पाकिस्तान में महंगाई, भ्रष्टाचार, भुखमरी और अस्थिरता की चौतरफा मार
बाल मुकुन्द ओझा
पाकिस्तान इस समय महंगाई, भ्रष्टाचार, भुखमरी, कर्जे और अस्थिरता की चौतरफा मार झेल रहा है। यही नहीं आर्थिक बदहाली और बाढ़ के कारण देश में खाद्य सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। वर्ल्ड बैंक की अक्टूबर 2026 की रीजनल अपडेट के मुताबिक पाकिस्तान क्षेत्र में रोज़ाना 3 डॉलर से कम आय वाली गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले कुल लोगों में से लगभग 48 प्रतिशत पाकिस्तानी हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में बिगड़ते आर्थिक संकट के लिए सेना के नेतृत्व द्वारा रक्षा पर लगातार किया जा रहा भारी खर्च ज़िम्मेदार है। आईएमएफ ने मई 2026 की अपनी समीक्षा में भी चेतावनी दी थी कि मध्य पूर्व के संघर्ष से पाकिस्तान की महंगाई, आर्थिक विकास और भुगतान संतुलन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। जहां तक महंगाई की बात है, खाने पीने की चीजों के बढ़ते दाम से घरों का बजट ऐसा बिगड़ा है कि हज़ारों परिवार दूध और मीट जैसी महंगी चीजें कम खरीद रहे हैं। गेहूं, चावल और चाय का इस्तेमाल भी कम हो रहा है। महंगाई का असर अब सिर्फ जेब पर नहीं, बल्कि लोगों के रोज के खाने पर भी साफ नजर आ रहा है। कई परिवारों के लिए अब अंतिम संस्कार का खर्च उठाना भी मुश्किल होता जा रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, 2018-19 में 15.92 प्रतिशत परिवारों को पर्याप्त खाना नहीं मिल पा रहा था। 2024-25 में ये आंकड़ा ज्यादा होकर 24.35 प्रतिशत हो गया। वहीं, बहुत ज्यादा खाने की कमी झेल रहे परिवारों की संख्या 2.37 प्रतिशत से ज्यादा होकर 5.04 प्रतिशत हो गई। परिवारों के लिए पर्याप्त खाना खरीदना मुश्किल हो रहा है। वहीं एक्शन अगेंस्ट हंगर की एक ताज़ा रिपोर्ट ने आग में घी का काम किया है। अंतरराष्ट्रीय मानवीय सहायता संगठन एक्शन अगेंस्ट हंगर की एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में भुखमरी और खाद्य संकट लगातार गंभीर होता जा रहा है। , पाकिस्तान दुनिया के उन 10 देशों में शामिल है, जहां खाद्य संकट सबसे ज्यादा गंभीर है। गरीबी, जलवायु से जुड़ी आपदाओं और मानवीय सहायता में कमी के कारण लाखों लोगों के लिए पर्याप्त भोजन जुटाना मुश्किल हो गया है। रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, पाकिस्तान में 2026 के दौरान करीब 1.06 करोड़ लोगों को मानवीय सहायता की जरूरत होगी। यह स्थिति ऐसे समय में है, जब देश में आर्थिक सुधार की कोशिशें जारी हैं और कुछ आर्थिक संकेतकों में सुधार भी हुआ है। इसके बावजूद आम लोगों, खासकर गरीब और कमजोर परिवारों की मुश्किलें कम नहीं हुई हैं। रिपोर्ट बताती है कि अर्थव्यवस्था के कुछ क्षेत्रों में सुधार होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों को रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
इससे पूर्व जुलाई 26 में संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट में पाकिस्तान की गंभीर स्थिति की पोल खोल दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में भुखमरी की समस्या में बहुत ज्यादा सुधार देखने को मिला है। लेकिन दूसरी तरफ पाकिस्तान में हालात पहले से भी ज्यादा बदतर हो गए हैं। पिछले दो दशकों में पाकिस्तान में कुपोषित लोगों की संख्या में 37 फीसदी की भारी और चिंताजनक वृद्धि हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के ग्रामीण और आपदा प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण कार्यक्रमों, साफ पीने के पानी, स्वच्छता और सामाजिक सुरक्षा तक पर्याप्त पहुंच नहीं है। इन सुविधाओं की कमी से लोगों की सेहत और पोषण पर बुरा असर पड़ रहा है। इसके अलावा, आजीविका से जुड़ी सहायता और जरूरी सेवाओं में कटौती ने भी प्रभावित समुदायों के लिए संकट से उबरना मुश्किल बना दिया है।
विशेषज्ञों का साफ तौर पर मानना है कि पाकिस्तान की इस दुर्दशा के लिए वहां की सेना की नीतियां पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान सरकार आम जनता की भलाई के बजाय सेना और हथियारों पर अपनी जरूरत से ज्यादा रकम लगातार खर्च कर रही है। गरीब जनता के हिस्से का सारा पैसा सेना पर खर्च होने से देश की आर्थिक मुश्किलें लगातार बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। पाकिस्तान के आम लोगों को अब दो वक्त की रोटी भी बहुत ही ज्यादा मुश्किल से नसीब हो रही है।