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UN में जयशंकर का संदेश : आतंकवाद पर भारत नहीं करेगा समझौता

UN में जयशंकर का संदेश : आतंकवाद पर भारत नहीं करेगा समझौता

न्यूयॉर्क। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से आतंकवाद के खिलाफ भारत की नीति को लेकर स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि भारत आतंकवाद के खिलाफ आत्मरक्षा के अपने अधिकार का इस्तेमाल करेगा। जयशंकर ने अपने संबोधन में किसी देश का नाम लिए बिना कहा कि महासभा में एक ऐसे व्यक्ति ने तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया, जो लगातार आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहा है।

जयशंकर ने आतंकवाद को सामान्य बनाने और उसके परिणामों से बचने की कोशिशों को अस्वीकार्य बताया। उन्होंने सीमा पार राज्य-प्रायोजित आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती बताया और कहा कि ऐसी गतिविधियों में शामिल सरकारों को जवाबदेह ठहराना जरूरी है। साथ ही उन्होंने आतंकवाद के वित्तपोषण के स्रोतों को उजागर कर उसके खिलाफ कार्रवाई पर जोर दिया।

विदेश मंत्री ने कहा कि आतंकवाद और दोस्ती या सद्भावना साथ-साथ नहीं चल सकते। उन्होंने आतंकवाद के प्रति भारत की जीरो टॉलरेंस नीति जारी रखने की बात कही। उनका यह बयान वैश्विक शांति, विकास और विकासशील देशों के सामने मौजूद आर्थिक दबावों पर केंद्रित व्यापक संबोधन का हिस्सा था। संयुक्त राष्ट्र भी आतंकवाद की रोकथाम और उससे निपटने के लिए सदस्य देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय सहयोग को अपनी वैश्विक रणनीति का अहम हिस्सा मानता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी चिंता

जयशंकर ने कहा कि दुनिया वित्त, बाजार तक पहुंच, आपूर्ति श्रृंखला और तकनीक सहित कई क्षेत्रों के बढ़ते ‘हथियारीकरण’ का सामना कर रही है। उनके मुताबिक, देश जोखिम कम करने और अपने आर्थिक संबंधों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन व्यापक स्तर पर भरोसे और सद्भावना में कमी दिखाई दे रही है।

उन्होंने वैश्विक दक्षिण के सामने ‘फोर एफ’ की चुनौती का उल्लेख किया। इसमें Food, Fuel, Fertilizer और Finance यानी भोजन, ईंधन, उर्वरक और वित्त शामिल हैं। जयशंकर ने जलवायु घटनाओं, उर्वरक की उपलब्धता और अनाज की आवाजाही में आने वाली बाधाओं को विकासशील देशों के लिए चिंता का विषय बताया।

उन्होंने यह भी कहा कि गैर-बाजार प्रथाएं और सीमित बाजार पहुंच विकासशील देशों की औद्योगिक क्षमता को प्रभावित कर सकती हैं। वैश्विक स्तर पर वस्तुओं की कीमतों, आपूर्ति और बाजार पहुंच से जुड़े दबावों को लेकर संयुक्त राष्ट्र की चर्चाओं में भी विकासशील देशों की संवेदनशीलता पर जोर दिया गया है।

भारत की विकास साझेदारी का जिक्र

जयशंकर ने भारत की विकास यात्रा और सार्वजनिक सेवाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को सामाजिक और आर्थिक लाभ पहुंचाने वाले माध्यम के तौर पर रेखांकित किया और कहा कि भारत अपने अनुभव को दूसरे देशों के साथ साझा कर रहा है।

विदेश मंत्री ने 78 देशों में चल रही 600 से अधिक प्रमुख भारतीय विकास परियोजनाओं का भी जिक्र किया। इनमें बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, कृषि, सूचना प्रौद्योगिकी और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्र शामिल हैं। उन्होंने अफ्रीकी देशों और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों को भारत की विकास साझेदारी में महत्वपूर्ण भागीदार बताया। संयुक्त राष्ट्र के रिकॉर्ड में भी भारत की 78 देशों में 600 से अधिक प्रमुख विकास परियोजनाओं का उल्लेख मिलता है।

जयशंकर ने संकट के समय भारत की सहायता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि संघर्ष क्षेत्रों के अलावा महामारी और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित इलाकों में भारत ने चिकित्सा सामग्री और अन्य राहत सहायता पहुंचाई है। नेपाल की बाढ़ और वेनेजुएला में भूकंप का उदाहरण देते हुए उन्होंने भारत की मानवीय सहायता का जिक्र किया।

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