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जलियांवाला बाग नरसंहार : खून से लिखी आजादी की दास्तां

जलियांवाला बाग नरसंहार : खून से लिखी आजादी की दास्तां

बाल मुकुन्द ओझा
जलियांवाला हत्याकांड को आज 107 साल पूरे हो चुके है लेकिन इसकी याद आज भी हमारी आंखों को नम कर जाती है। भारतीय इतिहास में 13 अप्रैल 1919 उन तारीखों में से एक है जो अंग्रेजों के अमानवीय चेहरे को सामने ला देता है। उस दिन बैशाखी थी, लोगों के बीच खुशी का माहौल था। इस तारीख को भारत के इतिहास में काले दिन के रूप में भी याद किया जाता है। जलियांवाला बाग, ब्रिटिश शासन काल दौरान हुए सबसे कुख्यात नरसंहार की कहानी बयान करता है। दुनियाभर में आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर करने के एक से बढ़कर एक उदाहरण हैं। लेकिन भारत में जालियांवाला बाग की घटना अपनी आजादी के लिए शहीद होने की विश्व की सबसे बड़ी और क्रूर घटना के रूप में इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है। घटना का ब्योरा सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह एक अंग्रेज जनरल के क्रूरता की हद पार कर जाने की दास्तां हैं। यह दिन दुनिया के भीषणतम नरसंघारों में से एक है। एक सभ्य समाज के मुंह पर जोरदार तमाचा है जो कभी भुलाया नहीं जा सकता। स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने वाले निहत्थे लोगों को घेर कर मारने का यह एक घिनोना षड़यंत्र था।
देश की आजादी के इतिहास में 13 अप्रैल का दिन एक दुखद घटना के रूप में दर्ज है। वह 13 अप्रैल 1919 का दिन था, जब जलियांवाला बाग में एक शांतिपूर्ण सभा के लिए जमा हुए हजारों नागरिकों पर अंग्रेज हुक्मरान ने अंधाधुंध गोलियां बरसाई थीं। ये सभी जलियांवाला बाग में रौलट एक्ट के विरोध में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। पंजाब के अमृतसर में ऐतिहासिक स्वर्ण मंदिर के नजदीक जलियांवाला बाग नाम के इस बगीचे में अंग्रेजों की गोलीबारी से घबराई बहुत सी औरतें अपने बच्चों को लेकर जान बचाने के लिए कुएं में कूद गईं। निकास का रास्ता संकरा होने के कारण बहुत से लोग भगदड़ में कुचले गए और हजारों लोग गोलियों की चपेट में आए। यह नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष के इतिहास का एक काला अध्याय है।
बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को ऐतिहासिक जलियांवाला बाग में एक बड़ी सभा रखी गई थी । शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था, फिर भी इसमें बहुत बड़ी संख्या में नर नारी ऐसे भी थे, जो बैसाखी के मौके पर परिवार के साथ मेला देखने और शहर घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर वहां जा पहुंचे थे। जब नेता बाग में भाषण दे रहे थे तभी अँगरेज जनरल डायर ने बाग से निकलने के सारे रास्ते बंद करवा दिए। बाग में जाने का जो एक रास्ता खुला था जनरल डायर ने उस रास्ते पर हथियारबंद गाड़ियां खड़ी करवा दी थीं। डायर करीब 100 सिपाहियों के सीथ बाग के गेट तक पहुंचा। उसके 50 सिपाहियों के पास बंदूकें थीं। वहां पहुंचकर बिना किसी चेतावनी के उसने गोलियां चलवानी शुरु कर दी। गोलीबारी से डरे मासूम बाग में स्थित एक कुएं में कूदने लगे। जिसे अब शहीदी कुआं कहा जाता है इस नरसंहार में हजारों लोग मारे गए थे लेकिन ब्रिटिश सरकार के आंकड़ें में सिर्फ 379 की हत्या दर्ज की गई। जलियांवाला बाग में कितने लोग शहीद हुए, इसका विवरण आज तक सरकार व प्रशासन जुटा नहीं पाया।
इस घटना के प्रतिकार स्वरूप सरदार उधमसिंह ने 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में इस घटना के समय ब्रिटिश लेफ्टिनेण्ट गवर्नर डायर को गोली चला के मार डाला। उन्हें 31 जुलाई 1940 को फांसी पर चढ़ा दिया गया था। इस घटना ने भारत के आजादी की नींव रख दी।

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