सड़कें मौन हुई तो संसद आवारा हो जाएगी
-बाल मुकुन्द ओझा
समाजवासी विचारक डॉ राम मनोहर लोहिया समृति दिवस पर आज यह बात बहुत शिद्धत से याद आरही है कि, सड़कें मौन हुई तो संसद आवारा हो जाएगी। उन्हीं के साथी लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने सड़कों को मौन नहीं होने दिया, फलस्वरूप सड़कों पर जन क्रांति ने शासन सत्ता को बदल कर रख दिया। कई लोग जिनमें कुछ लोग लोहिया के अनुयायी होने का दावा करते है वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ राजधानी दिल्ली में चल रहे आंदोलन को लोहिया के उक्त कथन से जोड़कर देखते है। लोहिया के पंडित नेहरू सहित कांग्रेस के नेताओं से मधुर सम्बन्ध थे मगर वे यह कहते नहीं हिचकते थे कि कांग्रेस को सत्ता से हटाने के लिए वे शैतान से भी हाथ मिलाने को तैयार है। वे सिविल नाफरमानी में विश्वास करते थे। मगर अपशब्द, गाली गलोच, अभद्र भाषा उनकी डिक्शनरी में नहीं थे।
लोहिया के निधन के 59 वर्षों बाद भी लोग उन्हें और उनके विचारों को भूले नहीं है। एक सच्चे और ताजिंदगी संघर्षशील राजनेता को उनके स्मृति दिवस पर इससे बड़ी श्रद्धांजलि क्या होंगी। आज़ादी के नायक और लोकतांत्रिक समाजवाद के प्रणेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती 11 अक्टूबर को और डॉ राम मनोहर लोहिया का समृति दिवस 12 अक्टूबर को है।
यहाँ हम लोहिया की बात करते है। डॉ लोहिया कहते थे सड़कें सूनी हो जाये तो संसद आवारा हो जाती है। यह तब के साथ आज का भी सच है। आज इस पर गहन चिंतन मनन की जरुरत है कि सड़कें तो सुनसान नहीं हुई मगर संसद जरूर आवारा हो गयी। संसद में अब तर्क और विचार का स्थान हंगामे ने ले लिया है। अब वाजपेयी, भूपेश गुप्त, नाथपै, गोपालन, एसएम बनर्जी, मधु लिमये, आडवाणी, सुषमा स्वराज जैसी सख्सियत नहीं है जो अपने तर्कों से सरकार को झुका सके। आज लोहिया समृति दिवस पर उनकी कहीं यह बात बरबस याद आती है। 12 अक्टूबर को राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि है। केरल में छात्रों पर लाठी चार्ज हुआ तो उन्होंने अपनी ही सरकार को इस्तीफ़ा देने को कह दिया। आज हालत यह है लाठी गोली चल जाये मगर सरकार कहीं नहीं जाएगी। वे कहते थे ज़िंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करती। उनकी कही हर बात आज याद आती है। 17 खंडों की किताब लोकसभा में लोहिया में उन्होंने लोकतंत्र और विपक्ष की भूमिका पर सार्थक सवाल उठाए है जो आज भी प्रसांगिक है। कहते है आज लोहिया होते तो भाजपा को ललकारते। कोई यह कहने वालों से पूछे की क्यों लालकारते भाई। भाजपा ने तो कांग्रेस मुक्त भारत का उनका सपना साकार ही किया है। वे कांग्रेस को हटाने के लिए शैतान से भी हाथ मिलाने को तैयार थे। उन्होंने 1967 में समाजवादियों को साम्यवादियों और जनसंघियों के साथ एक जाजम पर बैठकर कांग्रेस को सत्ताच्युत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। खेर बहस तो चलती रहेगी। लोकतंत्र में बहस का प्रमुख स्थान है इससे हमारे लोकतंत्र की जडे मज़बूत होती है। लोहिया ने देशवासियों को जो रास्ता दिखाया वह संघर्ष का था। इसी रस्ते पर चलकर हम अपनी राह आसान कर सकते है। जब तक सूरज और चन्द्रमा है रोटी कपडा और मकान की जंग यूँ ही चलती रहेगी।
लोहिया कांग्रेस के विचारों के सख्त विरोधी थे, यह किसी सी छिपा नहीं है। मगर आज के नेताओं की तरह आपसी नफरत और वैमनस्यता के भाव उनके मन में नही थे। कांग्रेस को सत्ताच्युत करने का सपना उन्होंने आजादी के बाद से ही संजोया था। उनका यह सपना आंशिक रूप से 1967 में पूरा हुआ जब देश के अनेक राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनी। डॉ राम मनोहर लोहिया कहते थे लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर, शायद मेरे मरने के बाद। लोहिया की मृत्यु के दस साल बाद उनकी बात उनके ही अभिन्न साथी जय प्रकाश नारायण ने सुनी और 1977 में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर लोहिया के गैर कांग्रेसवाद के सपने को साकार किया।
कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी से सोशलिस्ट पार्टी के सफर में शुरू में जय प्रकाश नारायण का साथ भी उन्हें मिला था। मगर बेहद आदर्शवादी जय प्रकाश का चुनावी राजनीति से जल्द ही मोह भंग हो गया और उन्होंने सर्वोदय आंदोलन की राह पकड़ ली। लोहिया की मृत्यु के दस साल बाद जेपी ने गैर कांग्रेसवाद का झंडा बुलंद पर लोहिया का सपना साकार किया।