नैनीताल कैसे भूलता जा रहा है 146 वर्ष पुरानी प्राकृतिक आपदा....?
-प्रयाग पाण्डे
नैनीताल में हुए प्रलयकारी भू-स्खलन को 146 साल पूरे हो गए हैं। 18 सितंबर,1880 को नैनीताल की शेर-का-डांडा पहाड़ी में विनाशकारी हुआ था। इस भू-स्खलन ने कुछ ही पलों में नैनीताल का भौगोलिक मानचित्र बदल दिया था। इस दर्दनाक त्रासदी में 108 हिंदुस्तानियों और 43 यूरोपियन समेत 151 लोगों के शव मिले। वैज्ञानिकों का मानना था कि कुछ शव पहाड़ी के नुकीले पत्थरों और मलबे के ढेरों में दबे हो सकते हैं। हादसे में कई लोग बाल-बाल बचे। बचाव कार्यों के दौरान मजिस्ट्रियल चार्ज ऑफ द स्टेशन मिस्टर लियोनार्ड टेलर सहित कई अंग्रेज सैन्य अधिकारी, जवान और दूसरे कारिंदों को अपनी जान गवानी पड़ी थी। बचाव कार्यों के दौरान कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर सर हैनरी रैमजे बाल- बाल बचे। वे कमर तक मलबे में धंस गए थे। भू-स्खलन में लाखों रुपए की संपत्ति नष्ट हो गई थी।
भू-स्खलन ने कैप्टन हैरिस का भव्य एवं आलीशान विक्टोरिया होटल और इसके आसपास स्थित सभी घरों को नेस्तनाबूद कर दिया था। मालरोड के समीप स्थित 'बेल शॉप' नामक दुकान और माँ नयना देवी का मंदिर भी भू-स्खलन की चपेट में आ गए थे। असेंबली रूम्स (वर्तमान कैपिटल सिनेमा) का एक हिस्सा झील में समा गया था और शेष बचा हुआ हिस्सा मलबे में दफ़्न हो गया था। वर्तमान बोट हाउस के पास वाला झील का एक हिस्सा पलक झपकते ही मैदान में तब्दील हो गया था। 1880 तक नैनीताल फलता - फूलता और सर्व सुविधा संपन्न एक खुशहाल नगर बन चुका था। तब यहाँ की आबादी 10.054 थी, जिसमें 2.957 महिलाएं और 7.097 पुरूष थे। अंग्रेज नैनीताल के मौसम और यहाँ की स्वास्थ्यवर्धक जलवायु से अभिभूत थे। वे नैनीताल के पर्यावरणीय खूबियों से तो भली- भांति वाकिफ हो चुके थे, लेकिन ब्रिटिश हुक्मरान यहाँ के पारिस्थितिक तंत्र से छेड़छाड़ से हासिल खूबियों के लुत्फ़ उठाने की कीमत से अंजान थे। 18 सितंबर, 1880 को शेर-का-डांडा पहाड़ी में चंद सैकेंडों के भीतर घटी विनाशकारी भू-स्खलन की इस त्रासदी ने न केवल अंग्रेजी शासकों के होश उड़ा दिए, बल्कि उन्हें भीतर तक हिला कर रख दिया था।
हालांकि ब्रे-साइड का यह क्षेत्र प्रारंभ से ही अति संवेदनशील माना जाता था। 1880 से पूर्व भी इस क्षेत्र में कई मकान क्षतिग्रस्त हो चुके थे। नैनीताल की बसासत के करीब ढाई दशक बाद 1867 में पहला भू-स्खलन भी इसी पहाड़ी में हुआ था, जिसमें चार लोगों की जान चली गई थी। इस क्षेत्र की संवेदनशीलता के मद्देनजर 1880 से पूर्व अंग्रेज शासक यहाँ दार्जिलिंग की तर्ज पर नाला तंत्र विकसित कर चुके थे लेकिन दार्जिलिंग का नाला तंत्र नैनीताल के भू-गर्भीय हालातों में कारगर सिद्ध नहीं हुआ। 1880 से पहले शेर-का-डांडा पहाड़ी में आलीशान राजभवन के अलावा करीब डेढ़ दर्जन बंगले बने थे। बंगलों, उद्यान, टेनिस कोर्ट और सड़क-रास्तों आदि के निर्माण कार्यों में यहाँ की पहाड़ियों में भू-कटान और वृक्षों का पातन हुआ। इन निर्माण गतिविधियों के कारण यहाँ की प्राकृतिक भू-व्यवस्था अस्त-व्यस्त हो चुकी थी। 1880 के तीसरे सप्ताह के प्रारंभ में नैनीताल में लगातार चार दिन तक मूसलाधार बारिश हुई। निर्माण गतिविधियों के कारण वर्षा के पानी के निकास के प्राकृतिक मार्ग अवरुद्ध हो गए थे। प्राकृतिक नालों का वजूद ख़त्म हो गया था। वर्षा के जल की प्राकृतिक निकासी की व्यवस्था छिन्न- भिन्न हो गई थी। बंगलों और अन्य निर्माणों के लिए भूमि समतलीकरण के कारण वर्षा का पानी जमीन के उदर में जमा होने लगा। जमीन के गर्भ में समा गए पानी को बाहर निकलने के लिए उचित मार्ग नहीं मिला। नतीजतन वर्षात का पानी जमीन के अंदर जमा हो गया। अत्यधिक जल जमाव के कारण जमीन की सहन शक्ति क्षीण हो गई थी। इसी बीच आए भूकंप के एक हल्के झटके ने आग में घी का काम किया। 18 सितंबर, 1880 को जमीन के भीतर जमा पानी शेर-का-डांडा पहाड़ी के एक बड़े हिस्से को अपने साथ नैनी झील की ओर ले आया। धूल के एक गुबार के साथ गादनुमा इस मलबे के ढ़ेर ने नगर में तबाही मचा दी थी।
भू-स्खलन के बाद कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर सर हैनरी रैमजे ने बचाव और राहत कार्यों की कमान खुद संभाली। युद्ध स्तर पर बचाव कार्य किए गए। हादसे में मारे गए लोगों के परिजनों और प्रभावितों की सहायता के लिए सर हैनरी रैमजे की अध्यक्षता में साठ हजार रुपए का सहायता कोष बनाया गया। 'द हिमालयन गजेटियर' के लेखक एडविन टी. एटकिंसन इस सहायता कोष के सचिव बनाए गए। काबिल-ए- गौर बात यह है कि इस प्राकृतिक आपदा के बाद नैनीताल म्युनिसिपल कमेटी के सभी सदस्यों ने नैतिकता के आधार पर सामूहिक रूप से त्याग-पत्र दे दिए थे। इस भू-स्खलन के बाद औपनिवेशिक सरकार नैनीताल की पहाड़ियों की सुरक्षा को लेकर बेहद संवेदनशील हो गई थी। ब्रिटिश सरकार ने इस हादसे को "त्रासदी" करार दिया। हादसे के चौथे दिन 22 सितंबर, 1880 को नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर ने शेर-का-डांडा पहाड़ी की जांच के लिए कुमाऊँ के तत्कालीन कमिश्नर सर हैनरी रैमजे की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय जाँच कमेटी बना दी थी। इसके बाद भारत के भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के उप अधीक्षक मिस्टर डब्ल्यू. थियोबॉल्ड ने शेर-का-डांडा पहाड़ी की जाँच की। इसी साल भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण के वैज्ञानिक आर.डी. ओल्डहैम की अध्यक्षता में इंजीनियरों की एक जाँच कमेटी बनी। इसके अलावा सेना की ओर से दो कोर्ट ऑफ इंक्वायरी बैठाई गई। ब्रिटिश सरकार ने एक विशेष सिविल अधिकारी की नियुक्ति की। विशेष सिविल अधिकारी ने सरकार को अलग से अपनी जाँच रिपोर्ट सौंपी। नगर पालिका के तत्कालीन सदस्य एवं भू-विज्ञानी फ्रैडिक एडवर्ड जॉर्ज मैथ्यूज ने भी शेर- का- डांडा पहाड़ी की सुरक्षा की जाँच की थी, मैथ्यूज की जाँच रिपोर्ट 1882 में प्रकाशित हुई। विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर शेर-का-डांडा की पूरी पहाड़ी को किसी भी प्रकार के निर्माण के लिए निषेद्ध क्षेत्र घोषित कर दिया गया। यहाँ तक कि इस क्षेत्र में फुलबाड़ी बनाने पर भी पाबंदी लगा दी गई। इस पहाड़ी में अवस्थित करीब डेढ़ दर्जन बंगलों को बिना सिविल अधिकारी की लिखित अनुमति के किराए पर उठाने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। तत्कालीन ओक ओपिनिग्स स्कूल (अब बिड़ला विद्या मंदिर) और अन्य बंगलों में पानी जमा करने के लिए बने खालों को पाट दिया गया था। पहाड़ी में बने असुरक्षित भवनों को तोड़ने के आदेश जारी कर दिए गए।
इस हादसे के बाद नैनीताल में वैज्ञानिक आधार पर एक नया नायाब नालातंत्र विकसित किया गया। 1880 से 1928 के दौरान समूचे नैनीताल को 69 बड़े और 234 ब्रांच नालों के जाल में लपेट दिया गया। सबसे अधिक नाले इसी पहाड़ी में बनाए गए। शेर-का- डांडा नाला सिस्टम के अंतर्गत अंग्रेजों ने 1880 से 1928 के दरम्यान 19 बड़े और 111 ब्रांच नाले बनाए थे। यहाँ बनाए गए बड़े नालों की लंबाई 29,270 फिट थी, जबकि ब्रांच नालों की लंबाई 34,982 फिट थी। वर्तमान में इनमें से अधिकांश ब्रांच नाले विलुप्त हो गए हैं। बड़े नालों के अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है।
18 सितंबर, 1880 के भू-स्खलन के बाद सेंट-लू पहाड़ी में बने आलीशान राजभवन की सुरक्षा को लेकर ब्रिटिश सरकार बेहद चिंतित थी। यह भव्य राजभवन भू-स्खलन की त्रासदी से महज एक वर्ष पहले 1879 में बनकर तैयार हुआ था। ब्रिटिश सरकार को हर हाल में इस नव निर्मित राजभवन की सुरक्षा करनी थी। चूंकि राजभवन साम्राज्यवादी सत्ता के वैभव और शक्तिशाली सामर्थ्य का प्रतीक था। लिहाजा भू-स्खलन के बाद इस पहाड़ी की सुरक्षा के मद्देनजर विषय विशेषज्ञों की अनेक उच्चस्तरीय जाँच कमेटियां बनीं। 1895 में सर एंटोनी पैट्रिक मैक्डॉनल, नॉर्थ वेस्टर्न प्रोविंसेस के लेफ्टिनेंट गवर्नर बने। उनके कार्यभार संभालते ही सेंट -लू के राजभवन को खाली कर दिया गया। डायोसेजन बॉयज स्कूल (शेरवुड कॉलेज) को अस्थायी राजभवन बना दिया गया।
1880 के भू-स्खलन के बाद ब्रिटिश सरकार ने नैनीताल की संवेदनशील पहाड़ियों एवं झील की सुरक्षा के दीर्घकालिक उपाय सुझाने के लिए अनेक विशेषज्ञ कमेटियां बनाईं। विषय विशेषज्ञों की सलाह के मद्देनजर ब्रिटिश सरकार ने नैनीताल नगर को निर्माण के लिए सुरक्षित एवं असुरक्षित, दो क्षेत्रों में विभक्त कर दिया। संपूर्ण नगर में निर्माण के लिए सुरक्षित एवं असुरक्षित क्षेत्रों को विभक्त करने के लिए दर्जनों पिलर बनाए गए। निर्माण के लिए असुरक्षित क्षेत्रों में बड़े-बड़े सूचना- पट लगाए गए। भू- स्खलन के लिहाज से अति संवेदनशील क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के निर्माण कार्यों पर सख़्त पाबंदी लगा दी गई। शेर-का-डांडा पहाड़ी सहित नैनीताल के अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को निर्माण के लिए असुरक्षित घोषित कर दिया गया। ब्रिटिश शासनकाल के दौरान शेर-का-डांडा पहाड़ी समेत निर्माण निषेद्ध घोषित क्षेत्रों में नए निर्माण कार्य नहीं के बराबर हुए। स्वतंत्रता के बाद के करीब दो दशकों तक ब्रिटिशकालीन व्यवस्थाएं कायम रहीं। कालांतर में निर्माण के लिए सुरक्षित एवं असुरक्षित की सीमा रेखा ख़त्म होती चली गई। सरकार ने खुद इस नियम का उल्लंघन किया। शेर -का-डांडा पहाड़ी में जहाँ 1880 के भू-स्खलन ने भीषण तबाही मचाई थी, ब्रिटिश शासन काल में उस पहाड़ी में निर्माण तो दूर घास काटने और फुलवारी बनाने की भी मनाही थी, सरकार ने उसी कमजोर पहाड़ी में 1985 में भारी-भरकम रोप-वे बना दिया। हैरत की बात यह है कि नैनीताल नगर में विगत चार दशकों में सर्वाधिक निर्माण कार्य निर्माण के लिए असुरक्षित घोषित संवेदनशील पहाड़ियों में हुए हैं और हो रहे हैं। ब्रिटिश शासन काल में जिस क्षेत्र में फूलों की क्यारियां बनाने की भी सख़्त मनाही थी, अब यह अति संवेदनशील क्षेत्र कंक्रीट के बियाबान में तब्दील हो गया है। शेर-का- डांडा के अलावा भी नैनीताल की अन्य कमजोर पहाड़ियों के उदर को खोदकर बेतरतीब निर्माण कार्यों का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। हैरानी की बात है कि हमारे हुक्मरान कैसे भूल रहे हैं 18 सितंबर 1880 की उस आपदा को और बजाए सीख लेने के ताबड़तोड़ निर्माण अनवरत जारी हैं। काश, 18 सितंबर 1880 को नहीं भूला जाता!