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छद्म लोकतंत्र ने लोक कल्याण की भावना को किया कमजोर

छद्म लोकतंत्र ने लोक कल्याण की भावना को किया कमजोर

बाल मुकुंद ओझा
अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस 15 सितंबर को मनाया जाता है। दुनियाभर में लोकतांत्रिक देशों में भारी उथल पुथल के बीच यह दिन लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों को बढ़ावा देने, नागरिकों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करने, और लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत बनाने के लिए समर्पित है। संयुक्त राष्ट्र की ओर से वर्ष 2007 में अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र दिवस मनाने की शुरुआत की गई थी। ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी 2025 की एक ताज़ा रिपोर्ट स्पष्ट कहती है कि दुनियाभर में लोकतंत्र की हालत चिंताजनक है। नेपाल, जैसे देशों में हिंसक आंदोलन से लोकतंत्र की नींव हिल गई। इस लिस्ट में अमेरिका सहित कई बड़े देश है जहां पिछले एक साल में लोकतंत्र कमजोर हुआ है। स्टॉकहोम स्थित थिंक टैंक इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर डेमोक्रेसी एंड इलेक्टोरल असिस्टेंस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट "द ग्लोबल स्टेट ऑफ डेमोक्रेसी 2025 में पिछले वर्ष में 173 देशों के लोकतांत्रिक प्रदर्शन का गहन विश्लेषण करते हुए दावा किया गया है कि पिछले साल दुनिया भर में लोकतंत्र कमजोर हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2019 की तुलना में सबसे बड़ी गिरावटों में से कुछ विश्वसनीय चुनावों के आयोजन, न्याय तक पहुंच और सक्रिय संसद से संबंधित मामलों में गिरावट देखी गई।
दुनिया के बहुत से देशों ने लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को स्वीकारा तो उन देशों की भी कमी नहीं है, जहां आज भी सैन्य शासन, तानाशाही, वंश प्रथा, छद्म लोकतंत्र और एक पार्टी शासन व्यवस्था लागु है। लोकतंत्र की सर्वमान्य परिभाषा के अनुसार, यह जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता का शासन है। विश्व बंधुत्व और लोक कल्याण की अवधारणा पर आधारित लोकतंत्र का मूल उद्देश्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहाँ हर व्यक्ति की आवाज सुनी जाए। लोकतंत्र का शाब्दिक अर्थ है लोगों का शासन। यह एक ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें जनता अपना शासक खुद चुनती है। भारत के सन्दर्भ में बात करें तो हमारा देश क्षेत्रफल में दुनिया का सातवाँ और जनसंख्या की दृष्टि से पहला सब बड़ा देश बनने जा रहा है। आजादी के बाद देश में लोकतान्त्रिक प्रणाली को चुना गया। लोकतांत्रिक संसदीय व्यवस्था में बहुमतवाला दल शासन सँभालता है, अन्य दलों के सदस्य सत्तारूढ़ दल के कार्यकलापों की आलोचना करते हैं। सरकार बनने के बाद जो दल शेष बचते हैं, उनमें सबसे अधिक सदस्योंवाले दल को विरोधी दल कहा जाता है। भारतीय राजनीति में विपक्ष का अर्थ, जो सत्ता में नहीं है,से है। विपक्ष के रूप में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। स्वस्थ विपक्ष का कार्य सरकार की सकारात्मक तरीके से आलोचना करना होना चाहिए। स्वस्थ विपक्ष के रूप में विपक्ष को जनता के हित से जुड़े मुद्दों पर सरकार की आलोचना व बहस करना चाहिए। आजादी के बाद जो संघर्ष तत्कालीन विपक्षी दलों ने शुरू किया था वह सत्ता की नहीं बल्कि विचारों की प्रत्यक्ष लड़ाई थी। उनके विचारों में राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के तत्व मौजूद थे। आज स्थिति बिलकुल उलट है। वर्तमान के विपक्षी दलों में न तो विचारों के साथ चलने को लेकर कोई उत्साह है, न प्रतिबद्धता। लोकतंत्र में दो सबसे बड़ी पार्टियां ऐसी कटु भाषा का प्रयोग एक-दूसरे के लिए नहीं करतीं जैसे हमारे यहां होता है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी विदेशी धरती पर जाकर यह कहते नहीं हिचकिचाते कि भारत में लोकतंत्र खतरे में है या लोकतंत्र ख़त्म हो गया है। संवैधानिक संस्थाओं पर भाजपा और आरएसएस ने कब्ज़ा जमा लिया है। वोट चोरी की जा रही है। इसके जवाब में सत्तारूढ़ भाजपा आपातकाल का हवाला देते हुए राहुल की पार्टी कॉंग्रेस पर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाते है। भारत में पक्ष और विपक्ष में नफरत और घृणा का वातावरण चहुंओर देखा जा सकता है। सभी वर्ग एक दूसरे पर लोकतंत्र के खात्मे का आरोप लगते देर नहीं करते। कहने का तात्पर्य है सियासत का केंद लोकतंत्र को बना दिया गया है।
विशेषकर 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद जो कटुता, विषगमन और असहिष्णुता देखने को मिली वह लोकतंत्र के हित में नहीं कही जा सकती। इससे हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली का ह्रास हुआ है। हमारे देश में राजनीतिक माहौल इतना कटुतापूर्ण हो गया है कि लोकतांत्रिक राजनीति के इतिहास में कहीं नहीं हुआ होगा। सोशल मीडिया , टेलीविजन, फेसबुक और ट्विटर जैसे संचार साधनों के बढ़ते दायरे ने आग में घी का काम किया है। भारत के लोकतंत्र के लिए इससे बुरा और क्या हो सकता है। लोकतंत्र की सफलता पक्ष और विपक्ष की मजबूती में है। लोकतंत्र तभी सुदृढ़ होगा जब राष्ट्रीय हितों के मामलों में दोनों की एक राय हो। देश सबसे बड़ा है। मगर ऐसा नहीं हो रहा है जो दुखद है। अब समय का तकाजा है सभी राजनीतिक पार्टियों में जो कुछ गंभीर और समझदार नेता बचे हैं वे लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सभ्यता और मर्यादा बनाए रखने के लिए कोशिशें शुरू करें। उन्हें विधायिका की संस्थाओं के बाहर सरकार और विपक्ष के बीच नियमित बैठकों को आयोजित करना चाहिए। सभी लोकतंत्र प्रेमियों को इस पर गहनता से मंथन करने की जरुरत है।

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