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स्वास्थ्य जीवन की सबसे बड़ी पूंजी

स्वास्थ्य जीवन की सबसे बड़ी पूंजी

स्वास्थ्य को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी कहा जाता है। किसी भी राष्ट्र के लिए उसके लोगों का
स्वस्थ होना जरूरी है। स्वास्थ्य को लेकर देश और दुनिया में भारी चिंता व्याप्त है। आधुनिक
लाइफ स्टाइल ने बच्चे से बुजुर्ग तक को जकड रखा है जिसके फलस्वरूप असमय हार्ट अटेक
जैसी घटनाएं देखने को मिल रही है। किसी ने सही कहा है स्वास्थ्य ही अनमोल धन है और
हम इसी को उजाड़ने पर आमादा है। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन के विभिन्न क्षेत्रो में
सफलता अर्जित कर सकते है। स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है। व्यक्ति की सबसे बड़ी दौलत
उसका शरीर और उसका स्वास्थ्य होता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति सदैव सजग रहना
चाहिए। आज हर व्यक्ति अच्छी सेहत की बात करता है और इसके प्रति काफी हद तक लोगों में जागरूकता
भी आई है। मगर आज भी अधिकांश व्यक्तियों के रोग का या तो समय पर पता नहीं चल पाता है या उसका
सही तरह से उपचार नहीं हो पाता है, जिसके कारण हर साल पूरी दुनिया में करोड़ों लोगों की असमय ही
मृत्यु हो जाती है। स्वस्थ जीवन का अधिकार हर मनुष्य को है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक आज
भी दुनिया के 10 करोड़ लोग घोर गरीबी में जीते हैं और अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देते हैं। फलस्वरूप
विभिन्न बीमारियों से घिरे रहते है और समय पर उपचार नहीं मिलने के कारण अंततोगत्वा अकाल मौत के
शिकार हो जाते है।
स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन का निवास होता है। मन को कभी गंदा या खराब नहीं रखना चाहिए। मानव की
सबसे बड़ी दौलत उसका शरीर और उसका स्वास्थ्य होता है। अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए कई
चीजों की आवश्यकता होती है। इनमें ताजी हवा, स्वच्छ पानी, उचित धूप, संतुलित आहार, जंक फूड से दूर,
स्वच्छ, स्वस्थ और हरियाली का वातावरण, सुबह की सैर, व्यक्तिगत स्वच्छता, उचित शिक्षा आदि की
आवश्यकता होती है। अच्छा स्वास्थ्य तनाव के स्तर को कम करता है और बिना किसी कष्ट के स्वस्थ
जीवन को बढ़ावा देता है। हमें हमेशा अपने स्वास्थ्य के बारे में पता होना चाहिए और नियमित स्वास्थ्य
जांच के लिए जाना चाहिए। हमें अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए समय पर ताजे फल, सलाद, हरी
पत्तेदार सब्जियां, दूध, दही और छाछ आदि का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए।
भारत में आम तौर पर लोगों में स्वास्थ्य चेतना का अभाव है। शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति भी लोग तभी
चिंतित होते हैं जब कोई रोग उन्हें घेर लेता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि निष्क्रियता कई
गंभीर बीमारियों को जन्म देती है। विश्व लगातार बढ़ रही निष्क्रियता नामक महामारी का शिकार हो रहा है

आरामदेह जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ, जैसे हृदय रोग और डायबीटीज, अब तक संपन्न देशों की
बीमारियाँ मानी जाती थीं लेकिन अब विकासशील देश भी अब इसके शिकार हो रहे हैं । विश्व भर में इन
बीमारियों से हर वर्ष दो करोड़ लोगों की मौत होती है और इनमें से अस्सी प्रतिशत गरीब देशों से हैं। इस तरह
की बीमारियाँ दौड़-भाग से रोकी जा सकती हैं ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि विश्व के पचासी प्रतिशत लोग निष्क्रिय जीवनशैली बिता रहे हैं और
विश्व के दो-तिहाई बच्चे भी पूरी तरह से सक्रिय नहीं हैं और इससे उनके भविष्य पर भी बुरा असर पड़ेगा ।
संगठन का कहना है कि साधारण व्यायाम जैसे पैदल चलना, नृत्य करना और यहाँ तक की सीढ़ियाँ चढ़ना
भी सेहत को ठीक रख सकता है । शोध बताते हैं कि खानपान में साधारण परिवर्तन और हल्के व्यायामों से
आंतों के कैंसर के खतरे को सत्तर प्रतिशत और डायबिटीज को साठ प्रतिशत कम किया जा सकता है । विश्व
स्वास्थ्य संगठन के अनुसार शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना ही मानव
स्वास्थ्य की परिभाषा है । भारत ने पिछले कुछ सालों में तेजी के साथ आर्थिक विकास किया है, लेकिन इस
विकास के बावजूद बड़ी संख्या में लोग कुपोषण के शिकार हैं जो भारत के स्वास्थ्य के प्रति चिंता उत्पन्न
करता है।
स्वास्थ्य सिर्फ रोग या दुर्बलता की अनुपस्थिति ही नहीं बल्कि एक पूर्ण शारीरिक, मानसिक और
सामाजिक खुशहाली की स्थिति है। स्वस्थ लोग रोजमर्रा की गतिविधियों से निपटने के लिए और किसी भी
परिवेश के मुताबिक अपना अनुकूलन करने में सक्षम होते हैं। रोग की अनुपस्थिति एक वांछनीय स्थिति है
लेकिन यह स्वास्थ्य को पूर्णतया परिभाषित नहीं करता है। यह स्वास्थ्य के लिए एक कसौटी नहीं है और
इसे अकेले स्वास्थ्य निर्माण के लिए पर्याप्त भी नहीं माना जा सकता है। लेकिन स्वस्थ होने का वास्तविक
अर्थ अपने आप पर ध्यान केंद्रित करते हुए जीवन जीने के स्वस्थ तरीकों को अपनाया जाना है।

-बाल मुकुन्द ओझा

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