौरान, महिला छोटी-छोटी चीजें भूलने लगती है। उसे याद नहीं रहता है कि दवा खाई या नहीं या कौन सा काम कब करना है।

ऐसा होने पर उसे उलझन होती है। यही अवस्था ‘प्रेग्नेंसी ब्रेन’ के नाम से जानी जाती है।
‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ की एक स्टडी के मुताबिक, 80 फीसदी से ज्यादा प्रेग्नेंट महिलाओं ने भूलने की समस्या या याददाश्त के कमजोर होने की बात मानी है।

प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही में महिला के शरीर में हॉर्मोंस की बाढ़ जैसी स्थिति बनती है

प्रेग्नेंसी ब्रेन की शुरुआत गर्भावस्था की पहली तिमाही से होती है, जब शरीर में कई सारे हॉर्मोंस की बाढ़ सी आ जाती है।

इसी दौरान नींद की कमी एक आम समस्या बनकर उभरती है, जो मानसिक सुस्ती लाती है। इससे प्रेग्नेंसी ब्रेन की समस्या और बढ़ सकती है।

ऑस्ट्रेलियन जर्नल में छपी एक स्टडी 'कॉग्निटिव इम्पेयरमेंट डयूरिंग प्रेग्नेंसी: ए मेटा एनालिसिस' में कहा गया है कि सोचने-समझने की क्षमता पर बुरा असर पड़ना ही ‘बेबी ब्रेन’ है।

क्या होता है इस समस्या में, किस तरह की दिक्कतें आती हैं

डॉ. मीना सामंत के मुताबिक ‘प्रेग्नेंसी ब्रेन’ के नतीजे तब और घातक हो जाते हैं, जब इसे नजरअंदाज किया जाता है।

इस दौरान घर और ऑफिस में काम के दौरान लोगों से बातचीत करने में भी दिक्कत आ सकती है।

यहां तक कि गंभीर मेमोरी प्रॉब्लम होने पर काम पर लौटने में भी मुश्किल होती है।

प्रेग्नेंसी ब्रेन की असल वजह क्या

प्रेग्नेंसी के दौरान हर महिला के हालात अलग-अलग होते हैं। लेकिन महिला के दिमाग पर असर करने की कई वजहें समान होती हैं।

इनमें एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन हॉर्मोंस का लेवल कम या ज्यादा होना दिलो-दिमाग पर असर डालता है।

गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. माला बताती हैं कि 80 फीसदी से ज्यादा महिलाओं को प्रेग्नेंसी के दौरान नींद न आने की समस्या होती है।

प्रेग्नेंसी के छठे-सातवें महीने में करीब 98 फीसदी महिलाओं ने रात में बार-बार जगने की शिकायत होती है।

नींद पूरी न होने और सोने में बाधा पहुंचने से प्रेग्नेंट महिला के सोचने-समझने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है।

तनाव, चिड़चिड़ापन और मूड बिगड़ना भी बड़ी वजह

डॉक्टर माला बताती हैं कि प्रेग्नेंट महिला हमेशा होने वाले बेबी के बारे में सोचती रहती है, जो कई बार उसे तनाव और चिड़चिड़ेपन की ओर ले जाती है।

होने वाले बच्चा कैसा होगा, कहीं उसे कोई दिक्कत तो नहीं होगी, बच्चे की ग्रोथ ठीक हो रही है, ऐसी तमाम आशंकाएं मां के मन में जन्म लेती रहती हैं।

इससे वह न तो किसी काम में मन लगा पाती है और न ही अपने ऊपर ध्यान दे पाती है। इसके अलावा, वह मूड डिसऑर्डर भी परेशान रहती है।

ऐसे में कम नींद या ज्यादा देर तक जागने से दिमाग थकता है और याददाश्त पर असर पड़ता है।

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