भाजपा अब 2024 के लिए दक्षिण में कमल खिलाने की तैयारी कर रही है
उत्तर और पश्चिम भारत में भाजपा के बैक टू बैक स्वीप ने 2014 और 2019 के चुनावों में बड़ी जीत हासिल की और अब पार्टी पूर्व और दक्षिण भारत में अपना विस्तार करने की लगातार कोशिश कर रही है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि उसके अपने हिंदी पट्टी के गढ़ों में उसकी लोकसभा सांसदों की संख्या में कभी कोई गिरावट हो तो उसकी भरपाई वह इन राज्यों से कर सके।भाजपा ने पश्चिम बंगाल और ओडिशा जैसे पूर्वी राज्यों में अपनी नई जमीन को उपजाऊ बनाया है, लेकिन विंध्य से आगे का क्षेत्र अब तक इसके लिए कम उपजाऊ साबित हुआ है। जबकि कर्नाटक आज भी भाजपा का गढ़ बना हुआ है। लोकसभा चुनावों में, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और तमिलनाडु के शेष चार राज्य भगवा लहर से काफी हद तक अछूते रहे हैं। भाजपा ने इन चार राज्यों की ज़िम्मेदारी सह संगठन मंत्री शिव प्रकाश के कंधों पर डाली है। शिव प्रकाश 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2014 के बाद से पश्चिम बंगाल में लगातार काम कर चुके हैं। संगठन के कुशल शिल्पी के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले शिव प्रकाश, संगठन खड़ा करने, संगठन को जुझारू बनाने और संगठन को लड़ने के लिए प्रेरित करने में माहिर माने जाते हैं। कार्यकर्ता की पहचान कर उसे मुफ़ीद काम सौंपते हैं। उनके निशाने पर अभी सबसे ऊपर तेलंगाना है। यहां भाजपा 2024 के पहले विधानसभा चुनाव और फिर लोकसभा चुनाव में सबसे ज़्यादा सम्भावनाएं देख रही है। ऐसे में आरएसएस से प्रचारक बन कर निकले शिव प्रकाश ने फ़िलहाल दक्षिण में अपना केंद्र हैदराबाद को बनाया हुआ है।आंध्र प्रदेश में टीडीपी और तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक जैसी पारंपरिक रूप से मजबूत पार्टियां कमजोर हो गई हैं और वाईएसआर के नेतृत्व वाली सरकार को एक मजबूत चुनौती देने के लिए संघर्ष कर रहीं हैं। ऐसे मेंभाजपा के लिए स्थितियां, इस क्षेत्र में पहले से कहीं अधिक परिपक्व हैं।
अब कांग्रेस के राष्ट्रीय विकल्प की पेशकश करने की स्थिति में नहीं होने के कारण वाम शासित केरल में भी भाजपा के लिए नई संभावनाएं खुल गई हैं। जहां लगभग 45 प्रतिशत अल्पसंख्यकों ने इस राज्य को भाजपा के लिए अभी तक मरुभूमि ही बनाए रखा है। पार्टी का “दक्षिणी मार्च” कर्नाटक की सीमाओं से आगे बढ़ने में विफल रहा है, जहां वह पहली बार 2008 में सत्ता में आई थी।भाजपा ने 1999 में तेदेपा के साथ गठबंधन में नौ सीटें जीती थीं और तमिलनाडु से उसी वर्ष में चार सदस्य लोकसभा पहुंचे थे। यह दोनों राज्यों में भाजपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन रहा है। इन राज्यों में पार्टी का हिंदुत्व का मुद्दा भी अन्य क्षेत्रों की तरह प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पा रहा है। दक्षिण के राज्यों में मजबूत नेताओं की मौजूदगी ना होना भाजपा के लिए सबसे बड़ा कमजोर पक्ष रहा है और अब उसकी चुनौती उससे आगे जाने की है।
अब संगठन मंत्री शिव प्रकाश का ही प्रयत्न है कि दो दिन में दक्षिण के दो बड़े नेताओं ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया हैं । कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व रक्षामंत्री ए.के, एंटनी के बेटे अनिल एंटनी के बाद आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी भी भाजपा में शामिल हो गए। दोनों नेताओं ने हाल ही में कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दिया था। तो ये कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा झटका है और दक्षिण भारत में पैर जमाने के लिए जोर लगा रही भाजपा को इससे बहुत फायदा होगा । वैसे इन दोनों नए नेताओं की जो कार्यस्थली रही है, अलग-अलग रही है। दोनों का कर्मक्षेत्र अलग-अलग है, लेकिन दोनों ही कांग्रेस के कद्दावर नेता हैं या फिर नेता के परिवार से आते हैं। इन दोनों को अलग-अलग करके भी देखने की जरूरत है। अगर हम अनिल एंटनी की बात करते हैं तो उनकी अपनी कोई राजनीतिक जमीन या राजनीतिक हैसियत वैसी नहीं है। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह कांग्रेस के लिए बहुत बड़ा आघात है। ए.के. एंटनी जो तीन बार कांग्रेस से केरल के मुख्यमंत्री रहे। केंद्र में रक्षा मंत्री रहे और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे हैं। अभी जब कांग्रेस के सारे छत्रप गिर चुके हैं, ए.के. एंटनी ने दृढ़ता से मोर्चे को संभाल रखा है। उनके बेटे का कांग्रेस छोड़कर भाजपा में जाना और फिर जब वो भाजपा में गए हैं तो उन्होंने कांग्रेस पर बुरी तरह से अटैक करना , उनके परिवारवाद पर अटैक करना कांग्रेस के लिए घातक है।
अब देखने वाली बात यह है कि आने वाले समय में भाजपा किस तरह से ए.के. एंटनी के पुत्र को उपयोग करती है, अपने राजनीतिक फायदे के लिए या राज्य में अपना जनाधार बढ़ाने के लिए, ये भाजपा के रणनीति पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा। जहां तक अनिल एंटनी का सवाल है वो केपीसीसी (केरल प्रदेश कांग्रेस कमिटी) में किसी भूमिका में थे। उतनी बड़ी राजनीतिक हैसियत उनकी अपनी नहीं है। लेकिन ए.के. एंटनी के पुत्र हैं तो वो हस्ती तो जरूर हैं। प्रधानमंत्री ने कुछ दिन पहले संकेत दिए थे तथा भाजपा के तमाम बड़े नेता संकेत देते रहे हैं कि वो केरल की राजनीति में किस तरह से बदलाव लेन जा रहे हैं। अभी हाल के दिनों में भाजपा का जो एजेंडा है, क्रिश्चियन बहुल प्रांतों के लिए अलग है। भाजपा केरल में वह राजनीति नहीं करेगी, जो राजनीति वह उत्तर भारत के राज्यों में या गंगा के दोआब में करती आ रही है। वहां पर उनकी कोशिश होगी कि अगर माइनॉरिटी कम्युनिटी है, उनको अपनी तरफ आकर्षित किया जाए, जैसा कि उन्होंने नॉर्थ ईस्ट में किया है। जैसा कि उन्होंने गोवा में किया है। ये नॉर्थ ईस्ट मॉडल भाजपा केरल में अप्लाई करना चाहेगी। पाठकों को याद होगा तलासेरी चर्च के आर्कबिशप ने अभी कुछ ही दिनों पहले कहा था कि केंद्र सरकार रबर की फसल की कीमत यदि बढ़ा देती है, तो जो मालाबार के कैथोलिक समुदाय हैं वो भाजपा को वोट कर सकते हैं और इस तरह से भाजपा का अपना सांसद केरल से होने का सपना पूरा हो सकता है। इसके साथ ही अनेक जो धर्मगुरु हैं केरल में, जो चर्च में अपनी सेवाएं देते हैं, लव-जिहाद के मुद्दे पर भाजपा के स्टैंड का अप्रत्यक्ष समर्थन करते आ रहे हैं। लेकिन पहली बार कोई बड़ा धार्मिक नेता केरल में भाजपा की पैरोकारी कर रहा है।एक और धार्मिक नेता जोशी मलैट्रिल ने कहा कि अभी जो क्रिश्चियन युवाओं का रुख भाजपा की तरफ हो रहा है। इसके लिए लेफ्ट फ्रंट और कांग्रेस जिम्मेवार है। एक तरह से देखा जाए तो ईसाई समुदाय का और जो युवा वर्ग हैं, वो जो पुराने बनाए गए एक भय का एक आवरण है उसको तोड़कर नई जमीन तलाशने में ज्यादा इंटरेस्ट ले रहा है। धीरे-धीरे उनका उनका नजरिया भाजपा के लिए बदलता हुआ दिख रहा है।
गौरतलब है कि किरण कुमार रेड्डी कांग्रेस के बहुत बड़े नेता रहे हैं, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में वो कांग्रेस में लगभग आधारविहीन हो गए थे। उन्होंने पार्टी भी छोड़ी, फिर से वापस पार्टी में आए। लेकिन पार्टी में उनका फिर वो कद नहीं रहा। इस बीच एक बात और हुई कि जिस रायलसीमा क्षेत्र में किरण कुमार रेड्डी का जो बचा खुचा प्रभाव समझा जाता है। उसी क्षेत्र से अभी जो वर्तमान मुख्यमंत्री आंध्र प्रदेश के जगन मोहन रेड्डी हैं वो भी आते हैं। तो कांग्रेस में इनकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई थी। कोई आधार नहीं रह गया था। इनको अपनी नई राजनीतिक जमीन तलाशनी थी। इन्होंने भाजपा में जाना सही समझा। अगर वोट बैंक की बात करें तो किरण कुमार रेड्डी के साथ कोई ऐसा तगड़ा वोट बैंक नहीं है।फिर भी यह भी सांकेतिक रूप से कांग्रेस के लिए आघात है। भाजपा के लिए जरूर फायदे की बात है। यद्यपि किरण कुमार रेड्डी अपने साथ वोट बैंक नहीं ला रहे हैं, लेकिन किरण कुमार रेड्डी के आने से यह होगा कि भाजपा को आंध्र प्रदेश में एक जाना माना चेहरा मिल जाएगा। एक अनुभवी राजनेता मिल जाएगा, जो हो सकता है कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के चुनाव में एक रणनीतिकार की भूमिका निभा सकता है।
दूसरी बात, रायलसीमा का जो क्षेत्र है और जो चित्तूर कर्नाटक का क्षेत्र कहा जाता है, उस क्षेत्र में हो सकता है कि भाजपा किरण कुमार रेड्डी का इस्तेमाल करना चाहे। किरण कुमार रेड्डी के भाजपा में आने से एक बात और होगी। जो रेड्डी बंधुओं के जाने से हुई, जनार्दन रेड्डी, कर्माकर रेड्डी और उनके मित्र गण, जो पहले भाजपा की सरकार बनवाने में बहुत इंस्ट्रुमेंटल थे। अभी भाजपा से अलग उन्होंने अपनी पार्टी बनाई है। यहां पर भाजपा के द्वारा एक रिक्तता को भरने का प्रयास जरूर होगा। ये जातीय समीकरण भी देखना होगा। इससे पहले के जो पूर्व दो अध्यक्ष रहे हैं आंध्र प्रदेश में भाजपा के, वो खम और काकू समुदाय से आते थे। ये दोनों ओबीसी समुदाय हैं। अब भाजपा एक रेड्डी कम्युनिटी के लीडर को आपने पाले में लेकर आई है। ऐसा लगता है कि राज्य में शायद उनको कुछ महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जाएगी। तो इस तरह इन दो राज्यों में भाजपा की सामाजिक अभियंत्रण की भी कोशिश रहेगी। अब दक्षिण भारतीय राज्यों में तमिलनाडु को छोड़कर ऐसी संभावना है कि बहुत सारे नेताओं के घर बदले जाएंगे। अभी उसकी घोषणा तो नहीं की जा सकती है लेकिन समय के साथ ये जरूर पता चलेगा, खासकर केरल में और हमें जहां तक सूत्रों से जानकारी मिली है, केरल में और कुछ नेताओं की दिलचस्पी भाजपा में है। खासकर कांग्रेस के नेताओं की। तो हो सकता है वहां पर और कुछ परिवर्तन देखने को मिले।
-अशोक भाटिया