पेट्रोस्टेट से इलेक्ट्रोस्टेट की दिशा में तेजी से बढ़ता भारत
नवीकरणीय उर्जा की दिशा में तेजी से बढ़ता भारत अब पेट्रोस्टेट के स्थान पर इलेक्ट्रोस्टेट की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जुलाई की 13 तारीख को पवन और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में विद्युत उत्पादन का आंकड़ा 100 गीगावाट को पार कर गया। यह विद्युत उत्पादन में करीब 42 प्रतिशत भागीदारी हो जाती है। वैसे देखा जाए और जल विद्युत और परमाणु विद्युत को भी जोड लिया जाये तो देश में कुल विद्युत उत्पादन में करीब करीब 50 फीसदी भागीदारी नवीकरणीय ऊर्जा की हो जाती है। देश में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होती जा रही है। जीवाश्म ईंधन के कारण जिस तरह से पर्यावरण प्रभावित हो रहा है उससे दुनिया के सभी देश चिंतित है और जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया जा रहा है। यही कारण है कि आज अमेरिका धरती के गर्भ में छिपे बेशकीमती खनिजों के लिए दुनिया के देशों पर नजर गड़ाये हुए हैं। चाहे यूक्रेन हो, कनाड़ा हो, आईलैण्ड हो या डेनमार्क या कोई भी वह देश जिस देश में क्रिटिकल व स्ट्रेटेजिक खनिजों के भण्डार है उन पर अमेरिका की नजर टिकी हुई है। दूसरी और अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल और एलपीजी का संकट दुनिया के देशों के सामने उभरा है उससे दुनिया के देषों को पेट्रोस्टेट से इलेक्ट्रोस्टेट में शिफ्ट होने का देर सबेर प्रयास करना ही होगा। आज चीन दुनिया का सबसे बड़ा इलेक्ट्रोस्टेट है। चीन का वर्चस्व इसलिए भी हो गया है कि दुनिया के देशों में इलेक्ट्रोस्टेट यानी की चीन उत्पादक और निर्यातक दोनों ही तरह से दुनिया में शीर्ष पर है। करीब 80 फीसदी भागीदारी अकेले चीन की होने से चीन की मोनोपोली होना स्वाभाविक है।
दरअसल ईंधन के लिए अब तक दुनिया के देश पारंपरिक रुप से तेल और गैस पर निर्भर रहे हैं। इस निर्भरता को पेट्रोस्टेट कहा जाता रहा है। पर्यावरणीय समस्या को देखते हुए दुनिया के देशों ने तेल और गैस यानी कि जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करने पर जोर दिया जाता रहा है।दुनिया के देशों के सामने पेट्रोस्टेट से इलेक्ट्रोस्टेट की दिषा में आगे बढ़ने की चुनौती है। जिस तरह से पेट्रोस्टेट में एक उत्पादक देश अरब देश, रुस आदि कुओं से तेल निकालने वाले देश है और इनकी दादागिरी और समस्या को पिछले चार साढ़े चार माह से चल रहे अमेरिका-ईरान युद्ध से अच्छी तरह से समझा जा सकता है। आज हार्मुज के कारण कच्चे तेल और एलपीजी के जहाजों का आवागमन प्रभावित हो रहा है और अब तो लालसागर के रास्ते पर भी अवरोध वाले हालात बनते जा रहे हैं। इस तरह से दुनिया के दो देशों के अहम् की लड़ाई में दुनिया के देशों के सामने गंभीर ईधन संकट आ गया है। पेट्रोस्टेट में दूसरे उपभोक्ता देश आते हैं जो ईंधन के लिए पूरी तरह निर्भर है। अब समस्या उत्पादक और उपभोक्ता दोनों ही देशों के सामने है। निकट भविष्य में हालात ज्यादा अच्छे होते नहीं लग रहे वहीं पर्यावरण संकट के चलते देर सबेर पेट्रोस्टेट को इलेक्ट्रोस्टेट में शिफ्ट होना ही है।
आज चीन दुनिया का पहला इलेक्ट्रोस्टेट बन चुका है। चीन उत्पादक और उपभोक्ता दोनों में ही आगे आया है। चीन के बाद भारत भी तेजी से इलेक्ट्रोस्टेट की और आगे बढ़ रहा है। हांलाकि चुनौतियां अधिक है। चीन अकेला सौर उर्जा और बेटरी आदि में 80 फीसदी हिस्सेदारी के साथ दौड़ में बहुत आगे हैं। चीन में सौर उर्जा को उत्पादन, पवन उर्जा का उत्पादन बढ़ रहा है। वहीं इलेक्ट्रिक वाहन, लिथियम और आयन बेटरियों के उत्पादन में आगे हैं। लिथियम, कोबाल्ट, निकल और आरईई खनिजों में भी चीन आगे हैं और यही कारण है कि चीन जीवाश्म ईंधन के स्थान पर इलेक्ट्रोस्टेट में दुनिया का नेतृत्व कर रहा है।
जहां तक भारत का प्रश्न है भारत में भी योजनाबद्ध तरीके से नवीकरणीय उर्जा की और कदम बढ़ाये गये हैं। पवन उर्जा को बढावा देने के साथ ही देश में सौर उर्जा पर भी खास ध्यान दिया गया है। राजस्थान गुजरात, कर्नाटक आदि राज्यों में तेजी से काम हो रहा है। अब तो रुफटॉप के लिए अनुदान के साथ ही लोगों को प्रोत्साहित किया जा रहा है और इसके भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने लगे हैं। खेती किसानी में कुसुम योजना के कम्पोनेन्ट के माध्यम से बढ़ावा दिया जा रहा है। कर्नाटक, गुजरात के साथ ही राजस्थान में नवीकरणीय उर्जा के क्षेत्र में तेजी से काम हो रहा है। भारत में अब सौलर पैनल भी तैयार होने से चीन व अन्य देशों से निर्भरता कुछ हद तक कम हुई है। इसी तरह से देश में रुफटॉप को प्रोत्साहित करने का परिणाम यह है कि शहरों में घरों पर बहुतायत में सोलर प्लांट देखे जा सकते हैं। पिछले कुछ सालों से योजनाबद्ध तरीके से ईवी को बढ़ावा दिया जा रहा है और इलेक्ट्रिक वाहन अब कोई अजूबा नहीं रहा है। ई रिक्शा में तेजी से विस्तार हुआ है तो लगभग सभी निर्माताओं ने दो पहिया, तीन पहिया और यहां तक एसयूवी भी ईवी आने लगी है। ईवी चार्जींग स्टेशनों को भी विस्तारित किया जा रहा है। भारत सरकार द्वारा क्रिटिकल मिनरल मिशन बनाकर क्रिटिकल, स्टेट्रेजिक और आरईई के खोज-खनन को प्राथमिकता में लाया गया है। बेटरियां और सेमीकण्डक्टरों आदि का निर्माण देश में ही होने लगा है।
एक बात साफ हो जानी चाहिए कि भारत भी अब पेट्रोस्टेट से इलेक्ट्रोस्टेट की और तेजी से आगे बढ़ रहा है। चरणवद्ध तरीके से जीवाश्म ईंधन से निर्भरता कम करने के प्रयास किये जा रहे हैं। हरित और स्वच्छ ऊर्जा की और देश तेजी से आगे बढ़ रहा है तो दूसरी और देषवासी भी हरित ऊर्जा को अपनाने में आगे आ रहे हैं। घरों में रुफटाप का विस्तार और सड़कों पर ईवी वाहनों की रेलमपेल इसका उदाहरण है। नवीकरणीय उर्जा के स्टोरेज की दिशा में भी प्रयास हो रहे है। सरकार को अभी इस दिशा में और अधिक ध्यान दिया जाना होगा। ईवी को लोगों के विश्वास पर खरा उतरना होगा। लंबी दूरी की यात्रा आसान हो सके ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी वहीं लागत को भी कम करने के प्रयास करने होंगे। वैसे पेट्रोस्टेट से इलेक्ट्रोस्टेट की दिशा में बढ़ते कदम निश्चित रुप से सराहनीय माना जाना चाहिए। जीवाश्म ईंधन के पर्यावरणीय नकारात्मक प्रभाव और जीवाश्म ईंधन को लेकर वर्तमान हालात और उत्पादक देशों की दादागिरी को समाप्त करना एक बात है पर दीर्घकालीन भविष्य भी इलेक्ट्रोस्टेट में ही साफ दिखाई देता है।