झूठ बोले कौआ काटे
बाल मुकुन्द ओझा
झूठ बोले कौआ काटे। यह कहावत हम जन्म से ही सुनते आ रहे है। ऐसा इसलिए कहा जाता है कि ताकि लोग झूठ बोलने से बचें और सत्य बोलें। बचपन से ही हमें सच बोलने की सीख दी जाती है। यह रटाया जाता है झूठ बोलना पाप है। मगर अब तो समूची सियासत ही झूठ सी काली हो गयी तो कौन क्या करें। सियासत का सच तो यह है आज झूठ को सच बताने का पूरा अभियान चल रहा है। झूठ ही सच है, झूठ की प्राण प्रतिष्ठा की जा रही है। आज की सियासत झूठ की दहलीज पर खड़ी होकर दहाड़े मार रही है। यहाँ सत्य का नामो निसान नहीं है। जो जितना बड़ा झूठ बोलेगा वह उतना बड़ा आदमी बनेगा। झूठ, छल-कपट-प्रपंच साधारण जीवन से लेकर सियासत तक दिखाई पड़ते हैं। लोगों को बहलाना-फुसलाना या बरगलाना सियासत के बुनियादी सिद्धांतों में से एक है। लेकिन राजनीति में झूठ या यूं कहें कि सफेद झूठ को हथियार बनाना एक नया चलन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ समूची विपक्षी पार्टियां वोट चोरी का आरोप लगाकर आंदोलनरत है। वहीँ भाजपा इसे लगातार हार की हताशा और झूठ का पुलिंदा बताकर पलटवार कर रही है। अब ये झूठ बोल रहे है या राजनीति में शुचिता की बात कर रहे है कौन जाने। काँकरोच जनता पार्टी शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा लेकर गद गद है और अब विपक्षी पार्टियों के सूर में सूर मिलाकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पटकनी लगाने पर अड़ी है। राजधानी दिल्ली में आंदोलन के नित नए तमाशे देखने को मिल रहे है। ज्ञानेश कह रहे है हमने जो किया वह सही किया है। आम आदमी की परेशानी की किसी को चिंता नहीं है।
कांग्रेस नेता राहुल गाँधी को सब कुछ आज़माने के बाद इस्तीफे की राजनीति मुफीद लग रही है। पहले नारे लगते थे, गली सड़ी सरकार को एक धक्का और दो। अब नारे लग रहे है ज्ञानेश कहां मिलेंगे - मोदी जी की गोदी में। वोट चोर गद्दी छोड़। कहने का मतलब है जहां जीते वहां ठीक और जहां हारे वहां वोट चोरी। यानि मीठा मीठा गप्प गप्प और खारा खारा थू थू। विपक्ष के नेता राष्ट्रपति को ज्ञापन देने गए वह भी झूठ की बेदी पर चढ़ गया। राहुल कह रहे है राष्ट्रपति ने वोट चोरी को मान लिया है वहीँ भाजपा इसे झूठा कहकर राहुल को नालायक करार दे रही है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने राहुल गाँधी और विपक्ष के नेताओं से मिलने से इंकार कर दिया। तीनों चुनाव आयुक्त झूठ और सच की लड़ाई में मौन होकर बैठ गए है। लोगों की जेहन में यह सवाल उठना लाजमी है कि तीनों एक साथ आकर झूठ और सच का पर्दाफास क्यों नहीं कर रहे है।
लोगों को बहलाना-फुसलाना या बरगलाना सियासत के बुनियादी सिद्धांतों में से एक है. लेकिन राजनीति में झूठ या यूं कहें कि सफेद झूठ को हथियार बनाना एक नया चलन है। झूठ की बुनियाद पर अब राजनीतिक महल तैयार किए जाते हैं। नेता खुद अपनी कही बातों को चुनावी जुमले करार देने में भी शर्म महसूस नहीं करते हैं। यही वजह है कि सियासत को झूठ और फरेब का पुलिंदा मान लिया गया है। हद यह है कि अब तो हमले दोनों ही ओर से होने लगे हैं, चाहे सरकार में बैठे लोग हों या फिर उनके विरोध में खड़े होने वाले विपक्षी सदस्य। राजनीति का खेल निराला, झूठे का बोल बाला! भारतीय राजनीति में राजनेताओं द्वारा लोकप्रियता हासिल करने के लिए लोकहितकारी रास्ते अपनाए जाने के बजाए लोकलुभावन बातें करके जनमानस को अपनी ओर आकर्षित करने का ढर्रा हालांकि काफी पुराना हो चुका है। परंतु दिन-प्रतिदिन सियासत के इस अंदाज में और भी परिवर्तन आता जा रहा है।
भाजपा और कांग्रेस में सच और झूठ को लेकर लम्बे समय से विवाद चल रहा है। चाहे राम मंदिर का मुद्दा हो या राफेल का और अब वोट चोरी का। दोनों एक दूसरे को झूठा बता रहे है। भाजपा आरोप लगाती है कि झूठ की भाषा का इस्तेमाल कांग्रेस करती आई है और कांग्रेस कहती है कि झूठ का व्यापार भाजपा करती है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर कौन किस बात को लेकर कितना झूठ बोल रहा है और लोग उसे कितना सच मानकर अपना रहे हैं। वैसे भाजपा के सत्तारूढ़ होने के बाद कांग्रेस खासी परेशान है। इसलिए वह बचाव के साथ ही साथ लगातार हमले करने को मजबूर है। कांग्रेस ऐसा करे भी क्यों ना, आखिर उसकी विरासत को हथियाने का दुस्साहस जो किया जा रहा है। लगता है देश की सियासत झूठ और सच के बीच फंस कर रह गई है। मगर जो जीता वही सिकंदर है और यह लड़ाई भाजपा ने जीती है।
सच्चाई पीछे हट रही है तो झूठ लगातार आगे बढ़ रही है। हमारे नेता झूठ का सहारा लेकर अपनी सियासत को चमका रहे है यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसा लगता है झूठ हमारी सियासत में घूस कर सिर चढ़ कर बोलने लगी है।